मतदाता संशोधन प्रक्रिया की चुनौतियां

भारतीय चुनाव आयोग द्वारा पुन: विशेष गहन जांच  (एस.आई.आर.) करवाने के फैसले से देश भर में हलचल पैदा हो गई थी। विशेष रूप से कुछ विपक्षी पार्टियों ने इस संबंध में तरह-तरह के बड़े सवाल उठाए थे। यह भी कि यह किसी एक पार्टी के पक्ष में मतदान किए जाने की प्रक्रिया है, यह भी कि इससे समूची चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ पैदा हो जाएगी। यह भी कि यह मतदाता संशोधन किसी विशेष समुदाय को निशाना बना कर और किसी एक समुदाय के व्यापक स्तर पर वोट काटने के लिए किया जा रहा है। कुछ राज्यों विशेष रूप से पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव निकट होने के कारण वहां की कुछ विपक्षी पार्टियों ने इस संबंध में कई बड़ी आपत्तियां जताई थीं। इनमें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सबसे अग्रणी थीं। उन्होंने इस प्रक्रिया पर जन-आन्दोलन शुरू करने की धमकी दी थी और इस संबंध में उन्होंने देश की सर्वोच्च अदालत में भी सम्पर्क किया था। 
उन्होंने अपनी आपत्तियों की स्वयं पैरवी करते हुए अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखा था। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने इन आपत्तियों पर लम्बी जांच-पड़ताल करने के बाद मतदाता सूचियों में बड़े संशोधन को अपना कर केन्द्रीय चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया को जारी रखने का फैसला किया था। इस संबंध में सैकड़ों नहीं, हज़ारों ही आपत्तियां प्रकट की गई थीं और इन मामलों को अदालत में भी ले जाया गया था। जहां विस्तारपूर्वक बहस के बाद निकाले गए परिणामों के उपरांत अंतत: सर्वोच्च अदालत ने इस प्रक्रिया को जारी रखने के आदेश दिए थे। इस संबंध में उठाई आपत्तियों को अदालतों द्वारा दूर किए जाने की भी इजाज़त दी गई थी। इससे पहले मतदाता सूचियों में संशोधन का काम 2002 से 2004 तक हुआ था। वैसे समय-समय पर मतदाता सूचियों का आम संशोधन भी होता रहा है। उसके बाद अब मतदाता सूचियों की विशेष गहनता से संशोधन का काम पुन: शुरू हुआ है। जहां तक चुनाव आयोग का सवाल है देश में संविधान लागू होने के बाद एक निश्चित उम्र के बाद प्रत्येक भारतीय को मत का अधिकार दिया गया था। विगत 75 वर्षों में चुनाव आयोग ने समय-समय पर चुनाव संशोधनों को लागू करने संबंधी कदम उठाए थे। मतदाता सूचियों से लेकर फोटो सहित वोटर कार्ड बनाए गए थे। इन विशाल प्रबंधों में संशोधन का काम अक्सर चलता ही रहता है।
भारत ही ऐसा देश था जिसमें पहले वर्ष 1982 में कांग्रेस की सरकार के समय इलैक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों की शुरुआत केरल के एक उप-चुनाव में की गई थी।  इनमें भी समय-समय पर दिए गए सुझावों पर अदालतों  के निर्देशों पर लगातार संशोधन किए जाते रहे हैं। आज भी इन मशीनों की विश्वसनीयता संबंधी अक्सर चर्चा उठती रहती है परन्तु कुछ विपक्षी पार्टियों द्वारा इनकी विश्वसनीयता पर उस समय ही उंगली उठाई जाती है, जब उनकी पार्टी को किसी चुनाव क्षेत्र में जीत हासिल नहीं होती। जहां इनके प्रतिनिधि जीत रहे हैं उन क्षेत्रों की मशीनों संबंधी इन विपक्षी पार्टियों द्वारा सवाल नहीं उठाए जाते। मतदाता सूचियों के संशोधन के इस विशाल काम को समय पर निपटाना चुनाव आयोग के लिए बड़ी चुनौती रही है, परन्तु चुनाव आयोग ने स्पष्ट स्टैंड लिया था कि वह प्रत्येक स्थिति में मतदाता सूचियों के संशोधन का काम सफल बनाएंगे। विगत लम्बी अवधि से चल रही इस प्रक्रिया में अब तक ज्यादातर राज्यों की मतदाता सूचियों के संशोधन का काम पूरा हो चुका है। इनमें मध्य प्रदेश, केरल, गुजरात, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और कुछ केन्द्र शासित प्रदेश भी शामिल हैं। इन राज्यों में पहली अंतरिम सूचियां प्रकाशित होने के बाद आपत्तियों के लिए समय दिया गया था। इस तरह प्राप्त आपत्तियों की पड़ताल करके और पुन: संशोधन करके ही अंतिम सूचियां प्रकाशित की जाती हैं।
इस संशोधन में ज्यादातर मतदाताओं की मृत्यु होने के कारण, उनका एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर वोट बना लेने के कारण और ऐसे और कई कारणों के दृष्टिगत इस काम को सफल बनाया गया है। उन व्यक्तियों की वोट भी काटी गई हैं, जो भारत के पड़ोसी देशों से ़गैर-कानूनी ढंग से यहां देश में दाखिल हो कर अपना काम करते रहे हैं। आश्चर्यजनक बात यह है कि इस तरह की प्रक्रिया का पालन के कारण अलग-अलग प्रदेशों में बड़ी मात्रा में लाखों की संख्या में वोट काटे गए हैं। विगत दिवस देश के एक दक्षिणी राज्य तमिलनाडु जिसके  विधानसभा चुनाव  इसी वर्ष अप्रैल में होने जा रहे हैं, की अंतिम सूची भी सामने आई है। इसमें 74 लाख से अधिक नाम अलग-अलग कारणों के दृष्टिगत काटे गए हैं। अब इस राज्य में अंतिम सूची में 5.67 करोड़ मतदाताओं के नाम प्रकाशित किए गए हैं।
हम समझते हैं कि चाहे इस संशोधन में बड़ी रुकावटें सामने आईं, इस संबंध में बड़े विवाद भी उठे और अदालतों ने बार-बार इस काम को पारदर्शी ढंग से करने के निर्देश भी दिए और काटे गए नाम वाले व्यक्तियों को पुन: प्रतिनिधिता देने का अवसर भी दिया गया परन्तु विश्व भर में सबसे बड़ी जनसंख्या वाले इस देश में समय-समय पर एक निश्चित समय के बाद ऐसी प्रक्रिया पूरे पारदर्शी ढंग से की जानी ज़रूरी है। इससे ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मज़बूती का दावा किया जा सकता है, जो संविधान के अनुसार लोकतंत्र को और भी मज़बूत बनाए रखने में सहायक हो सकती है।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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