पाकिस्तान में सिख तथा हिन्दू धार्मिक स्थानों का नवीनीकरण-आखिरकार सरकार का उद्देश्य क्या है ?

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जहां हमारा। 

अलामा इकबाल जैसे महान शायर का यह शे’अर वैसे तो उन्होंने किसी और संदर्भ में लिखा था, परन्तु यह शे’अर सिख कौम की हैसियत पर भी पूरी तरह चरितार्थ होता है। इतिहास गवाह है कि जितनी बार भी सिख कौम को नेस्तोनाबूद करने के यत्न हुएं, यह कौम उतनी ही बार ‘ककनूस’ परिन्दे की भांति अपनी राख में से फिर जीवित होकर और ऊंची उड़ान भरने के समर्थ बनी दिखाई दी। खैर, आज यह शे’अर इसलिए याद आ गया क्योंकि पाकिस्तान जहां कभी सिख सल्तनत का शानदार शासन था किन्तु आज  वहां सिखों की संख्या आटे में नमक के समान भी नहीं रही। सिख इस समय पाकिस्तानी पंजाब में सिर्फ 5649, सिंध में 5182, खैबर पख्तूनिस्तान में 4050 तथा बलोचिस्तान में सिर्फ 1057 ही रह गए हैं। यह संख्या पाकिस्तान की 2023 की जनगणना पर आधारित है। यह संख्या पाकिस्तान की कुल आबादी का 1000 के पीछे एक ही बनती है परन्तु वक्त बदला है। पाकिस्तान में सिख यादगारों, गुरुद्वारों की पुन: स्थापना तथा पंजाबी भाषा के प्रति सम्मान तथा उसे पाकिस्तान में लागू करने की तरफ एक बड़ा मोड़ आया दिखाई दे रहा है। 1947 के विभाजन के बाद पाकिस्तान में अधिकतर सिख एवं हिन्दू संस्थाएं तथा धार्मिक स्थान 79 वर्ष तक बंद रहने के बाद पाकिस्तान अचानक अपनी पुरानी विरासत (हैरिटेज) की ओर लौटा है। इस समय पाकिस्तान में स्थित सिख एवं हिन्दू धार्मिक संस्थाओं का पुनर्निर्माण तथा सिख शासन के समय की ऐतिहासिक यादगारों का पुनर्निर्माण या मरम्मत की जा रही है। 
इसकी शुरुआत चाहे पाकिस्तान के उस समय के प्रधानमंत्री इमरान खान द्वारा गुरुद्वारा दरबार साहिब श्री करतारपुर साहिब के पुनर्निर्माण तथा करतारपुर साहिब गलियारे से हुई। इसमें क्रिकेट खिलाड़ी तथा राजनीतिज्ञ नवजोत सिंह सिद्धू का योगदान तथा भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इच्छा भी महत्वपूर्ण रही। 
इस समय पाकिस्तानी पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज़ जो पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री की बेटी और मौजूदा प्रधानमंत्री की भतीजी हैं, के नेतृत्व में ‘इवानी ट्रस्ट प्रापर्टी बोर्ड’ तथा ‘पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी’ जिसके अध्यक्ष पंजाब के मंत्री रमेश सिंह अरोड़ा हैं, के नेतृत्व में एक बड़ा मास्टर प्लान चल रहा है। इसमें 1947 से बंद पड़े 46 ऐतिहासिक गुरुद्वारों का पुनर्निर्माण हो रहा है। 100 करोड़ रुपये की लागत से ‘मैग्नीफिसैंट पंजाब’ के तहत 101 गुरुद्वारों तथा 53 चर्चों को विश्व-स्तरीय धार्मिक पर्यटन के लिए तैयार किया जा रहा है। हिन्दू तीर्थ अस्थान कटास राज मंदिर का कायाकल्प भी हो रहा है।
ताज़ा बड़ी घटनाओं में विश्व बैंक के प्रमुख अजयपाल सिंह बंगा के पाकिस्तान दौरे के समय उनके गांव खुशाब के गुरुद्वारे का पुनर्निर्माण हुआ और लाहौर के ऐचिसन कालेज में स्थित गुरुद्वारे में 79 वर्ष के बाद कीर्तन करवाया गया। यह गुरुद्वारा महाराजा पटियाला भूपेन्द्र सिंह ने 1910 में बनवाया था। गुरुद्वारा साहिब के अतिरिक्त जनरल हरि सिंह नलुआ की हवेली, महाराजा रणजीत सिंह की गुजरांवाला स्थित हवेली का भी नवीनीकरण किया जा रहा है।
पाकिस्तान को क्या लाभ?
इस स्थिति तथा उत्साह को देख कर पहला प्रश्न यह पैदा होता है कि इस सब कुछ का पाकिस्तान को क्या लाभ होगा? वह क्यों ऐसा कर रहा है? क्या कहीं यह भारतीय या विदेशी सिखों को भड़काने की कोई चाल तो नहीं? इस संबंध में कोई भी अनुमान लगाना हमारे स्तर पर सम्भव ही नहीं, परन्तु भारत सरकार के पास बहुत समर्थ तथा बड़ी एजेंसियां हैं जो हर बात पर नज़र रखती हैं, परन्तु जो समझ ऊपर की नज़र से हमें आती है, उससे पाकिस्तान को इसके कुछ प्रत्यक्ष लाभ हैं। ऐसे प्रतीत होता है कि जैसे भारत ने विश्व भर में फैले बोधियों के लिए धार्मिक पर्यटन का केन्द्र भारत को बनाया है, उसी तज़र् पर ही पाकिस्तान भी अपने देश के पर्यटन में पाकिस्तान को सिखों तथा कुछ सीमा तक हिन्दुओं के लिए भी धार्मिक पर्यटन का केन्द्र बनाने का यत्न कर रहा है। इससे स्थायी रूप में आर्थिक लाभ तो होगी ही, इस स्थिति का दूसरा पहलू यह हो सकता है कि पाकिस्तान अपनी कट्टरपंथी छवि से छुटकारा पाना चाहता हो, क्योंकि कट्टरपंथी देशों में पश्चिमी तथा लोकतांत्रिक देश कम ही निवेश करते हैं। यदि पाकिस्तान एक मुस्लिम देश होने के बावजूद दूसरे धर्मों के लिए ‘सहनशील’ होने का प्रकटावा करता है तो स्वाभाविक रूप से उसकी छवि एक गैर-कट्टरपंथी देश की बनेगी। फिर इस काम के लिए विदेशी सिख डायास्पोरा भी काफी मदद कर सकता है, जैसे उसने करतारपुर गलियारे के समय की भी की थी। इस प्रकार पाकिस्तान का यह यत्न दो प्रत्यक्ष लक्ष्य तो हासिल करता ही है। तीसरा, मरियम नवाज़ द्वारा पंजाबी को उत्साहित करना उसके राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए ज़रूरी है। पंजाब सबसे बड़ा प्रांत है। पंजाब की आबादी लगभग 13 करोड़ है, सिंध की आबादी साढ़े 5 करोड़, खैबर पख्तूनख्वा तथा फाटा की आबादी लगभग 4 करोड़, बलोचिस्तान की आबादी डेढ़ करोड़ के आसपास तथा पाकिस्तानी कश्मीर की आबादी लगभग 55 लाख है। अत: यदि मरियम नवाज़ पंजाबी पढ़ना अनिवार्य करके, असेम्बली में पंजाबी में भाषण करके पंजाबियों में पंजाबियत एवं पंजाबी होने का गौरव पैदा कर ले तो वह इमरान की पार्टी तथा बिलावल भुट्टो की पार्टी दोनों को कमज़ोर करने में सफल हो सकती है, क्योंकि दोनों ही गैर-पंजाबी हैं और एक-दूसरे के विरोधी भी हैं। वैसे पाकिस्तान में अभी भी गुरुद्वारों तथा मंदिरों की सम्भाल जिसकी ओर ध्यान देने की ज़रूरत है, का मामला सांकेतिक ही है, नहीं तो पाकिस्तान में कुल 1285 मंदिर तथा 532 गुरुद्वारे हैं। शेष अहमदपुरी के शब्दों में—
सब दोस्त मसलहत की दुकानों में बिक गए,
दुश्मन तो पुर-खुलूस अदावत में अब भी हैं।
(मसलहत = लाभ, स्वार्थी, अदावत = दुश्मनी)
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता जी, ऐसा क्यों?
हालांकि वास्तविकता कुछ भी हो परन्तु अभी भाजपा के केन्द्रीय नेता सिखों को अपना बताने के यत्न तो करते ही रहते हैं, परन्तु हैरानी की बात है कि भाजपा की दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ऐसा दिखाने के यत्न भी कम ही करती हैं। पहले तो भाजपा की नरेन्द्र मोदी सरकार की ओर से कुछ बंदी सिंहों की रिहाई संबंधी किए गए फैसले को लागू करने से दिल्ली की ‘आप’ सरकार इन्कार करती रही और भाजपा उन पर आरोप भी लगाती रही, परन्तु जब अब भाजपा की अपनी सरकार थी तो उसने भी बड़ी बेकिर्की से दशकों से जेल में बंद मानसिक बीमार भाई दविन्दर पाल सिंह भुल्लर की रिहाई से इन्कार कर दिया। चलो, यह तो कुछ बड़ा मामला थी, परन्तु अब जब मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के नेतृत्व वाली ‘राज नामकरण अथारिटी’ ने दिल्ली मैट्रो के 9 स्टेशनों के नाम बदलने को स्वीकृति दी और 2 स्टेशनों के नाम श्री गुरु नानक देव जी के नाम पर भी रखे गए हैं, परन्तु सिखों की बिल्कुल उचित तथा बहुत छोटी-सी एक अन्य मांग को दृष्टिविगत कर दिया गया। भारत के अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व चेयरमैन, पूर्व सांसद तथा पद्म भूषण तरलोचन सिंह ने भी इस पर रोष व्यक्त किया है। सिखों की मांग थी कि चांदनी चौक मैट्रो स्टेशन का नाम ‘शीशगंज चांदनी चौक’ किया जाए ताकि बाहर से आने वाले विदेशियों को गुरुद्वारा शीशगंज पहुंचना और आसान हो जाए। इसी प्रकार उनकी मांग गुरुद्वारा बंगला साहिब के साथ लगते स्टेशन का नाम बदलने की भी थी। यह मांग मानने में हज़र् क्या था, समझ से बाहर है। उल्लेखनीय है कि इन गुरुद्वारों में दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी ने स्पैनिश, फ्रैंच आदि के द्विभाषी तथा लिटरेचर भी रखा है। समझ से बाहर है कि दिल्ली की मुख्यमंत्री सिखों को खुश करने के लिए इतनी छोटी-सी मांग मानने से भी क्यों टालमटोल कर रही हैं। 
यह और बात कि हो म़ुख्तसर मगर ‘आसिम’
हमारी बात कभी सरसरी नहीं होती।
(आसिम वास्ती), (म़ुख्तसर=छोटी)

-मो. 92168-60000

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