एआई सुरक्षा के लिए नये तरीके अपनाने होंगे
पिछले सप्ताह दिल्ली में जो वैश्विक एआई इम्पैक्ट समिट 2026 आयोजित हुए वह इससे ज्यादा सही समय पर नहीं हो सकता था, जब दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को अपनाने, इसकी सीमाओं और संभावित नतीजों को लेकर कुछ हद तक शक में है। एनविडिया माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, अमेजॉन, मेटा और एन्थ्रोपिक जैसी फर्मों की शुरुआती कोशिशों की वजह से, संयुक्त राज्य अमरीका मुख्य रूप से आधारभूत अवसंरचना, जेनरेटिवएआई (जेनएआई) समायोजन और सम्पूर्ण उद्योग में उसे लागू कर वैश्विक एआई अपनाने को बढ़ावा दे रहा है। पिछले तीन सालों में एआई अपनाने में तेज़ी आई है। फिर भी एआई अपनाने को लेकर बहुत ज्यादा शक है, जिसे इसकी सीमाओं, नैतिक असर और लंबे समय के नतीजों को लेकर चिंताओं की वजह से सावधानी से लगभग हिचकिचाते हुए अपनाया जा रहा है।
यूरोपीय यूनियन के सदस्य देश, जापान व चीन अभी भी एआई विकास के लिए सावधानी से नियंत्रित किया हुआ हैं। अच्छे कारणों से, भारत जिसे एआई अपनाने के मामले में दुनिया के सबसे बड़े मार्केट में से एक माना जा रहा है, इस प्रक्रिया में एक ज़रूरी संतुलन बना रहा है, जिसका मकसद खेती और स्वास्थ्य जैसे सेक्टर में आर्थिक विकास के लिए अपनी क्षमता का इस्तेमाल करना है, साथ ही नौकरी, डेटा प्राइवेसी और नैतिक चिंताओं से जुड़े जोखिमों को प्रबंधित करना है। जहां कुछ लोग ज्यादा ऊर्जा की खपत और श्रम बाजार में बदलाव के कारण धीमे और ज्यादा सावधानी वाले तरीके अपनाने का सुझाव देते हैं, वहीं दूसरों का मानना है कि देश को एआई अपनाने में धीमा नहीं होना चाहिए, बल्कि ज़िम्मेदारी से अपनाने पर ध्यान देना चाहिए और गहरी उत्पादकता की समस्याओं को हल करने के लिए एआई का इस्तेमाल करना चाहिए। भारत को अभी टैलेंट की भारी कमी, विदेशी प्रौद्योगिकी और चिप्स पर बहुत ज्यादा निर्भरता और डेटा सुरक्षा की कमज़ोरियों, मुश्किल साइबर हमलों (एजेंटिक एआई) से सुरक्षाए व खासकर आईटी सेक्टर में नौकरी जाने से रोकने जैसे मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए।
एआईअब कोई भावी परिकल्पना नहीं रही। यह एक शक्तिशाली प्रौद्योगिकी है, भले ही अभी इसे परिपक्वता न हासिल हो, जिसके लिए तुरंत और सख्त प्रशासन की ज़रूरत है। अभी का शक उद्योग को ‘ह्यूमन-इन-द-लूप’ दृष्टिकोण की ओर धकेल रहा है, जहां एआई का इस्तेमाल इंसानी फैसले लेने की क्षमता को बदलने के बजाये बढ़ाने के लिए किया जाता है, जिसका मकसद बिना सोचे-समझे अपनाने के बजाय ज़़िम्मेदारी से अपनाना है। एआई पूरी तरह से इंसानी तेजस्विता की जगह नहीं ले सकता लेकिन यह रोज़ाना के कामों को स्वचालित करके और एक शक्तिशाली, सहयोगी औजार के तौर पर काम करके उद्योग को काफी हद तक बदल देगा। हालांकि एआईस्पीड, डेटा प्रसंस्करण और कुशलता में बहुत अच्छा है, लेकिन इसमें चेतना, संवेदनशील तेजस्विता, रचनात्मकता और नैतिक तर्क की कमी है।
हाल का एआई इम्पैक्ट समिट एआई अपनाने से जुड़े मुद्दों को समझने के लिए बहुत उपयोगी था, खासकर भारत जैसी तेज़ी से बढ़ती नई अर्थव्यवस्था के साथ-साथ विकसित देशों में, जिन्हें अपनी ज़रूरतों, समस्याओं और संभावनाओं के हिसाब से अपनी विकास योजना लिखने में सक्षम होना चाहिए। यह जानकर अच्छा लगा कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रो जैसे वैश्विक नेताओं, संयुक्त राष्ट्र के सेक्रेटरी जनरल एंटोनियो गुटेरेस, अल्फाबेट और गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई, ओपन एआई के सीईओ सैमऑल्टमैन, डीपमाइंड के सीईओ डेमिसहसाबिस, एंथ्रोपिक के सीईओ डारियोअमोदेई आदि ने ज़िम्मेदार और सबको साथ लेकर चलने वाले कृत्रिम बुद्धिमत्ता शासन के लिए इसे एक वैश्विक रोडमैप बताया। भारत की एआई क्षमता की तारीफ करते हुए प्रौद्योगिकी के अगुवों ने ‘एआईडिवाइड’ के खिलाफ चेतावनी दी और नैतिक नवाचार, बच्चों की सुरक्षा और वैश्विक सहयोग की अपील की।
अभी तेज़ी से एआई अपनाने को लेकर भारत की मुख्य चिंताएं हैं, ज्यादा बिजली बनाने के लिए ज़रूरी बड़े निवेश पर ध्यान देनाय टैलेंट की बड़ी कमी को पूरा करना (तीन प्रतिशत से भी कम इंजीनियर एआई के लिए तैयार हैं)। एआई से चलने वाले साइबर खतरों से डेटा की सुरक्षा पक्का करना और विदेशी हार्डवेयर पर ज्यादा लागत वाली निर्भरता कम करना। भारत के पारंपरिक आईटी सेवा उद्योग में बदलाव के कारण इसमें काफी कटौती हुई है जबकि अगले तीन से चार सालों में उनकी आय में बढ़ोतरी होगी।
देश को सम्प्रभू, आई अवसंरचना बनाने, सबको साथ लेकर चलने वाला विकास पक्का करने और तेज़ी से स्वचालन के बीच नौकरियों को जाने से रोकने में बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। एआई के लिए तैयार होने के लिए, भारत को डेटा सेंटर के लिए ज़रूरी अवसंरचना को चलाने के लिए बिजली की मांग में भारी उछाल का सामना करना पड़ रहा है। अनुमान है कि 2030 तक 40-50 टीड्ब्ल्यूएच (टेरावॉट घंटे) बिजली की और ज़रूरत होगी। देश की डेटा सेंटर क्षमता 2024 में लगभग 1.6 गीगावाट से बढ़कर 2030 तक 8.10 गीगावाट होने की उम्मीद है, जो एआई को तेज़ी से अपनाने की वजह से है।
जेनरेटिव एआई लीडरशिप में भारत पहले स्थान पर है, जिसका मतलब है काम पर जेन एआई अपनाना और बातचीत वाले उपकरणों में ज्यादा इस्तेमाल। सरकार स्टार्टअप्स और अनुसंधानकर्ताओं के लिए जीपीयू बाज़ार सहित एक नेशनल एआई कम्प्यूट अवसंरचना बना रही है। भारत एआई को एक नए मौके के तौर पर देख रहा है, जो एक ऐसे दौर की शुरुआत है जहां इंसान और इंटेलिजेंट सिस्टम मिलकर काम करते हैं और मिलकर आगे बढ़ते हैं, जिससे काम ज्यादा स्मार्ट, ज्यादा कुशल और ज्यादा असरदार बनता है, लेकिन इसे ऐसे ‘भरोसेमंद’ एआई औजार अपनाने चाहिए जो काफी सुरक्षित और पारदर्शी हों। (संवाद)



