स्वतंत्रता संग्राम के महानाकय चन्द्रशेखर आज़ाद  

यह देश के लिए बहुत बड़े गौरव की बात है कि भारत का इतिहास महानायकों की गाथाओं से भरा पड़ा है। आज 27 फरवरी को एक ऐसे महान स्वतंत्रता संग्राम के महानायक का बलिदान दिवस है जिन्होंने कहा था, ‘मैं आज़ाद था, आज़ाद हूं और आज़ाद ही रहूंगा’ और ऐसा करके भी दिखाया। उनका जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्य प्रदेश के भाबरा गांव (वर्तमान अलीराजपुर जिला) में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने अपने गांव में प्राप्त की। तत्पश्चात वह बनारस (काशी) चले गए।  उन्होंने बनारस में रहते हुए संस्कृत की शिक्षा ग्रहण की। 
वर्ष 1921 में जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया, तब युवा चंद्रशेखर भी उसमें कूद पड़े। वह मात्र 15 वर्ष के थे, परन्तु उनके हृदय में स्वतंत्रता की ज्वाला धधक रही थी। आंदोलन के समय अंग्रेज़ सरकार द्वारा उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जब उन्हें न्यायालय में प्रस्तुत किया गया तब न्यायाधीश ने उनका नाम पूछा, तो उस युवक ने निर्भीक स्वर में कहा, ‘मेरा नाम आज़ाद है, पिता का नाम स्वतंत्रता और निवास स्थान जेल।’ उनके इस साहसिक उत्तर से अंग्रेज़ अधिकारी क्रोधित हो उठे और उन्हें 15 कोड़ों की सज़ा दी गई। प्रत्येक कोड़े के साथ वे ‘भारत माता की जय’ का उद्घोष करते रहे। तभी से वे ‘चंद्रशेखर आज़ाद’ कहलाए।
असहयोग आंदोलन वापस लेने पर कई युवाओं को निराशा हुई, किंतु चंद्रशेखर आज़ाद ने सशस्त्र क्रांति का मार्ग अपनाया। वह हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े और शीघ्र ही उसके प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए। उनका उद्देश्य था—ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंक कर भारत में स्वतंत्र और समाजवादी व्यवस्था की स्थापना करना। आज़ाद का व्यक्तित्व अनुशासनप्रिय, साहसी और दूरदर्शी था। वह अपने साथियों को कठोर प्रशिक्षण देते थे और संगठन की गोपनीयता बनाए रखने पर विशेष ध्यान देते थे। वह कहते थे कि क्रांतिकारी का जीवन व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र के लिए समर्पित होता है।
क्रांतिकारी आंदोलन के अंतर्गत 1925 में काकोरी ट्रेन डकैती की योजना बनाई गई, जिसका उद्देश्य सरकारी खज़ाना लूट कर संगठन के कार्यों के लिए धन जुटाना था। इस योजना में कई क्रांतिकारी शामिल थे। यद्यपि कई साथियों को गिरफ्तार कर फांसी दे दी गई, परंतु आज़ाद अंग्रेज़ों की पकड़ से बाहर रहे। उन्होंने संगठन को पुन: संगठित किया और नई ऊर्जा के साथ स्वतंत्रता संग्राम को आगे बढ़ाया। वह सदैव अपने साथियों का मनोबल बढ़ाते और उन्हें देश के लिए समर्पित रहने की प्रेरणा देते थे।
27 फरवरी, 1931 का दिन भारतीय इतिहास में अमर हो गया जब उस दिन इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के अल्फ्रे ड पार्क में चंद्रशेखर आज़ाद अपने एक साथी से मिलने गए थे। अंग्रेज़ पुलिस ने गुप्त सूचना पर पार्क को चारों ओर से घेर लिया। आज़ाद ने बहादुरी से मुकाबला किया और कई घंटों तक अकेले ही पुलिस से संघर्ष करते रहे। जब उनकी अंतिम गोली शेष रह गई, तो उन्होंने उसे स्वयं पर चला दिया, ताकि वे अंग्रेजों के हाथ जीवित न पकड़े जाएं। इस प्रकार उन्होंने अपने संकल्पक—आज़ाद थे, आज़ाद हैं और आज़ाद ही रहेंगे को सत्य सिद्ध कर दिया। उनके बलिदान के बाद अल्फ्रेड पार्क का नाम बदल कर चंद्रशेखर आज़ाद पार्क कर दिया गया। आज भी वह स्थान उनके अदम्य साहस की गाथा सुनाता है।
चंद्रशेखर आज़ाद केवल एक क्रांतिकारी योद्धा ही नहीं थे, बल्कि उच्च आदर्शों वाले व्यक्ति भी थे। उनका विश्वास था कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक भी होनी चाहिए। वह एक ऐसे भारत का स्वप्न देखते थे जहां समानता, न्याय और बंधुत्व की स्थापना हो। आज के युवाओं के लिए चंद्रशेखर आज़ाद का जीवन एक प्रकाशस्तंभ के समान है। उनका साहस सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी आत्मविश्वास नहीं खोना चाहिए। उनका त्याग हमें बताता है कि राष्ट्रहित सर्वोपरि है। उनका बलिदान दिवस केवल श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लेने का भी दिन है। यदि युवा वर्ग आज़ाद के अनुशासन, निष्ठा और देशभक्ति को अपनाए तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन अवश्य आएगा। आज उनके बलिदान दिवस पर यदि प्रत्येक व्यक्ति देश प्रेम को अपने जीवन का मूलमंत्र बना ले तो देश की सभी समस्याएं स्वयं समाप्त हो जाएंगी।  

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