मोदी की इज़रायल यात्रा : दो प्राचीन सभ्यताओं की मज़बूत दोस्ती
आज़ादी के बाद 4 जुलाई, 2017 को जब भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी तेलअवीव के हवाई अड्डे पर उतरे, तो यह सिर्फ औपचारिक यात्रा भर नहीं थी, इसका सबूत 9 सालों बाद 25 फरवरी, 2026 को तब मिला जब प्रधानमंत्री मोदी ही दूसरी बार इज़रायल की दो दिवसीय राजकीय यात्रा के तहत तेल अवीव हवाई अड्डे पर उतरे। हवाई अड्डे पर उनका स्वागत करने के लिए वहां न केवल रेड कारपेट बिछा था, बल्कि इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनकी पत्नी सारा नेतन्याहू भी एयरपोर्ट पर मोदी के लिए पलक-पांवड़े बिछाये खड़े थे। उन्होंने ने जिस गर्मजोशी से भारतीय प्रधानमंत्री की अगवानी की और प्रधानमंत्री मोदी को ‘एशिया का शेर’ बताया, वह सब साबित करता है कि भारत और इज़रायल की यह दोस्ती सिर्फ दो देशों की दोस्ती नहीं, बल्कि दो प्राचीन सभ्यताओं की मजबूत दोस्ती है। अपनी दो दिवसीय बेहद सक्रिय राजकीय यात्रा में प्रधानमंत्री मोदी इज़रायली संसद को संबोधित किया और उनके इस संबोधन को पूरी दुनिया ने ध्यान से सुना, क्योंकि मोदी ऐसे संवेदशील समय में इज़रायल की यात्रा कर रहे हैं, जब ज्यादातर देश साफ-साफ यह नहीं दिखना चाहते हैं कि वह मध्य-पूर्व में किस खेमे के साथ हैं।
लेकिन इज़रायली संसद को पहली बार किसी भारतीय प्रधानमंत्री के रूप में संबोधित करते हुए मोदी ने स्पष्ट कहा कि मैं यहां खड़ा होकर खुद को सम्मानित महसूस कर रहा हूं। मैं प्राचीन सभ्यता का प्रतिनिधित्व करते हुए, दूसरी प्राचीन सभ्यता को संबोधित कर रहा हूं। जब प्रधानमंत्री मोदी ने इज़रायल की संसद में प्रवेश किया तो ऐसा लगा जैसे वो दुनिया के किसी देश की यात्रा के समय वहां रह रहे भारतीयों के बीच पहुंचे हों। सभी इजरायली सांसदों ने अपनी जगह खड़े होकर प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत किया। इस दौरान उन्हें इज़रायली संसद के अध्यक्ष अमीर ओहाना ने इज़रायली संसद के सर्वोच्च सम्मान ‘स्पीकर ऑफ द नेस्ट मेडल’ पहनकर उन्हें सम्मानित किया। इस दौरान इज़रायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने उन्हें अपने भाई जैसा बताया और कहा कि उनके लिए उनके दिल में बहुत खास जगह है।
प्रधानमंत्री मोदी ने भी इज़रायल की संसद को संबोधित करते हुए कहा कि वह अपने साथ 140 करोड़ भारतीयों की शुभकामनाएं, मित्रता और साझेदारी का संदेश लेकर आए हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण को राजनीति से ऊपर उठाकर भावनात्मक और सांस्कृतिक फ्लेवर देते हुए कहा, ‘मैं गर्व से कह सकता हूं कि भारत में यहूदी बिना किसी डर, बिना किसी भेदभाव और बिना उत्पीड़न के साथ रह रहे हैं। उन्होंने अपनी आस्था को सुरक्षित रखा है और भारतीय समाज में उनकी पूरी भागीदारी है’। इस बात का समर्थन मोदी के बाद इज़रायल की संसद को संबोधित करने वाले इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी किया। उन्होंने भी अपने संबोधन में कहा, ‘भारत और इज़रायल के रिश्ते बेहद खास और मज़बूत है।’ दोनो देशों के संबंध सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि दिल से जुड़े हुए हैं और भारतीय प्रधानमंत्री के साथ नेतन्याहू ने भी अपने संबोधन को ऐतिहासिक और सांस्कृतिक फ्लेवर देते हुए कहा, ‘वास्तव में भारत एक ऐसी सभ्यता है, जहां यहूदियों को कभी सताया नहीं गया। भारत का धन्यवाद वहां यहूदी समुदाय का हमेशा स्वागत और सम्मान किया गया है।’ प्रधानमंत्री मोदी ने इस संबंध में यह भी कहा कि भारत और इजरायल के बीच 2000 साल से भी ज्यादा पुराने रिश्ते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी इज़रायल की संसद को संबोधित करते हुए पहले वाक्य में कहा, ‘हम हमास के हमले की निंदा करते हैं।’ प्रधानमंत्री मोदी के मुताबिक, ‘किसी भी कारण से आतंकवादियों द्वारा आम लोगों की हत्या करना जायज़ नहीं ठहराया जा सकता।’ मोदी ने ज़ोर देकर कहा कि आतंकवाद को हमने पग-पग पर झेला है, इसलिए आतंकवाद के खिलाफ हम एक कड़ी और मुक्कमिल लड़ाई लड़ेंगे। प्रधानमंत्री मोदी ने इस दौरान मुंबई में हुए 26/11 आतंकवादी हमले का ज़िक्र किया और इसके साथ ही उन्होंने दो साल पहले इज़रायल में कट्टरपंथी संगठन हमास द्वारा किये गये बर्बर आतंकी हमले की भी निंदा की। मोदी ने अपने भाषण के करीब पांचवें, छठवें मिनट में ही ज़ोर देकर कहा कि भारत आतंक की कीमत जानता है। हमने 26/11 में ऐसे ही हमले के दौरान अपने जो नागरिक गंवाये थे, उसमें इज़रायल के यहूदी भी थे। इसलिए उनके मुताबिक उन्हें 26/11 की भी उसी तरह हमेशा याद रहती है, जिस तरह दो साल पहले हमास ने इज़रायल पर बर्बर आतंकी हमला किया। कुल मिलाकर मोदी की इज़रायल यात्रा सामान्य यात्रा नहीं, इसके गहरे निहितार्थ हैं। जब पूरी दुनिया बहुत फूंक-फूंक कर कदम आगे बढ़ा रही है कि कहीं उनके इस कदम से मध्य-पूर्व में कोई समीकरण तो नहीं गड़बड़ा जायेगा। ठीक उसी समय प्रधानमंत्री बिना किसी भविष्यकालिक परिणाम की चिंता किए, इज़रायल के साथ खड़े होने में गर्व महसूस कर रहे हैं। वास्तव में आनन-फानन में की गई प्रधानमंत्री यह दूसरी इज़रायल यात्रा अपने पीछे कई महत्वपूर्ण संभावनाओं को छिपाये है। हाल के दिनों में आपरेशन सिंदूर के दौरान जिस तरह की स्थितियां बन गई थीं और जिस तरह यह स्पष्ट हुआ है कि चीन पाकिस्तान को अप्रत्यक्ष रूप से न केवल नेवीगेशन की सहायता उपलब्ध करा रहा था, बल्कि अपने हथियारों से भी भारत पर उसके हमले को ज़ोरदार बना रहा था। ऐसे में भारत के लिए यह बहुत ज़रूरी है कि वह इज़रायल के साथ अपने रक्षा संबंधों को वर्तमान मज़बूत स्थिति से भी कहीं ज्यादा मज़बूत बनाए।
वास्तव में मोदी की इस यात्रा के पीछे यह सबसे बड़ा हित शामिल है कि भारत इज़रायल के दो प्रमुख सिस्टम आयरन डोम और डेविड स्लिंग को न सिर्फ पाना चाहता है, बल्कि कहा जा रहा है कि अब इज़रायल भारत के साथ भारत में ही इस सिस्टम को विकसित करेगा, जिससे भविष्य में चीन और पाक के साझे गठजोड़ और संदिग्ध तुर्किये की हरकतों से भारत को किसी तरह का नुकसान न हो। भारत और इज़रायल वास्तव में दुनिया के उन दुर्भाग्यशाली देशों में से हैं, जो बहुत ज्यादा ऐसे तनाव से दो-चार होते रहते हैं। इन दोनों देशों ने हाल के दशकों में जितना आतंकवाद झेला है, उतना किसी और ने नहीं झेला। यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी सभी तरह की वैश्विक कूटनीति, संदेशबाजी की परवाह न करते हुए इज़रायल की यात्रा पर गए, ताकि हमारी सामरिक शक्ति अजेय हो।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



