आओ, थोड़ा प्रकृति के बारे में सोचें
हमने अपने पार्कों को बहुत सुंदर बना लिया है। अगर घर में भी पार्क के लिए कोई जगह छोड़ी गई हो, तो उसे भी एक ही तरह की घास से सजा लिया जाता है। इस तरह प्रकृति को नुकसान होना ही है। हम किसी खाली जगह पर सूखे पत्ते भी पड़े रहने नहीं देते, जबकि उन्हीं सूखे पत्तों के नीचे कीड़े-मकौड़े, तितलियों के अंडे वगैरह आदि सर्दियां व्यतीत करते हैं।
गौरैया, गुटारा आदि पक्षी अलग-अलग तरह की जड़ी-बूटियां और घास के बीज पूरा वर्ष खाते हैं। इसलिए पार्कों को बिल्कुल स्वच्छ रखने का और हमेशा घास काटते रहने का और पेड़ों की अच्छे तरीके से काट-छांट करके रखने का संकल्प सही नहीं है। कई डेरों के पास अधिक ज़मीन होने के बावजूद वहां सिर्फ ताड़ (पाम) के पेड़ लगा दिए जाते हैं। पेड़ों को बढ़ने नहीं दिया जाता, उन्हें पूरी तरह से काट-छांट कर रखा जाता है। यह अच्छी बात है कि पेड़ लगाए जाते हैं, लेकिन उन्हें थोड़ा बढ़ने भी देना चाहिए। अगर घास भी थोड़ी अलग-अलग तरह की हो जाए तो कोई बात नहीं। यदि आस-पास अन्य किस्मों के पौधे अपने आप उग जाते हैं तो उन्हें उगने दें, वे ज़्यादा नहीं बढ़ते। निचले स्तर पर उगने वाले पौधे वाहनों से निकलने वाले पेट्रोल और डीज़ल के धुएं को भी साफ करते हैं। खजूर और ताड़ के पेड़ हमारे इलाके के नहीं हैं। कुछेक जंगली किस्म के अतिरिक्त पंजाब में ज़्यादातर सिर्फ सजावटी पौधों ही लगाए जा रहे हैं। जहां भी नए घर बन रहे हैं, वहां पेड़ लगाया भी जाता है तो वह भी ऐसा सजावटी होता है, जो खासकर गांवों में किसी काम नहीं आता। महिलाएं अक्सर कहती हैं कि पत्ते साफ करने पड़ते हैं, आंगन में गंदगी हो जाती है। लेकिन आप खुद देख लें, ऐसे सजावटी पेड़ों पर पक्षी न तो घोंसला बनाते हैं और न ही उन पर बैठते हैं। पक्षी सिर्फ देसी पेड़ों पर ही बसेरा करते हैं।
गुलमोहर, पलास, देसी अशोक, चांदनी, कनेर, हिमेलिया, गुड़हल, जूंड, बेरी, बबूल, जामुन, पीपल, सरींह आदि बहुत से देसी पेड़ हैं जिन्हें बचाने और सम्भालने की ज़रूरत है। सीधी बात यह है कि हम अन्य क्षेत्रों के मौसम और पानी के हिसाब से उगे पेड़ों की आंख मूंद कर नकल कर रहे हैं। अगर वहां ताड़ के पेड़ हैं, तो साथ ही वहां के प्राकृतिक जंगली पेड़ भी हैं। हमारे घर के सामने पुड्डा द्वारा एक हरित पट्टी (ग्रीन बेल्ट) बनाई है, लेकिन हमारे मोहल्ले के कई लोग इसे पक्का करने पर तुले हुए हैं। मना करने के बावजूद कुछ लोगों ने यह काम किया। मैंने देखा कि 5×5 फुट जगह में 10 तरह की जंगली बूटी और घास उगा हुआ है। उनसे गिरने वाले बीजों खाने के लिए मोर और कई अन्य पक्षी वहां आते हैं।
दीवार के साथ पार्क में ध्रेक, हरसिंगार, कदम और अमलतास के पेड़ लगे हैं। हरसिंगार और ध्रेक के पत्ते और फल हमारे घर पर गिरते हैं। तोते, गौरैया, छोटे उल्लू, मैना और गटारें अपनी तरह-तरह की आवाज़ें निकाल कर रौनक लगाए रखते हैं। गिरे हुए पत्ते या पेड़ों के अवशेष पक्षियों की मीठी आवाज़ के सामने कुछ भी नहीं। फलों के मौसम में तोतों और कबूतरों के झुंड छतों और दीवारों पर आकर बैठ जाते हैं। यह सब कुछ साल के कुछ महीने ही होता है। बारिश के मौसम में पेड़ों पर कुछ कीड़े आ जाते हैं, जो सुंडिया बनकर आंगन में गिर जाते हैं, लेकिन वे भी नुकसानदायक नहीं होते।
मेरे घर से थोड़ी दूर आम, जामुन और ध्रेक के बड़े-बड़े पेड़ थे, लेकिन कीड़ों के डर से लोगों ने सब काट दिए। विगत 7 वर्षों में मोहल्ले के पार्कों और घरों के आस-पास लगभग 70 बड़े पेड़ काटे जा चुके हैं। उनकी जगह बेकार ताड़ के पेड़ लगा दिए गए हैं या जगह खाली छोड़ दी गई है।
कई लोगों के बच्चे विदेश में रहते हैं और वे चाहते हैं कि जहां भी वहां जैसे पार्क हों, सिर्फ घास हो और कोई पेड़ नहीं। लेकिन यहां तो इन चीज़ों की पहले से ही कमी है। आबादी बढ़ रही है और ऊपर से हम धरती को पत्थरों में तबदील किए जा रहे हैं, यह सब बेसमझी है। पत्ते तो कुछ समय के लिए ही झड़ते हैं, जबकि शेष वर्ष इन पेड़ों से स्वच्छ हवा और ठंडक मिलती है। गांवों में भी बड़े पेड़ों की कटाई अंधाधुंध की जा रही है और उनकी जगह ताड़ के पौधे लगाए जा रहे हैं। इस लेख को पढ़ने वाले हर व्यक्ति को अपने आस-पास प्राकृतिक तरीके से फैलने वाले फलदार एवं फूलों वाले देसी पेड़ लगाने के प्रति जागरूक होना चाहिए।



