सेना के लिए बेहद ज़रूरी है इंटीग्रेटेड रॉकेट फोर्स
भारत का ‘एकीकृत रॉकेट बल’ यानी इंट्रीग्रेटेड रॉकेट फोर्स अथवा आईआरएफ के निर्माण की योजना अब विचारों, सुझावों, चर्चाओं तथा प्रस्तावों की परिधि पार करके ठोस आकार लेने के करीब है। पिछले महीने ही सेना प्रमुख ने इसके गठन की तत्काल आवश्यकता पर बल दिया था और अब प्रस्ताव भी। भले ही इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है पर कुछ सैन्य सूत्रों बताते हैं कि बदलती युद्ध रणनीति एवं देश की सुरक्षा ज़रूरतों को और बेहतर बनाने के लिए भारतीय सेना के रॉकेट-मिसाइल फोर्स का एकीकृत कमांड बनाने के प्रस्ताव को रक्षा प्रमुख की औपचारिक मंजूरी मिलने के बाद सेना ने इसकी तैयारियां शुरू कर दी हैं। अभी मिसाइल क्षमताओं का संचालन भारतीय सेना में कोर ऑफ आर्टिलरी, सामरिक बल कमांड के तहत किया जाता है। जल्द ही मिसाइलों, राकेटों और खास तरह के ड्रोन इत्यादि के कमांड के लिये एक अलग एकीकृत व्यवस्था होगी। सेना प्रमुख ही नहीं रक्षा प्रमुख सहित सभी इसे ‘नीडस ऑद द ऑवर’ मानते हैं इसलिए इस बल का गठन शीघ्र और अवश्यंभावी है, मुमकिन है इस पर इस पर कुछ ठोस काम होने के बाद इसकी उचित समय पर रणनीतिक घोषणा हो।
रॉकेट और मिसाइलों की व्यवस्था को एकीकृत कर एक कमांड के तहत लाना और फिर उसे मिलिट्री एआई के अंतर्गत ‘किल चेन’ का हिस्सा बनाना भविष्य के युद्ध में टिकने के लिये अपरिहार्य है। फिलहाल चीन ने बहुत पहले 2015 में ही ऐसे बल का गठन कर लिया था और मिलेट्री एआई अथवा ‘किल चेन’ के मामले में वह अमरीका से आज बस जरा सा ही पीछे है। वह इस प्रणाली पर अमरीका से कई गुना ज्यादा खर्च कर रहा है, चीन इस पर 350 हजार करोड़ युआन खर्चता है, तो अमरीका फिलहाल 125 करोड़ डॉलर और हम महज 25 हजार करोड़ रुपये। चीन की राकेट और मिसाइल के एकीकृत कमांड पीएलएआर हमसे कई साल और तकनीकी स्तर पर बहुत आगे है।
चीन के बाद पाकिस्तान भी पिछले साल मई से शुरू कर अब तक अपनी आर्मी राकेट फोर्स कमांड को खासा विकसित कर चुका है। पाकिस्तान पश्चिम दिशा से आर्मी राकेट कमांड फोर्स के जरिये फतेह सीरीज की मिसाइलों और राकेटों से हमले कर सकता है, तो उत्तर से चीन अपनी हाइपरसोनिक मिसाइलों से भारत को नुकसान पहुंचा सकता है। अगर दोनों देश मिलकर भारत पर हमला करते हैं, तो उनके रॉकेट-मिसाइलों के आगे भारत की रक्षा प्रणाली संकट में आ सकती है। इसलिए भारत को रॉकेट-मिसाइल फोर्स की बहुत ज़रूरत है, सो चीन और पाकिस्तान की तरफ से दोतरफा दबाव के मद्देनज़र रक्षा मामले में सजग भारतीय सेना इस कमांड के गठन में अब और देर नहीं करेगी। वैसे भी इसका सुझाव 2021 में तत्कालीन सीडीएस विपिन रावत दे चुके थे और अब तक इसमें पांच बरस की देरी हो ही चुकी है। भले विचार के पांच साल बाद काम की शुरुआत हुई पर कमांड के गठन में बहुत देर नहीं लगेगी, तीन साल के भीतर यह पूरी तरह सक्रिय होगा। पिछले तीन वर्षों में सेना इसके ज़रूरी ‘हार्डवेयर’ इकट्ठा कर चुकी है। ‘प्रलय’ मिसाइलों की दो नई यूनिट्स को मंजूरी मिल चुकी है और पिनाक रॉकेट सिस्टम की मारक क्षमता 300-450 किमी करने पर काम चल रहा है। चीन से हम आगे नहीं निकल पायेंगे मगर दो सालों से पहले ही पाकिस्तान को पछाड़ देंगे, तय है। दक्षिण एशिया में किसी और देश ने इस तरह के बल बनाने की न तो घोषणा की है न ही उनके पास तकनीकी और वित्तीय क्षमता है।
युद्ध के तौर तरीके बढते तकनीक दखल के चलते बदलते जा रहे हैं, एआई समर्थित मिलिट्री एआई, रॉकेट मिसाइल इंट्रीग्रेटेड फोर्स, ड्रोन इत्यादि की भूमिका महत्वपूर्ण होती जा रही है। पहले मिसाइलों का इस्तेमाल केवल बड़े हमले या परमाणु निवारण के लिए होता था, आज मैदाने जंग में मिसाइलें केवल ‘विस्फोटक ले जाने वाले वाहन’ नहीं बल्कि ‘स्मार्ट और ऑटोनॉमस हंटर’ बन चुकी हैं। ये दूर बैठकर हमला करने यानी ‘नॉन-कॉन्टैक्ट वारफेयर’ का आधार हैं। मिसाइलों की सटीकता इस कदर उन्नत हो चुकी है कि अब मिसाइलें पूरे शहर को तबाह करने के बजाय एक विशिष्ट खिड़की या मोबाइल लॉन्चर को निशाना बनाती हैं। इनका इस्तेमाल विरोधी पर शुरुआती हमले में ही बढ़त बनाने, उनके प्रमुख स्थानों, संस्थानों पर रणनीतिक, घातक विध्वंस के अलावा दुश्मन को अपने ही क्षेत्र में सीमित रखने, एंटी एक्सेस अथवा एरिया डिनायल के लिये भी किया जा रहा है। भविष्य में एक साथ 50-100 छोटी मिसाइलें या ड्रोन छोड़े जा सकते हैं, जो आपस में ‘संवाद’ करेंगे। अगर एक मिसाइल नष्ट हो जाती है, तो दूसरी खुद-ब-खुद उसका लक्ष्य संभाल लेगी। जल्द ही ये एआई से सन्नद्ध होकर किल चेन का हिस्सा बनेंगी। रॉकेट और मिसाइल हालांकि दोनों अलग-अलग हैं, रॉकेट के उलट मिसाइल तय टारगेट को हिट करने के लिए बनाई गई है, जिसमें इंटर्नल गाइडेंस सिस्टम भी होते हैं। पर अब वे इतने अलग नहीं रहे। दोनों ही बहुत असरदार और निर्णायक युद्धक सक्षमता साबित कर रहे हैं।
इस बल का मुख्य उद्देश्य युद्ध की शुरुआत में दुश्मन के एयरबेस, संचार केंद्रों और ईंधन डिपो को तबाह करना होगा ताकि मिसाइल आक्रमणों की सटीकता विपक्षियों की कमर व मनोबल तोड़ दे, जिससे रणनीतिक बढत व वायुसेना तथा पैदल सेना को रास्ता मिल सके। भारतीय रॉकेट फोर्स की यही खासियत, तात्कालिकता, गति, सटीकता, मारक क्षमता होगी। भविष्य के युद्धों में इनकी भूमिका एआई तथा किल चेन के एकीकरण के बाद जो दुश्मन की पहचान करने से लेकर उसे नष्ट करने तक की एकीकृत व्यवस्था है, अत्यंत घातक हो जायेगी। उम्मीद है कि इस रॉकेट मिसाइल एकीकृत कमांड फोर्स के गठन की विधिवत आधिकारिक घोषणा सरकार अथवा सेना शीघ्र ही करेगी।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



