पाकिस्तान को उसके किए की सज़ा मिल रही है
इस समय पाकिस्तान चारों तरफ से घिरा हुआ महसूस कर रहा है। उसे समझ नहीं आ रहा है कि वह इस स्थिति कैसे बाहर निकले? जिस तालिबान को उसने पोषित किया, आज वही उसके लिए नासूर बना हुआ है। देखा जाए तो इसके लिए भी पाकिस्तान ही ज़िम्मेदार है। अफगानिस्तान से रूस को बाहर निकालने के लिए अमरीका की मदद से अफगान लड़ाकों की फौज तैयार की गई थी, जिन्हें बाद में तालिबान का नाम दिया गया। तालिबान की फौज तैयार करने के नाम पर पाकिस्तान की सेना ने खूब अमरीकी फंड इकट्ठा किया। ऐसा लगता है कि उसने उस समय ही यह भी सोचा होगा कि आगे चलकर वह इन लड़ाकों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ भी करेगा। देखा जाए तो तालिबान का उभार पाकिस्तान की लंबी रणनीति का हिस्सा था।
1989 में जब रूस अफगानिस्तान को छोड़कर चला गया तो तालिबान का अफगानिस्तान पर कब्ज़ा हो गया। पाकिस्तान की तालिबान को लेकर बनाई गई रणनीति सफल हो गई क्योंकि अपने पहले शासन काल में तालिबान पाकिस्तान की कठपुतली बना रहा। कंधार हाइजैक की घटना के दौरान पाकिस्तानी आतंकवादियों को मुक्त करवाने में तालिबान ने पाकिस्तान की बड़ी मदद की थी। पूरा कांड करके भी पाकिस्तान तटस्थ बना रहा, जैसे उसने कुछ किया ही न हो। अमेरिका पर 9/11 के हमले के बाद सारी परिस्थितियां बदल गई जब अफगानिस्तान पर हमला करने के लिए अमरीका ने पाकिस्तान की मदद मांगी। जिस तालिबान को पाकिस्तान ने अपने प्रॉक्सी की तरह पोषित किया था, अमरीका के लिए उसके खिलाफ ही जंग में उतरना पड़ा।
20 साल बाद अमरीका ने अफगानिस्तान छोड़ दिया तो तालिबान एक बार फिर वहां सत्ता में आ गया। 2021 में जब तालिबान सत्ता में आया तो पाकिस्तान में जश्न मनाया गया और इसे अफगानिस्तान की आज़ादी कहा गया। तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद उसका बदला हुआ चेहरा सामने आया। तालिबान को याद रहा कि पाकिस्तानी सेना की मदद से ही अमरीका ने उसके हज़ारों लड़ाकों को मारा था और अफगानिस्तान को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया था। तालिबान ने सत्ता में आने के कुछ दिन बाद ही यह बयान दिया था कि भारत को वह अपना दुश्मन नहीं मानता।
पाकिस्तान का सिरदर्द बने आतंकवादी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) को तालिबान की मदद मिल रही है। तालिबान का कहना है कि उसका टीटीपी से कोई संबंध नहीं है। वह तो पाकिस्तान का संगठन है। दूसरी तरफ टीटीपी आतंकवादी पाकिस्तान में हमला करके अफगानिस्तान में चले जाते हैं। पाकिस्तान चाहता है कि तालिबान टीटीपी के खिलाफ कार्रवाई करे लेकिन तालिबान इसके लिए तैयार नहीं है। देखा जाए तो टीटीपी दोनों देशों के संबंधों के लिए खतरनाक साबित हो रहा है।
तालिबान के अफगानिस्तान की सत्ता में दूसरी बार लौटने के बाद से दोनों देशों के बीच 70 से ज्यादा झड़पें हो चुकी हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह तालिबान और बलोच लड़ाके हैं। ये दोनों पाकिस्तान में हमला करने के बाद सीमा पार करके अफगानिस्तान में चले जाते हैं। इसके अलावा दोनों देशों को विभाजित करने वाली डूरंड रेखा को लेकर भी विवाद है। तालिबान डूरंड रेखा को नहीं मानता है। इसलिए भी दोनों देशों के बीच तनाव बना रहता है। इस समय दोनों देशों के बीच एक खुला युद्ध शुरू हो गया है। यह ताज़ा मामला भी टीटीपी के हमले से जुड़ा हुआ है जिसके जवाब में पाकिस्तानी सेना ने 26 फरवरी की रात अफगानिस्तान पर हवाई हमला कर दिया था। तालिबान का दावा है कि इस हमले में सिर्फ बच्चे और महिलाएं मारे गए हैं जबकि पाकिस्तान का दावा है कि सिर्फ तालिबानी लड़ाके मारे गए हैं। तालिबान ने कहा था कि वो इस हमले का जवाब ज़रूर देगा और उसने ऐसा कर दिया है। 27 फरवरी को पाकिस्तानी सीमा पर बड़ा हमला कर दिया, जिसमें उसने पाकिस्तानी सेना की दर्जनों चौकियों को बर्बाद करने का दावा किया है। तालिबान ने 55 पाकिस्तानी सैनिकों को मारने का दावा किया और कहा है कि उसने कई सैनिकों को बंदी भी बना लिया है।
दूसरी तरफ पाकिस्तान ने इस हमले के जवाब में एक बार फिर अफगानिस्तान पर हवाई हमला कर दिया। देखा जाए तो दोनों तरफ से हमले शुरू हो गए हैं। तालिबान के पास वायुसेना नहीं है और न ही एयर डिफेंस सिस्टम हैं। उसकी असली ताकत उसके वे लड़ाके हैं जो अपने देश के लिए मर-मिटने को तैयार बैठे हैं। पाकिस्तान अपनी नीतियों के कारण प्रत्येक पक्ष से बर्बाद हो चुका है। देखा जाए तो पाकिस्तान आर्थिक रूप से भी इतना कमज़ोर हो चुका है कि वह अफगानिस्तान के साथ लम्बा युद्ध नहीं लड़ सकता। (एजेंसी)



