जानें चाय की चुस्कियों की दास्तान

सुबह-सुबह आखें खुलते ही सबसे पहले चाय की ही तलब लगती है। सुबह और शाम अगर चाय नहीं पी तो दिन अधूरा सा लगता है। भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर में आपको चाय के शौकीन हर घर में मिल जायेंगे। ये हर मौसम में पीये जाने वाला पसंदीदा पेय बन गया है। चाय का इतिहास जितना रोचक है इसकी उतनी ही कहानियां हैं। तकरीबन 2700 ई. पूर्व चीनी शासक शेन नुगं अपने बगीचे में पेड़ के नीचे बैठे गर्म पानी पी रहा था तभी तेज हवा चली और पेड़ की एक पत्ती उसके पानी में गिर गई जिससे पानी का रंग बदल गया। फिर उसमें से खुशबू आने लगी तथा पीने के बाद वह पानी बहुत ही स्वादिष्ट लगने लगा और अनायास ही चाय का अविष्कार हो गया।  दूसरी कहानी के अनुसार 750 ई. पूर्व बौद्ध भिक्षुओं ने इसका उपयोग किया था। जब बौद्ध भिक्षु गहन चिंतन करते और उन्हें नींद आने लगती थी तो नींद से बचने के लिए वे ‘बुश’ की पत्तियों को चबाना शुरु करते जिससे उन्हें नींद नहीं आती...। ‘बुश’ की पत्ती का उपयोग भिक्षुओं ने नींद त्यागने की औषधि के रूप में किया। बाद में यही पौधा चाय के पौधे के रूप में पहचाना गया। 6वीं शताब्दी में चाय पीने की परम्परा चीन से जापान पहुंची। चीन से चाय का व्यापार करने का पहला अधिकार पुर्तगाल को मिला। एशिया महाद्वीप में चाय का प्रवेश 19वीं शताब्दी में हुआ था, जब ब्रिटिश शासकों ने सीलोन और ताइवान में चाय की खेती शुरू की थी। सन् 1824 में बर्मा और असम की पहाड़ियों में चाय के पौधे पाये गये। अग्रेंजो ने भारत में चाय का उत्पादन 1836 में शुरू किया। पहले खेती के लिए बीज चीन से आते थे फिर बाद में असम के चाय के बीजों का प्रयोग किया जाने लगा। भारत में चाय का उत्पादन ब्रिटेन के बाजारों में चाय की मांग को पूरा करने के लिए  किया जाता था। 19वीं शताब्दी तक चाय की मांग भारत में नहीं थी। 19वीं शताब्दी में जब अंग्रेजों का भारत में बहुतायत आगमन हुआ तो उन्हें पता चला कि असम के लोग काले रंग का एक पेय पदार्थ पीते हैं जो पत्तियों से बनता है। तब ये चाय के बीज व पौधों को लेकर कोलकाता में शोध किया गया। ब्रिटिश सरकार ने असम-चाय की शुरुआती पैदावार पर पैसा नहीं खर्च करने का फैसला किया, लेकिन जब बाद में असम चाय की कीमत समझ आई तो  इसका व्यापार करने का फैसला किया और बॉटनिकल गार्डन बनवाये और चाय के बगान तैयार करवाये। चाय के व्यापार ने भारत में बहुत विकास किया और यही कारण है कि भारत चाय के उत्पादन में नंबर वन देश है। असम में भारत का सबसे बड़ा चाय अनुसंधान केन्द्र है, जो असम के जोरहाट में टोकलाई पर स्थित है। असम ही पूरे देश में एक ऐसी जगह है जहां पर चाय एक समतल जमीन पर उगाई जाती है, इसी कारण यहां की चाय का स्वाद भी कुछ अलग व खास होता है। असम से सटे दार्जिलिंग में साल 1841 से चीनी चाय के पौधे उगाये जाते हैं। इस चाय की कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाजार में काफी अधिक है साथ ही इसकी मांग भी बहुत अधिक है। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में हरी व काली चाय की पैदावार होती है व दक्षिण भारत के नीलगिरि के पठारी क्षेत्र में एक विशेष प्रकार का फूल खिलता है जिसका नाम ‘कुरिंजी’ है। यह 12 वर्ष में एक बार खिलता है। इसकी महक के कारण यहां उगने वाली चाय में एक असाधारण सुगंध व स्वाद महसूस होता है। यहां उगने वाली चाय की गुणवत्ता श्री लंका में उगने वाली चाय के समान होती हैं। चाय के पौधे की आयु 100 वर्ष होती है। अगर इन्हें काटा न जाये तो यह नीम के पेड़ जैसे विशाल हो जातें हैं। इनकी जड़े इतनी मजबूत होती हैं कि आसानी से उखाड़ना संभव नहीं होता। बगानों मे खेती और पत्तियों को तोड़ने से लेकर हम तक पहुंचने से पहले चाय को अनेक प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। ब्रिटिश संसद ने व्यापार के संबंध में नया कानून बनाया था। इस कानून के अनुसार ईस्ट इंडिया कम्पनी को अमरीका में चाय भेजने की अनुमति दी गई थी। चाय के व्यापार को बढ़ाने के लिए मूल्य में कमी की गयी थी, फलस्वरूप अमरीकनों को सस्ती चाय मिल जाती थी और ईस्ट इंडिया कम्पनी को भी लाभ मिल जाता था लेकिन अमरीकी उपनिवेशवासियों ने इसे बिट्रिश सरकार की चाल समझा। उन्होंने सोचा कि यदि संसद व्यापारिक मामलों पर एकाधिकार कायम कर लेगी तो इससे उपनिवेश में व्यापार को हानि होगी। ईस्ट इंडिया कम्पनी के कुछ जहाज बोस्टन बंदरगाह में ठहरे हुए थे। बोस्टन के नागरिकों ने जहाज को लूट लिया और लगभग 342 चाय के बक्सों को समुद्र में फेंक दिया। इतिहास में यही घटना ‘बोस्टन-टी-पार्टी के’ नाम से मशहूर हुई।
अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस की शुरुआत भारत में 2005 में की गयी लेकिन एक साल के बाद इसे श्री लंका में भी मनाया गया और वहां से विश्व में फैला। चाय दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य चाय बगान से लेकर चाय की कंपनियों तक काम करने वाले श्रमिकों की स्थिति की ओर ध्यान खींचना है। पानी के बाद चाय ऐसा पेय है जो दुनिया में सबसे ज्यादा पीया जाता है। इसकी शुरुआत केवल सर्दियों में दवाई की तरह पी जाने से हुई थी किन्तु इसे रोज पीने की शुरुआत भारत में हुई। यह अफगानिस्तान व ईरान का राष्ट्रीय पेय है। आज के समय में इसकी 1500 से भी ज्यादा किस्में हैं। (सुमन सागर)

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