एक और युद्ध
विगत कुछ दिवसों से ईरान का अमरीका और इज़रायल के साथ तनाव बढ़ता दिखाई दे रहा था। अमरीका और ईरान के बीच जैनेवा और कई अन्य स्थानों पर अप्रत्यक्ष रूप से बातचीत भी हो रही थी, ताकि एक और युद्ध को टाला जा सके, परन्तु ये यत्न सफल नहीं हो सके। अमरीका और इज़रायल ने एक बार फिर ईरान पर एक बड़ा हमला कर दिया है। ईरान की राजधानी तेहरान में अल-जज़ीरा के पत्रकार ने खबर दी है कि तेहरान में यूनिवर्सिटी स्ट्रीट तथा जम्हूरी एरिया में मिसाइलों से हमले हुए हैं। यह भी समाचार आया है कि ईरान के सुप्रीम नेता आयतुल्ला खामनेई के निवास स्थान के निकट भी मिसाइल के साथ हमला हुआ है, परन्तु उस समय वह उस स्थान पर मौजूद नहीं थे। उन्हें किसी सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया है। ईरान के अलग-अलग अन्य शहरों इसफहान, कोम, कर्ज और करमानशाह में भी धमाके सुनाई दिए हैं। इसकी प्रतिक्रिया-स्वरूप ईरान ने भी अपनी दूर तक मार करने वाली मिसाइलों से कतर, कुवैत, यू.ए.ई. और बहरीन में अमरीकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। इज़रायल में भी कई स्थानों पर ईरानी मिसाइलें गिरी हैं और धमाके सुनाई दिए हैं। इज़रायल ने देश में आपात्काल की घोषणा कर दी है और ज़रूरी कार्यों के अतिरिक्त अन्य सभी जन-गतिविधियों पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। खाड़ी तथा अन्य बहुत से देशों ने भी अपने हवाई क्षेत्र बंद कर दिए हैं।
इस हमले संबंधी जानकारी देते हुए अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने स्पष्ट रूप से यह कहा है कि ईरान की सेना और उसके परमाणु हथियारों से अमरीका के अलग-अलग देशों में स्थित सैन्य ठिकानों और यहां तक कि अमरीका को भी ़खतरा है। इसलिए यह बड़ी कार्रवाई की गई है। अमरीका के राष्ट्रपति ने यह भी कहा है कि ईरान के साथ पिछले दिनों में अलग-अलग स्तर पर बातचीत की गई थी। हम उनके परमाणु हथियारों और लम्बी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों को खत्म करना चाहते थे परन्तु इसके लिए ईरान के साथ सहमति नहीं बनी। उन्होंने ईरान के लोगों को यह भी कहा कि वे अपने देश के तानाशाह शासकों का विरोध करें और देश का नियंत्रण अपने हाथ में ले लें। यह उनके लिए आज़ादी हासिल करने का अवसर है। अमरीका के राष्ट्रपति के इस बयान से यह स्पष्ट हो जाता है कि वह सिर्फ ईरान के परमाणु हथियारों और लम्बी दूरी की मिसाइलों को ही खत्म नहीं करना चाहते, अपितु ईरान में सत्ता परिवर्तन भी चाहते हैं। उनका उद्देश्य यह है कि ईरान की ओर से अमरीका और इज़रायल को कोई परमाणु ़खतरा न रहे और इसके साथ ही ईरान के तेल स्रोतों पर भी वेनेजुएला की भांति उनका कब्ज़ा हो जाए।
दूसरी तरफ इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी यह कहा है कि ईरान की ओर से दरपेश ़खतरे को खत्म करने के लिए अग्रिम रूप से इज़रायल द्वारा हमला किया गया है। उन्होंने इस हमले में सहयोग देने के लिए अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भी खुल कर प्रशंसा की।
यहीं यह भी वर्णनीय है कि विगत वर्ष भी जून में अमरीका और इज़रायल ने अपने-अपने तौर पर ईरान पर हमले किए थे। अमरीका ने तो मिसाइलों के अतिरिक्त अपने लड़ाकू विमान भेज कर ईरान के सैन्य ढांचे और अन्य महत्त्वपूर्ण संस्थानों को भी तबाह करने के लिए हमले किए थे। इज़रायल द्वारा भी उस समय व्यापक स्तर पर ईरान पर हमले किए गए थे, परन्तु इन हमलों के बावजूद ईरान के परमाणु हथियार सुरक्षित रहे और उसका सैन्य ढांचा भी बरकरार रहा। अमरीका और इज़रायल को अब फिर से यह ़खतरा पैदा हो गया था, कि ईरान अभी भी परमाणु हथियार बनाने की गतिविधियों में लगा हुआ है और वह अपनी सैन्य शक्ति भी बढ़ा रहा है। इसी कारण उनकी ओर से ईरान पर पुन: हमले किए गए हैं।
पिछले कई वर्षों से रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध जारी है जिसमें हज़ारों लोग मारे गए हैं और यह युद्ध अभी भी रुकने का नाम नहीं ले रहा। हमास द्वारा 7 अक्तूबर, 2023 को इज़रायल पर हमला किए जाने के बाद इज़रायल ने निरन्तर गाज़ा पट्टी में टैंकों और लड़ाकू विमानों के साथ बड़े हमले किए थे और गाज़ा पट्टी को एक तरह से खण्डहर में तबदील कर दिया गया है। इस लड़ाई में लगभग 80 हज़ार के फिलिस्तीनी मारे गए हैं। इस मामले का अभी तक कई हल नहीं निकाला जा सका। अब फिर से अमरीका और इज़रायल द्वारा ईरान पर हमला करने से मध्य एशिया में एक बड़े युद्ध छिड़ने का ़खतरा पैदा हो गया है। इस समय विश्व में अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की अनियंत्रित नीतियों के कारण पहले ही अस्थिरता पैदा हो चुकी है। इस ताज़ा हमले से विश्व भर में और भी ज्यादा राजनीतिक अस्थिरता बढ़ने की सम्भावना है। नि:संदेह अमरीका और इज़रायल द्वारा किए गए इस ताज़ा हमले से ईरान में भारी विनाश होने की सम्भावना है, क्योंकि ईरान लम्बी अवधि तक अमरीका का सामना नहीं कर सकता। फिर भी यह युद्ध क्या रूप लेता है और कब तक चलता है और इसमें दो और महा-शक्तियां चीन और रूस की भूमिका क्या रहती है, यह देखने वाली बात होगी। इस युद्ध से भारत पर भी कई तरह के प्रभाव पड़ सकते हैं, क्योंकि खाड़ी देशों में अधिक संख्या में भारतीय बसते हैं। युद्ध के कारण अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतें भी बढ़ सकती हैं, और विश्व स्तर पर सप्लाई भी प्रभावित हो सकती है। भारत को ऐसे अस्थिरता वाले समय में बड़ी सतर्कता से अपनी विदेश नीति में संतुलन बना कर रखने की ज़रूरत होगी।

