धान की काश्त का रकबा कम करने की ज़रूरत
गत सप्ताह भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) द्वारा दिल्ली में आयोजित पूसा कृषि विज्ञान मेले में पंजाब से किसानों के पहुंचने से ऐसा लगता है कि वे धान की कम समय में पकने वाली किस्मों पूसा-2090 और पूसा-1824 और बासमती किस्मों के बीज लेने के लिए उत्साह के साथ गए हैं। धान की पूसा-2090 और पूसा-1824 किस्में पूसा-44 किस्म का विकल्प हैं। इन किस्मों के बीज किसान 17 मार्च को रखड़ा मेले में भी ले सकेंगे। गेहूं की फसल की कटाई के लिए डेढ़ महीना शेष है, लेकिन किसान अभी से धान की बिजाई का प्रबंध करने हेतु जुट गए हैं।
वे पीएयू द्वारा 10 मार्च से शुरू होने वाले मेलों (जहां पीआर किस्मों के बीज दिए जाएंगे) और 17 मार्च को पंजाब यंग फार्मर्स एसोसिएशन द्वारा रखड़ा कैम्पस में लगाए जा रहे मिनी किसान मेले (जहां पूसा-1824 और पूसा-2090 के बीज भी दिए जाएंगे) का भी इंतज़ार कर रहे हैं। इससे पता चलता है कि इस साल धान की फसल पुन: व्यापक स्तर पर लगाई जाएगी। खरीफ में धान ही प्रमुख रहेगा, जिसे विगत वर्षों की तरह बासमती के साथ लगभग 31-32 लाख हेक्टेयर रकबे में बोए जाने की संभावना है। धान का विकल्प खोजने के लिए सरकार और अनुसंधान संस्थाओं द्वारा निरन्तर प्रयास किए जा रहे हैं, परन्तु कोई सफलता नहीं मिल सकी क्योंकि अन्य कोई ऐसी फसल नहीं, जो खरीफ में धान जितना मुनाफा दे। धान की काश्त में समस्या यह है कि इसे पानी की ज़रूरत अधिक है और प्रदूषण पैदा होता है। पूसा-44 तथा मंडी में बिकने वाली पीली पूसा, डोगर पूसा जैसी किस्मों को सिफारिश की गई दूसरी किस्मों के मुकाबले 15-20 प्रतिशत ज़्यादा पानी और कीटनाशकों के कम से कम दो अतिरिक्त छिड़काव ज़रूरी हैं, जिससे लागत ज़्यादा होने से शुद्ध मुनाफा भी कम होता है। इसलिए किसान इसकी वैकल्पिक किस्मों की तलाश में हैं। पंजाब का वातावरण भी धान की फसल के लिए अनुकूल है। जहां ज़्यादा तापमान, ज़्यादा नमी, लंबे समय तक धूप और सुनिश्चित पानी का प्रबंध उपलब्ध है।
धान की ज़्यादा काश्त होने से भू-जल का स्तर नीचे जा रहा है और ज़मीन की उपजाऊ शक्ति कम हो रही है। पर्यावरण में प्रदूषण की समस्या आ रही है। किसानों ने धान के विकल्प जैसे मक्की आदि उगा कर देख ली, लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ। पीएयू या अन्य अनुसंधान संस्थानों द्वारा किसानों को कोई ऐसे विकल्प सिफारिश नहीं किए जा सके, जो धान से अधिक मुनाफा दे सकें। बल्कि, कपास पट्टी से थोड़ा-सा रकबा धान की काश्त में आ गया। कपास, नरमा की फसल के दाम में उतार-चढ़ाव होता रहता है। जब दाम बढ़ जाते हैं, तो रकबा बढ़ जाता है। जब मंदी आती है, तो किसान उसकी जगह दूसरी फसलें बोने के लिए भाग-दौड़ करते हैं। इस दौरान धान की काश्त उनके लिए ठीक रहती है, क्योंकि इसकी निर्धारित कीमत पर सरकारी खरीद है। पंजाब के कुल रकबे का 84 प्रतिशत हिस्सा काश्त के अधीन है, जिसमें से लगभग 7 लाख हेक्टेयर रकबे पर बासमती बोई जाती है। बाकी 24-25 लाख हेक्टेयर रकबे पर धान उगाया जाता है। सब्ज़ क्रांति के बाद धान-गेहूं के फसली चक्र का रकबा तेज़ी से बढ़ा। मक्की, मूंगफली, गन्ना और कपास का कुछ रकबा धान की काश्त के अधीन आ गया। सब्ज़ियों और फलों की काश्त के अधीन कुछ रकबा भी बढ़ाया गया, लेकिन इसे कोई खास फसली विभिन्नता नहीं कहा जा सकता।
चावल से किसानों को ज़्यादा मुनाफा होता है। फिर इसकी काश्त का रकबा क्यों कम किया जाए? पानी की ज़रूरत अधिक होने और प्रदूषण की समस्या इसके कारण हैं। पंजाब में भू-जल का स्तर बेहद कम होना मुख्य समस्या है। हर साल अलग-अलग क्षेत्रों में भू-जल का स्तर 50 से 100 सै.मी. तक नीचे जा रहा है। पंजाब सरकार ने 2009 में पंजाब प्रीज़र्वेशन ऑफ सब-स्वाइल वाटर एक्ट पारित करके 15 जून से पहले धान लगाने पर पाबंदी लगा दी गई थी और पौध भी 15 मई से पहले नहीं लगाई जा सकती थी। लेकिन इसकी वजह से लंबे समय में पकने वाली किस्में अक्तूबर के मध्य में पकती हैं जिस कारण गेहूं के लिए खेत तैयार करने हेतु बहुत कम समय बचता है और किसान पराली और अवशेष को जलाने के लिए मजबूर हो जाते हैं। आईसीएआर ने अनुसंधान शुरू किया कि कोई पूसा-44 किस्म जितनी या उससे ज़्यादा उत्पादन देने वाली किस्म तैयार की जाए। इसके बाद पूसा-2090 और पूसा-1824 किस्में अस्तित्व में आईं, जिन्हें पकने में 125 दिन लगते हैं और प्रति एकड़ 35 क्ंिवटल से ज़्यादा उत्पादन देती हैं। पूसा-1824 किस्म का चावल लंबा और पतला होता है। यह फसल गिरती भी नहीं। पूसा-44 और पीएयू-201 किस्मों का क्रॉस होने की वजह से पूसा-44 किस्म से ज़्यादा उत्पादन देती हैं। पूसा-2090 वैरायटी का नाड़ मज़बूत है।
इसके अतिरिक्त किसान कम समय में पकने वाली बासमती की पूसा-1509 किस्म लगा सकते हैं, जो अधिक उत्पादन के कारण लाभदायक है। इसके अलावा पूसा-1401 किस्म का चावल उत्तम तथा सुपरफाइन श्रेणी में आता है। पूसा बासमती-1885 किस्म पूसा बासमती-1121 (जिसका चावल सभी किस्मों से लंबा और पतला होता है और विदेश में निर्यात किया जा रहा है) की जगह सिफारिश की गई है। किसानों को धान की जगह कुछ रकबे पर बासमती लगानी चाहिए। बासमती की योग्य किस्में उपलब्ध हैं, जिन्हें कम पानी की ज़रूरत होती है। कई वर्षों से तो ये बारिश के पानी से ही पक कर तैयार हो जाती रही हैं। पंजाब की भूमि तथा पानी बासमती की सही काश्त के लिए अनुकूल है। राज्य बासमती के जीआई ज़ोन में है, जो गुणवत्ता भरपूर बासमती पैदा करता है। किसानों की लंबे समय की मांग को मान कर केंद्र सरकार को बासमती का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करना चाहिए ताकि फसली विभिन्नता में कुछ सफलता मिल सके।
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