स्त्री-श्रद्धा और सौन्दर्य का सांस्कृतिक उत्सव है गणगौर महोत्सव
उत्तर भारत विशेषकर मध्य प्रदेश का मालवा क्षेत्र और राजस्थान में गणगौर का उत्सव बहुत ही श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह वास्तव में मालवा क्षेत्र का एक लोक पर्व है, जिसमें मां गौरी (पार्वती) और इसर (शिव) की पूजा होती है। गण का अर्थ है शिव और गौर का अर्थ गौरी। इस प्रकार गणगौर शिव-पार्वती के दिव्य दांपत्य और सौभाग्य का उत्सव है। इस साल गणगौर उत्सव 4 से 21 मार्च 2026 तक मनाया जायेगा। कई जगहों में इस तारीख में फर्क और उसे 26 मार्च तक मनाये जाने की बात हो रही है। बहरहाल होली के दूसरे दिन से आरंभ होगा चैत्र शुक्ल तृतीया तक यानी लगभग 16 दिनों तक यह उत्सव सम्पन्न होता है। अंतिम दिन भव्य शोभायात्रा और पूजा के साथ इसका समापन होता है।
गणगौर का केंद्र जैसा कि हमने शुरु में ही बताया मां गौरी और भगवान शिव का दांपत्य जीवन है। मां पार्वती ने कठोर तपस्या करके पति के रूप में भगवान शिव को प्राप्त किया था। इसलिए विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए गणगौर का व्रत रखती हैं। जबकि अविवाहित कन्याएं मनचाहे वर की कामना के लिए यह व्रत करती हैं। यह पर्व वास्तव में स्त्री आस्था और आत्मबल का प्रतीक है। यहां गौरी सिर्फ एक देवी नहीं बल्कि संघर्ष, समर्पण और प्रेम की जीवंत प्रतिमा बनकर उभरती हैं। गणगौर केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, यह लोकजीवन का उत्सव है।
गणगौर के समय हर दिन शाम को शादीशुदा महिलाएं पारंपरिक रूप से सजती हैं, हाथों में मेहंदी लगाती हैं तथा मिट्टी या लकड़ी के इसर तथा गौर की प्रतिमाएं बनाती हैं। हर दिन शाम को इकट्ठी होकर गणगौर के गीत गाती हैं, जिन्हें गणगौर गीत कहा जाता है। राजस्थान में विशेषकर जयपुर, उदयपुर, जोधपुर में गणगौर की शोभायात्रा बेहद भव्य होती है। हाथी, घोड़े, लोक नृतक, शाही वेषभूषा और पारंपरिक वाद्य, सब मिलकर इसे एक सांस्कृतिक महोत्सव बना देते हैं। जयपुर में तो गणगौर की सवारी अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों का भी मनमोह लेती है और बड़े पैमाने पर गणगौर के समय विदेशी पर्यटक जयपुर की यात्रा करना पसंद करते हैं।
गणगौर का बसंत ऋतु से भी बेहद संवेदनशील रिश्ता हैं गणगौर ऐसे ऋतु में आता है, जब धरती नवजीवन के रोमांच से भर उठती है। खेतों में नई फसल की लहर, आम के बगीचों में आयी बौरें, सरसों की सुगंध सब मिलकर जीवन में नई ऊर्जा भर देते हैं। ऐसे में यह पर्व प्रकृति और नारी के संबंधों का दर्शनीय रिश्ता बनकर उभरता है। जैसे धरती सृजन करती हैं, वैसे ही स्त्री के जीवन में भी सृजन महत्वपूर्ण होता है। इसलिए गणगौर को स्त्री और सृजन का उत्सव भी कहा जाता है लेकिन गणगौर का सबसे मार्मिक पक्ष है इसका स्त्री सामूहिकता से जुड़ाव। गांव और शहरों में महिलाएं समूह बनाकर गणगौर की पूजा करती हैं। नवविवाहितों को इस अवसर पर मायके से ‘सिंजारा’ भेजा जाता है, जिसमें सुहाग के कपड़े, श्रृंगार की सामग्री, मिठाईयां और पैसे या दूसरी चीजें मायके से विवाहिताओं को भेजी जाती हैं। दरसअल यह पर्व ससुराल पक्ष और मायके के बीच हमेशा के लिए एक भावनात्मक पुल बनाये रखने का भी काम करता है। आज के शहरी जीवन में जब संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, तब गणगौर जैसे सांस्कृतिक पर्व स्त्रियों को उनकी जड़ों से जोड़े हुए हैं।
राजस्थान सरकार विशेष रूप से गणगौर पर्व को एक सांस्कृतिक पर्यटन के रूप में भी विकसित कर रही है। इसलिए इस मौके पर प्रदेश के विभिन्न शहरों और कला केंद्रों में भव्य झांकियां, लोक नृत्य और हस्तशिल्प के मेले लगते हैं। इनसे स्थानीय स्तर पर तो अर्थव्यवस्था मजबूत होती ही है, इससे विदेशी पर्यटक भी इस क्षेत्र विशेष में पर्यटन के लिए आकर्षित होते हैं। यह लोक उत्सव धार्मिक आयोजन के साथ-साथ लोक कला, शिल्प और सांस्कृतिक पहचान भी निर्मित करता है। क्योंकि गणगौर के अवसर पर बिकने वाली विभिन्न पारंपरिक वस्तुएं जैसे लहरिया साड़ियां, चूड़ियां, मिट्टी की प्रतिमाएं, इन सबका ग्रामीण कलाकारों, दस्तकारों और बुनकरों से रिश्ता होता है।
इसलिए यह उत्सव उनकी आय का अच्छा स्रोत बनता है। आज सोशल मीडिया के दौर में गणगौर के गीत और झांकियां डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी लोकप्रिय हो रही हैं, जो पीढ़ी पारंपरिक वेषभूषा में तस्वीरें साझा कर इस लोक पर्व को नये आयाम दे रही हैं। फिर भी इस पर्व की मूल भावना श्रद्धा, प्रेम और सामूहिक उत्साह ही है। गणगौर हमें सिखाता है- श्रद्धा में शक्ति है, सौदर्य में संस्कृति और सामूहिकता में समाज की आत्मा बसती है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर





