अमन के लिए पहल की ज़रूरत
28 फरवरी को अमरीका और इज़रायल द्वारा ईरान पर किए गए हमले से पूरे विश्व, विशेष रूप से मध्य- पूर्व में बेहद तनाव भरपूर हालात पैदा हो गए हैं। ईरान के सुप्रीम नेता आयतुल्ला खामेनेई, रक्षा मंत्री अज़ीज़ नासिरजादेह और सेना प्रमुख जनरल अब्दुल रहीम मुसाबी सहित सेना के कई बड़े अधिकारी मारे गए हैं। इससे ईरान के लोगों में भारी रोष पैदा हुआ है। बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर रोष प्रकट करने के लिए आए, वहीं इराक सहित खाड़ी के कई अन्य देशों में भी अमरीका और इज़रायल द्वारा ईरान पर किए गए हैं। हमले के विरुद्ध लोगों की ओर से रोष प्रकट करने के समाचार प्राप्त हुए हैं। पाकिस्तान में भी प्रदर्शन हुए हैं। कराची और लाहौर में अमरीकी दूत-घरों पर हमले हुए हैं। अमरीका में डोनाल्ड ट्रम्प के विरुद्ध लोग बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर आए हैं।
इसी दौरान अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का यह बयान भी सामने आया है कि अमरीका और इज़रायल के साझे हमले में ईरान के बड़े नेता आयतुल्ला खामेनेई, जो विश्व के सबसे बुरे व्यक्ति थे, मारे गए हैं। उन्होंने ईरान के लोगों को एक बार फिर यह आह्वान किया है कि वे अपनी सरकार के विरुद्ध विद्रोह करते हुए देश का नियंत्रण अपने हाथ में ले लें। उन्होंने यह भी कहा है कि आने वाले एक सप्ताह तक अमरीका और इज़रायल द्वारा ईरान पर लगातार हमले किये जाते रहेंगे। दूसरी तरफ ईरान के शासकों ने जहां अपने सुप्रीम नेता की मौत पर गहरा दु:ख प्रकट करते हुए 40 दिन के शोक की घोषणा की है, वहीं अपनी यह दृढ़ता फिर से दोहराई है कि वे अमरीका और इज़रायल के हमलों का डट कर मुकाबला करेंगे। इसी दौरान आयतुल्ला अलीरेज़ा अराफी ने अंतरिम सुप्रीम नेता के तौर पर ईरान का नेतृत्व सम्भाल लिया है। अमरीका और इज़रायल द्वारा ईरान पर किए जा रहे लगातार हमलों के कारण तेहरान और देश के भिन्न-भिन्न प्रांतों में 200 से अधिक लोग मारे गए हैं और लगभग 700 घायल भी हो हुए हैं। ईरान में लड़कियों के एक स्कूल पर गिरी मिसाइल से लगभग 86 छात्राओं के मारे जाने का भी समाचार है। अमरीका और इज़रायल द्वारा ईरान पर जारी रखे जा रहे हमलों के दौरान ही ईरान की ओर से भी अमरीका के अरब खाड़ी क्षेत्र में स्थित आठ सैन्य ठिकानों पर ज़ोरदार हमले किए गए हैं। इन हमलों के लिए 130 मिसाइलों और 200 से अधिक ड्रोनों का इस्तेमाल किया गया है। कतर, बहरीन, कुवैत, यू.ए.ई. और सऊदी अरब में स्थित अमरीकी अड्डों पर भी बड़ी संख्या में हमले हुए हैं और पैदा हुई इस स्थिति के लिए रूस के विदेश मंत्री सरगेई लवरोव और चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने भी आपस में विचार-विमर्श किया है और ईरान पर अमरीका और इज़रायल की ओर से किए गए हमले की कड़ी आलोचना करते हुए इसे ईरान की प्रभुसत्ता का उल्लंघन करार दिया है। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी ईरान और इज़रायल के विदेश मंत्रियों के साथ बातचीत की है और दोनों देशों को इस मामले का बातचीत से हल निकालने और इस क्षेत्र में पुन: शांति स्थापित करने के लिए अपील की है। भारत के विदेश मंत्री ने खाड़ी के अन्य देशों जिन पर ईरान द्वारा मिसाइलों से हमले किए गए हैं, के विदेश मंत्रियों के साथ भी बातचीत की है और उन्हें भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित बनाने के लिए कहा है।
अमरीका और इज़रायल द्वारा ईरान पर किए गए इस ताज़ा हमले के बारे में निष्पक्ष राजनीतिक विश्लेषकों का विचार है कि ओमान की मध्यस्थता द्वारा जेनेवा में ईरान, अमरीका तथा इज़रायल के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत के तीन दौर हुए थे और ईरान अपने परमाणु हथियारों को सीमित करने और परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल सिर्फ नागरिक विकास के उद्देश्यों के लिए करने हेतु सहमत हो गया था और इसी कारण ओमान ने यह आशा प्रकट की थी कि संबंधित पक्षों के बीच बातचीत में बहुत प्रगति हुई है और कोई उचित समझौता हो सकता है। निष्पक्ष राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि इसके बावजूद अमरीका और इज़रायल ने ईरान पर हमला करने का मार्ग अपनाया, क्योंकि वे मध्य पूर्व के खाड़ी देशों में ईरान के प्रभाव को बिल्कुल खत्म करना चाहते हैं और ईरान के परमाणु हथियारों और विशेष रूप से लम्बी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों को भी पूरी तरह तबाह करने के लिए बज़िद हैं। वह खाड़ी में तेल के सभी स्रोतों पर भी अपना कब्ज़ा चाहते हैं। राजनीतिक क्षेत्र ईरान पर किए गए ताज़ा हमले को अमरीका द्वारा पिछले वर्ष जून में उसके किए गए हमले के क्रम के रूप में ही देख रहे हैं। अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प इस हमले द्वारा अमरीका का विश्व में दबदबा भी पुन: स्थापित करना चाहते हैं। ब्रिक्स देशों के गठबंधन को कमज़ोर करना और डॉलर की प्रभुसत्ता पुन: से बहाल करना भी उसका उद्देश्य है। डोनाल्ड ट्रम्प फिलिस्तीन मामले के हल में भी ईरान को एक बड़े अवरोध के रूप में देख रहे हैं और इस उद्देश्य के लिए वह ईरान में अमरीका पक्षीय सरकार बनाने के लिए भी यत्नशील हैं, ताकि जो ईरान द्वारा पैदा हो रही चुनौती को स्थायी रूप से खत्म किया जा सके।
अपने इन उपरोक्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही डोनाल्ड ट्रम्प ने इज़रायल के सहयोग से ईरान पर पुन: हमला करने का मार्ग चुना है। खेदजनक बात यह कि इस समय अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं, विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र संघ इस भयावह युद्ध को रोकने में अपनी प्रभावी भूमिका निभाने के समर्थ नहीं हो रहा। विगत दिवस फ्रांस की पहल पर संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा कौंसिल की बैठक ज़रूर हुई थी। उसमें अमरीका तथा इज़रायल द्वारा अपना यह पक्ष दोहराया गया कि उन्होंने हमला इसलिए किया है क्योंकि अमरीका और इज़रायल को ईरान से अपने अस्तित्व के लिए गम्भीर खतरा है। दूसरी तरफ ईरान द्वारा इस बैठक में अमरीका और इज़रायल की कड़ी आलोचना की गई और इस हमले को अपनी प्रभुसत्ता का उल्लंघन करार दिया। विश्व की वर्तमान स्थिति और विशेष रूप से खाड़ी देशों में बढ़ रहे तनाव के दृष्टिगत इस बात की बेहद ज़रूरत है कि भारत सहित वे सभी देश जिनका अमरीका, इज़रायल और ईरान से सम्पर्क बरकरार है, वे अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए इस युद्ध को रुकवाने के लिए अधिक से अधिक यत्न करें ताकि विश्व को एक और भयावह युद्ध से बचाया जा सके।

