मन न रंगाये, रंगाये जोगी कपड़ा
मन रंगने की बहुत महिमा सुनी थी। देश भक्तों ने अपने मन राष्ट्र प्रेम से रंग लिये, और उनकी जीवन गाथा आज भी प्रेरक है। लाहौर जेल के पुराने गलियारों से गुज़र जाओ तो शायद आज भी कहीं से वन्दे मातरम् की आवाज़ आपके अन्तस के भीतर गूंजने लगे, और भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के चेहरे अतीत से झांकने लगेें, और आपके सामने चित्र आ जायें, तीन बांके जवान जो हंसते-हंसते मां भारती की बेड़ियां काटने के लिए फांसी पर झूल गये थे।
सन् सैंतालिस पन्द्रह अगस्त को पण्डित नेहरू की वह आवाज़ जो राष्ट्र निर्माण की उम्मीदों से रंगी हुई थी, और नये सपनों का निर्माण कर रही थी। लेकिन इसके बाद ज़माना तेजी से गुज़र गया। रंगा आज भी जाता है। दावा तो मन रंगने का ही करते हैं, राष्ट्र प्रेम और राष्ट्र-निर्माण का करते हैं, नेता लोग, लेकिन जनाब उनका मन यह नहीं कहता जैसे हम आज भी कहते हैं, कि आप सबके घर भगत सिंह पैदा हो जाये, जो भूख और बेकारी को मिटाने की कुर्बानी के नाम पर अनन्त काल तक सस्ते राशन की दुकान पर शहीद हो सके। हमारे घर भी पैदा हो, भगत सिंह नहीं, पैदा हो नेता सिंह या नेता राम। इसका बहिरंग राष्ट्रीय नेतृत्व की भावना से रंगा होना चाहिए। वेशभूषा सफेद धक्क धवल कुर्ता पायजामा, वैसे कुर्ता धोती भी चलेगी, लेकिन अन्तस?
कुर्बानी की बातें करने में वह माहिर हो, लेकिन आपकी जन्म जात गरीबी की। तरक्की देने की बात करें, लेकिन अपने पुत्र, नाती, भाई-भतीजे की तरक्की की। हां, साथ-साथ परिवारवाद को भी गाली देता जाये। उजले सपनों की रंगत से तो उसे आपका मन रंगना है। उसका काम तो नेतागिरी की रंगत से कुर्ता रंगने से ही चल गया। मन न रंग सके तो अपना कुर्ता रंग लीजिये। टैक्नीकलर रंगों से रंग तो बेहतर होगा। इसलिए जब यह कुर्ता पार्टी बदले तो नये रंग का कुर्ता खरीदने की भी ज़रूरत न पड़े। जनाब कई रंगों का कुर्ता है, दल बदलोगे तो नई पार्टी के रंग से भी मेल खा जाएगा। वैसे आजकल रंग बदला कुर्ता पहनने की भी ज़रूरत नहीं। मन तो खैर कोई बदलता ही नहीं, उसमें तो बस एक ही इच्छा ही रहती है कि मेरी झोंपड़ी प्रासाद हो जाये तो मन हर्षा जाये। चलो आपका मन जन-सेवा के रंग से रंगे या नहीं, आपकी बोलबाणी अवश्य बदल जानी चाहिए। सामने कुछ और पीछे कुछ! सामने तो आप बड़े भाई के अन्दाज़ में बोलें, और पीछे किसी डॉन माफिया की तरह काईयां अन्दाज़ में। इसमें आपके इन संवादों में एक बड़ी प्रिय रंगत आ जाएगी। मसलन, ‘भाईजान, जब हम हैं तो क्या गम है।’ या बन्धु ‘यहां सब चलता है,’ ‘हमारे राज में क्या है जो हो नहीं सकता?’ या कि ‘तुम काम बताओ, हम दाम बतायें।’ दाम बदलता रहेगा। जितना बड़ा जूता, पालिश भी उतनी ज्यादा लगेगी। आवाज़ में उतार-चढ़ाव लाना भी आपको सीखना होगा। एक पहलू में मंच से नारा लगने की कीमत और दूसरे पहलू में काम करवाने के लिए याचक के कान में फुसफुसा कर फैसला देने की ताकत। आपकी फुसफुसाहट से उसका जवाब अगर आपका रंग बदल दे, तो समझ लीजिये कि मांग शिकार ने स्वीकार कर ली। आपने काम करवा दिया, तो आपको सौ सौ बलायें देगा। न करवा पाये तो माथा पीट कर दूसरे नेता के द्वार चलता जाएगा। हां भय्या, हमारे यहां तो जन-सेवा के गुलशन का कारोबार इसी प्रकार चलता है। चार लोगों का काम हो जाये, तो वे आपके ज़िन्दाबाद कहकर आपकी शोभा यात्रा निकालने पर भी आमादा हो सकते हैं। बहुतों का काम न हो सके, तो समझिये, आपका सूरज ढलने के दिन आ गये। किसी भी मोड़ पर अब अपना पुतला जलता देखने का नज़ारा आप पूरा होते देख सकते हैं, इस तमाशे में। जी हां, अपना घर फूंक कर अपना तमाशा कोई नहीं देखता। प्रतिस्पर्धी का घर फुंक जाये तो कोई दोष नहीं। यह तो आपके वापस आने के बिगुल की आवाज़ है।
इस बीच आप भ्रष्टाचार के शून्य स्तर पर सहने की बात कर सकते हैं। इसके बावजूद आपके घर ई.डी. का छापा पड़ जाये, एफ.आई.आर. कट जाये तो आप इसे राजनीतिक बदलाखोरी का नाम दे सकते हैं। महीनों गुज़रे, मामला ठीक से प्रस्तुत न हो, आपको ज़मानत मिल जाये, तो बन्धु यही तो मुक्ति प्रसंग है। नोटों की गड्डियां तो निबट ही गई होंगी। अब आप अपने आपको विपक्षियों की राजनीति का शहीद कह सकते हैं। शहादत के रंग से अपना कपड़ा रंग लीजिये, और जनता जनार्दन के सामने एक मासूम शिकार के रूप में पेश हो जाइए। क्रांति का एक नया बिगुल बजाते हुए कि हम लौट आये। अब भ्रष्टाचार को तो हम शून्य स्तर तक भी सहन करेंगे। बस यहां आजकल यूं ही चलता रहता है। गुलों में कोई नया रंग भरे बिना, बादे नौ-बहार के चले बिना। जब आपके गुलशन का कारोबार यूं ही चल रहा है तो भला गुलों में नये रंग भरने की ज़रूरत ही क्या है? बादे नौ-बहार के चलने की उम्मीद रखने की ज़रूरत ही क्या है? बस अपना कपड़ा रंगा लीजिये, और अपना मन रंगने के नाम पर सांस्कृतिक हो जाने की घोषणा कर दीजिये। अरे आर्थिक क्रांति आपके टूटे घरों तक आई या नहीं, इसे तलाश करने की ज़रूरत क्या है? देखो सांस्कृतिक चेतना तो जागृत हो गई। पूरा देश शांति की तलाश में आध्यात्मिक हो रहा है।



