पुलिस विभाग में सुधार समय की ज़रूरत

अगर हम कनाडा, अमरीका, डेनमार्क, नीदरलैंड, जर्मनी और दूसरे विकसित देशों में पुलिस और आम लोगों के बीच बने विश्वास की बात करें तो हमारे देश में पुलिस और आम जनता के बीच बहुत बड़ा अंतर साफ दिखाई देता है। विकासशील देशों की पुलिस मुसीबत के समय पहुंच कर लोगों की सुरक्षा और मदद करने तथा कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जानी जाती है। विकसित देशों में पुलिस विभाग किसी भी राजनीतिक हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार से मुक्त होने के कारण अपनी पारदर्शिता के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन भारत का पुलिस ढांचा इन देशों से बिल्कुल अलग है, जहां राजनीतिक नेताओं और पुलिस प्रशासन के बीच साझ हमेशा कायम रही है। पंजाब समेत पूरे देश में पुलिस पर सरकारी नियंत्रण होने के कारण यहां राजनीतिक नेतृत्व का हस्तक्षेप बहुत ज़्यादा रहता है। पुलिस प्रशासन तथा लोगों के बीच तालमेल अच्छा नहीं और कुछ पुलिसवालों की वजह से पूरा पुलिस विभाग बदनाम हो चुका है। देश में प्रतिदिन घटित होती घटनाओं को रोकना तथा कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए असामाजित तत्वों तथा आपराधियों को काबू करना पुलिस की ज़िम्मेदारी है। लेकिन पुलिस की गैर-ज़िम्मेदार कारगुज़ारी, आम लोगों पर दबाव डालने का रवैया तथा असामाजिक तत्वों के प्रति ढीली कार्रवाई उन्हें हमेशा संदेह के दायरे में खड़े रखती है।
अगर पुलिस के प्रबंधों की बात करें तो अंग्रेज़ों के समय से शुरू हुए ज़्यादातर प्रबंध आज भी उसी व्यवस्था के अनुसार चल रहे हैं। चाहे कुछ बदलाव हुए भी हैं, लेकिन पुलिस के प्रबंधों में अभी भी बहुत सुधारों की ज़रूरत है। देश की पुलिस आज भी नई तकनीक और हथियारों के इस्तेमाल को लेकर समयानुकूल नहीं है। अक्सर पकड़े जाने वाले अपराधियों और गैंगस्टरों से आधुनिक हथियार बरामद होते हैं जबकि पुलिस अभी भी पुराने हथियारों पर निर्भर है। हमारे देश में पुलिस राजनीतिक नेताओं के अधीन काम करती है। किसी असामाजिक तत्व को पकड़ना या छोड़ना है, यह सब राजनीतिक नेता ही तय करते हैं। अक्सर सत्तारूढ़ पार्टियों के प्रतिनिधि विरोधियों पर बिना वजह मामला दर्ज करवाना अपनी शान समझते हैं। न्याय के लिए भटकते लोगों का आरोप होता है कि उनके साथ धक्का करने वाले सत्तापक्ष के खास लोग लोग होने के कारण हमारी सुनवाई नहीं हो रही है।
विजिलेंस विभाग द्वारा अन्य विभागों के अतिरिक्त अपने पुलिस कर्मचारी भी रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़े जाते हैं। देश भर में पुलिस हिरासत के दौरान यातनाएं या किसी की मौत के समाचार हर दिन अखबारों की सुर्खियां बनते हैं। पुराने ज़माने में समझदार लोग गांवों या मोहल्लों में किसी भी झगड़े को बैठकर सुलझा लेते थे, लेकिन आजकल हर मामला सीधे पुलिस स्टेशन पहुंचता है और बहुत बार पुलिस दोनों पक्षों से पैसे लेकर समझौता करवा देती है। हमारी पुलिस की जांच प्रणाली में गंभीरता की बहुत कमी है, जहां बेगुनाह लोगों को दोषी बना कर कानून की कचहरी में सज़ा दिलवा दी जाती है। पटियाला में कर्नल बाठ मामला पिछले साल से ही सुर्खियों में है, जिसने पुलिस प्रशासन की कारगुज़ारी पर प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं। कर्नल बाठ की पत्नी को इंसाफ और केस की जांच के लिए सी.बी.आई. की मदद तक लेनी पड़ी है।
पुलिसवालों की शारीरिक फिटनेस को बेहतर बनाना आज समय की ज़रूरत है। इनमें से कई कर्मचारी हृदय रोग, शुगर,  उच्च रक्तदाब, चिड़चिड़ापन, मानसिक तनाव के शिकार हो गए हैं। इसका मुख्य कारण कर्मचारियों का देर तक ड्यूटी करने के अतिरिक्त उन पर वरिष्ठ अधिकारियों का दबाव भी है। ज़्यादातर राजनीतिक नेताओं के साथ बड़ी संख्या में पुलिस जवान तैनात रहते हैं, लेकिन ज़्यादातर कर्मचारी इस वी.आई.पी. ड्यूटी से परेशान रहते हैं। पुलिस कर्मचारियों को गर्मी, सर्दी, धूप और बारिश में सड़कों पर भूखे रह कर सुरक्षा ड्यूटी पर खड़े रहना पड़ता है। किसी बड़े नेता के आने पर पुलिस कर्मचारियों को दिन-रात ड्यूटी देनी पड़ती है। सरकारी कार्यालयों में काम करने वाले कर्मचारियों की ड्यूटी का समय आमतौर पर निश्चित होता है, लेकिन पुलिस कर्मचारियों की ड्यूटी का समय या काम के घंटे नियमित नहीं हैं। पुलिस कर्मचारियों की ड्यूटी का समय, उनके लिए ज़रूरी कसरत और प्रशिक्षण, योगा आदि का पुख्ता प्रबंध होना चाहिए। पुलिस के काम में किसी भी तरह का राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए, तभी वे बिना किसी दबाव के अपनी ड्यूटी को पूरी तनदेही और समर्पण के साथ निभा सकेंगे। थानों में अपनी शिकायत लेकर आने वाले लोगों के साथ पुलिस को अच्छा व्यवहार करते हुए उनकी शिकायतें सुननी चाहिएं। पुलिस का रवैया बेगुनाहों के प्रति नरम और न्याय देने वाला तथा असामाजिक तत्वों को सख्ती से सबक सिखाने वाला होना चाहिए।

-मो. 78889-66168

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