कहानी- भेडिया
‘तड़ाक’ उसने एक जोरदार तमाचा उसके गाल पर जड़ दिया था।
तमाचा जड़ने के साथ ही उसका पूरा शरीर क्रोध में कांप रहा था। आंखों में अंगारे दहक रहे थे। उसकी आवाज में बिजली-सी कौंध रही थी। वह किसी भेड़िए की तरह गुर्रा रहा था। अपनी कर्कश आवाज में वह लगातार चीख-चिल्ला रहा था- ‘कहां है मेरा शेरु....उसे तुम्हारे हवाले किया था और कहा था कि उसका ध्यान रखना, उसे समय पर खाना खिलाना...पानी पिलाना और उसे बगीचे में टहला लाना। बोलो कहा था न ! तुम इतना सा भी काम नहीं कर सकी? आखिर तुम करती क्या हो बैठे-बैठे...मलाईदार माल खा-खाकर मुटिया रही हो। बताओ...कहां है मेरा शेरु....और न बतला पाई तो...?
वह ‘तो’ पर आकर अटक गया था। अटक गई थी उसकी जुबान। वह क्या कुछ नहीं कर सकता? कल्पना मात्र से उसके शरीर में कंपकंपी सी होने लगी थी। वह जानती है कि वह नीचता की सारी हदें पार कर सकता है, वह आदमी से हैवान हो सकता है...उसकी दुर्गति कर सकता है। आए दिन वह अपनी नीचता पर उतर आता है और उसकी इतनी जमकर पिटाई कर देता है कि लाख दवा लगाने और सिंकाई करने के बाद भी जिस्म से दर्द नहीं जा पाता।
‘जी.....मुझे नहीं पता...वह अचानक कहां चला गया। खूब ढूंढ़ने की कोशिश की...लेकिन उसे ढूंढ़ नहीं पायी।’
‘बकवास करती है... अगर वह नहीं मिला तो समझ लेना....मुझसे बुरा और कोई नहीं होगा।’ कहते हुए वह भारी कदमों से चलता हुआ शीघ्रता से बाहर निकल गया।
वह किसी कटे हुए वृक्ष की तरह बिस्तर पर गिर पड़ी और देर तक आंसू बहाती रही थी। देर तक रोते रहने के बाद वह उठ बैठी और वॉशरुम में घुस गई और दीवार पर टंगे आईने में अपना चेहरा देखने लगी। रो-रोकर उसकी आंखें सूज आयी थीं। एक हसीन चेहरे पर विकृति की परछाईयां साफ-साफ देखी जा सकती थी। गाल पर अब भी पांचों उंगलियों के निशान मौजूद थे। उसने नल खोला। शीतल जल के छींटे चेहरे पर डाले। दहकते हुए गालों पर शीतल जल की बूंदों के पड़ते ही उसे राहत सी मिलने लगी थी। वह देर तक ऐसा करती रही।
वाशरुम से निकलकर वह एक सोफे पर बैठ गई। एक विशाल कक्ष में वह थी और उसकी तनहाईयां थी। सफेद हंस की तरह उजले बीते दिनों की याद आती, तो उसकी आंखे मुस्कुरा उठती। और वर्तमान में बीत रहे कष्टदायी दिनों की याद करते ही, उसकी आंखों से पुन: गरमा-गरम आंसू टप-टपाकर झरने लगते। देर तक अनमनी सी बैठी रहने के बाद वह उठ खड़ी हुई और छत पर निकल आयी।
शीतल पवन के झंकोरों ने उसे अपने में आलिंगनबद्ध कर लिया। सुखद शीतल हवा के झोंकों में झूलते हुए उसे अच्छा लगने लगा था। दिन भर का थका-हारा सूरज, पहाड़ी के उस पार उतरकर अपने घर जाने की तैयारी में था। शाम को छत पर बैठी कांता सूरज को अस्ताचल में जाता देखती रही थी। ललछौंही किरणों से पीपल के पत्ते संवलाने लगे थे। पक्षियों के दल लौटने लगे थे। वे अपने मुंह में दाना-चुग्गा भर लाई थे, अपने शिशुओं के लिए। दाना-चुगा खिला देने के बाद वे आपस में बतियाने लगे। दूर-दूर तक उड़ कर जाते, फिर वापस लौट आते। शायद वे अपना कौशल दिखा रहे थे। सारे पक्षी उसकी बिदाई में सांध्य गीत गा रहे थे। बूढ़े पीपल के देह में झुरझुरी सी भर आयी थी। वह भी तालियां बजा-बजाकर पक्षियों का उत्साहवर्धन कर रहा था।
सूरज अपनी अंतिम किरणों का जाल समेटे पहाड़ के पीछे छिप गया और आसमान में हल्का-सुरमई अंधियारा घिरने लगा, जो क्रमश: धीरे-धीरे गहराता जा रहा था। अपने से बेखबर कांता दीवार से पीठ टिकाए प्रकृति के नित-नूतन बदलते रुप को देख रही थी। पंछियों का सामूहिक गान और अपने बच्चों के प्रति उमड़ आए स्नेह को देखते ही उसे अपनी दोनों बेटियों प्रभा एवं प्रीति और एकलौते पुत्र अभिजीत की याद हो आई। कहने को तो वे उसके पुत्र और पुत्रियां हैं, लेकिन समय की प्रचण्ड गति से चलती आधुनिक हवा उन्हें दूर उड़ा ले गई है। प्रभा अपने बाय-फ्रेंड के साथ डेटिंग पर चली गई है, बिना बतलाए और सूचना दिए, प्रीति का कुछ अता-पता नहीं है, शायद वह भी अपने किसी आशिक के साथ रंग-रेलियां मनाने निकल गई हो और अभिजीत अमरीका की सड़कों पर गटरमस्ती कर रहा होगा। इन तीनों में से कोई उसके पास होता तो वह उसके कांधे पर सिर टिकाकर रो तो सकती थी... अपना जी हल्का तो कर सकती थी लेकिन समय की प्रचंड आंधी ने उसका सबकुछ उजाड़ दिया था। अब करे भी तो क्या करे कांता...किसे सुनाए अपने दिल का दुखड़ा...किसे दिखाए अपने तन पर लगे जख्मों को....? किसे बतलाए कि राजेश अब पहले जैसा नहीं रह गया है... और बच्चे उससे छिटककर दूर जा चुके है और वह निहायत अकेली नारकीय जिन्दगी जी रही है। रेत पर पड़ी मछली की तरह छटपटाती कांता अपने अतीत के गलियारों में उतरकर चक्कर काटने लगी। यादों के पखेरु कभी पकड़ाई में आते तो कभी हाथ आते-आते फुर्र से उड़ जाते।
बहुत खुश थी कांता अपनी छोटी सी दुनिया में, एक पतली सी तंग गली में उसका अपना छोटा सा आशियाना था। वह थी, तीनों बच्चे थे और संग था राजेश, जो उसके सपनों की दुनिया को नए-नए रंगों से रंगीन बनाता था, उसे हंसाता, खुद हंसता, गुदगुदाता और रोम-रोम में तरुणाई जगा जाता था। जीवन के कठोर रास्ते पर चलने के पहले उसने इसी तरह का सपना पाल रखा था कि उसका अपना एक छोटा सा आशियाना होगा, प्यारे-प्यारे बच्चे होंगे और होगा एक प्यारा सा राजकुमार, जो उसे अपनी बाहों के हिंडोलों में झुलाता रहेगा।
उसके सारे सपने हकीकत में बदलने लगे थे। उसे राजेश जैसा आदर्श पति जो मिल गया था। उसे पाकर वह निहाल हो गई थी। राजेश जंगल विभाग में स्टेनों के पद पर कार्यरत था। एक सीमित आय थी उसकी। बावजूद इसके उसकी घर-गृहस्थी बड़े आराम से चल रही थी। उसके जीवन में वह क्षण भी आ उपस्थित हुआ, जब वह मां बनने जा रही थी। शीघ्र ही वह एक बेटी की मां बन गई। राजेश के अनुपस्थिति में उसका सारा समय प्रभा के देखरेख और साज-संभार में निकल जाता। फिर आई दूसरी बेटी प्रीति। जैसा नाम वैसे ही सीरत-सूरत, अपनी प्यारी-प्यारी बेटियों के संग वह जी भर के बतियाती, उन्हें संस्कारित करती और समय-समय पर नेक सीख देना नहीं भूलती। दो-दो बेटियों के होने के बावजूद उसे लगता कि एक पुत्र और हो जाए, तो वह निहाल हो उठेगी। सपना सच हुआ और अभिजात का उसके जीवन में पदार्पण हुआ। इस तरह बहुत खुश थी कांता अपनी इस छोटी सी गृहस्थी में।
राजेश भी व्यस्त रहता अपने कार्यालयीन कामों में। वह हर काम चुटकी बजाते हल कर ले आता। दिन भर का थका-मांदा होने के बावजूद भी उसके चेहरे पर हंसी खेलती रहती। कार्यालय के सभी अधिकारी, यहां तक की स्टॉफ का हर छोटा-बड़ा कर्मचारी उसके व्यवहार से खुश रहता था। यही सब कारण था कि वह सबका चहेता बना हुआ था। शाम के ठीक छ: बजे वह अपना केबिन बंद कर सीधे घर चला आता। कांता और बच्चों के संग हो लेता। बेहद-बेहद खुश थी कांता अपनी छोटी से दुनिया में, जिसमें कई-कई इंद्रधनुष एक साथ ऊग आए थे। कभी वह एक रंग से खेलती, तो कभी दूसरे से, कभी तीसरे से।
(क्रमश:)



