विज्ञान ने समाज में नई चेतना पैदा की
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सीवी. रमन और रमन इफेक्ट : 28 फरवरी को महान विज्ञानी नोबेल पुरस्कार से सम्मानित और रमन इफेक्ट से प्रसिद्धि पाए डॉक्टर सी.वी. रमन की स्मृति में राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया जाता है। 36 वर्ष की आयु में फेलो ऑफ रॉयल सोसाइटी 40 वर्ष के हुए तो रमन इफेक्ट से जाने गए, जिन्होंने विश्व को चौंका दिया और 42 वर्ष की उम्र में नोबेल विजेता हो गए। उसके बाद अनेक कीर्तिमान स्थापित किए और भारत रत्न, लेनिन शांति पुरस्कार से सुशोभित हुए। अपनी अंतिम सांस तक विज्ञान की सेवा की और 1970 में 82 वर्ष की आयु में निधन हुआ। उनकी खोज रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी दुनिया भर में आज भी उपयोगी है। लाखों प्रयोगशालाओं में इसका इस्तेमाल होता है। सामान्य भाषा में समझें तो यह केमिस्ट्री साइंस, दवाइयों की जांच, कैंसर टिश्यू और यहां तक कि असली-नकली हीरे की पहचान करने में भी काम आता है। अत्यधिक सेंसिटिव होने से लेज़र की रोशनी और संवेदनशील डिटेक्टर से ही इसे समझा जा सकता है।
उनका एक योगदान यह भी है कि उन्होंने अपनी कमाई से रमन रिसर्च इंस्टिच्यूट, बैंगलोर की स्थापना की। इंडियन इंस्टिच्यूट आफ साइंस के पहले भारतीय निदेशक बनने का श्रेय उन्हें मिला। देशवासियों को विज्ञानी सोच का मंत्र दिया और विज्ञान सम्मत दृष्टिकोण अपनाने पर बल दिया। इस का परिणाम यह हुआ कि लोगों में अंधविश्वास और भ्रम की स्थिति को समझने की क्षमता विकसित होने लगी। समाज में एक नई चेतना पैदा हुई।
भारत का विज्ञान और अनुसंधान : भारत में वैज्ञानिक अनुसंधान और तथ्यों के आधार पर खोज करने की कार्यशैली बहुत प्राचीन है। उदाहरण के लिए सिंधु घाटी सभ्यता में शहरों की योजना, जल और सीवर प्रणाली की व्यवस्था, किसी भी स्थान का विकास करने से पहले नदियों का समीप होना, उनके बहाव की जानकारी और वनक्षेत्रों की आवश्यकता तथा नगर और नागरिकों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त उपाय करने से होती थी। यही कारण है कि इतिहास में नदियों के प्रकोप, बेमौसम बारिश और पहाड़ों के दरकने तथा बादलों के फटने की घटनाएं सामान्यतया नहीं मिलतीं। संस्कृत तथा अन्य भाषाओं में लिखे गए शोध और भारत के प्राचीन ग्रंथ और महत्वपूर्ण पांडुलिपियां विदेशी आक्रांताओं ने या तो नषट कर दीं या उनकी लूटपाट की गई और बहुत-से देश उनके आधार पर अपने यहां विभिन्न तकनीक विकसित करने लगे।
अब हम इस बात पर आते हैं कि आज़ादी के बाद देश में सीएसआईआर, आईसीएआर और आईआईटी जैसी विज्ञान और प्रौद्योगिकी को समर्पित संस्थाएं शुरू करने का कार्य इसलिए किया कि भारत में कृषि और उद्योग की ज़रूरत के अनुसार तनकीन विकसित की जाए और उनका उपयोग कर देश को संपन्न किया जाए। प्रयोगशालाओं की स्थापना हुई और आशा की गई कि देश के किसानों, उद्यमियों और युवाओं की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर कृषि की उन्नत और उच्च गुणवत्ता वाली तकनीकों का विकास होगा।
सरकार और संबंधित संस्थाओं के लोग उन लोगों से संपर्क करना भूल गए जिनके लिए यह सब काम हुआ था। मतलब यह कि किसान और उद्यमी को यह पता ही नहीं लगा कि उनके उपयोग के लिए इतना बड़ा काम हुआ है। जो किसान और उद्यमी थोड़ा जागरूक थे, उन्होंने इनका लाभ बेशक उठाया। सही सर्वेक्षण किया जाए तो पता चलेगा कि अधिकतर उपभोक्ताओं को यह ज्ञान ही नहीं है कि ऐसी भी संस्थाएं देश में हैं जो उनके लाभ के लिए काम कर रही हैं। किसान कहता है कि उसके पास उच्च गुणवत्ता वाली तकनीक और उपकरण नहीं है और विदेशों से आयात करने की उसकी हैसियत नहीं है, इसलिए वह अपनी उपज कैसे बढ़ाये। यही हाल उद्यमी का है क्योंकि उस तक नवीनतम खोज पहुंचाये जाने की कोई व्यवस्था ही नहीं है। हालांकि जब इन सब संस्थानों की स्थापना हुई थी तो तय यही किया गया था कि विकसित तकनीक उनके द्वार तक पहुंचेगी।
क्या उम्मीद की जा सकती है : राष्ट्रीय विज्ञान दिवस पर सरकार और संबंधित संस्थानों से यह अपेक्षा करना गलत नहीं होगा कि ऐसी नीति बने कि जैसे ही कोई नवीनतम खोज या आधुनिक उपकरण अथवा वैश्विक स्तर की कोई तकनीक ईजाद की जाती है तो वह बिना समय गंवाए भारतीय उद्यमियों, किसानों और युवाओं तक पहुंचे। यह भी ध्यान रहे कि इसका उपयोग और उपलब्धता पहले देश में हो और उसके बाद उसे विदेशों को बेचा जाए। इसके साथ ही उसके दाम इतने कम हों कि जो उपयोगकर्ता है, वे इनके इस्तेमाल के लिए अपनी जेब के पैसों को न गिने, मतलब न के बराबर कीमत पर यह उसे उपलब्ध हों।
हमारे देश में प्रतिभा सम्पन्न और कार्यकुशल तथा सक्षम युवाओं की कमी नहीं हैं लेकिन उनके लिए देश में समुचित साधन न होने से या तो वे कुंठाग्रस्त हो जाते हैं अथवा जरा सा भी मौका मिलने पर विदेशों में पलायन कर जाते हैं। हमारे ही मूल के लोगों ने विज्ञान के क्षेत्र में दुनिया भर में नाम कमाया है जबकि देश में अगर वे होते तो उनकी उपलब्धियां भारतीय कहलातीं। सरकार को यह सोचना ही नहीं, बल्कि करना होगा कि देश से प्रतिभा पलायन न हो। ऐसा तभी हो सकता है जब उनके लिए देश में ही समुचित सुविधाएं, उनकी योग्यता के अनुसार वेतन और अन्य सुविधाएं मिलें। यह भी हो कि यदि उन्हें कुछ नया सीखने के लिए विदेशों में उच्च स्तरीय प्रशिक्षण के लिए भेजा जाए तो वे हर हालत में भारत लौटकर आयें और देश को अपने वैश्विक ज्ञान से समृद्ध करें। यह होने पर ही हम वास्तविक रूप से आत्मनिर्भर बन सकते हैं।



