जांच एजेंसियों की कारगुज़ारी पर उठते सवाल 

दिल्ली की राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने पिछले दिनों विवादित दिल्ली आबकारी नीति मामले में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया समेत सभी 23 आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने सीबीआई द्वारा अदालत में पेश किये गये सबूतों को कमज़ोर और अपर्याप्त बताया और कहा कि आरोपियों की कोई आपराधिक साज़िश या इरादा साबित नहीं हुआ। अदालत ने कहा कि केवल दावे पर्याप्त नहीं होते बल्कि ठोस सबूत होने भी ज़रूरी हैं। अदालत ने कहा कि चार्जशीट में खामियां हैं और कोई साक्ष्य भी नहीं मिला। इस अदालती फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज़ हो गयी है। गौरतलब है कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने नवम्बर 2021 में नई आबकारी नीति लागू की थी। इस नीति  का उद्देश्य शराब की बिक्री का निजीकरण कर ग्राहक सुविधा बढ़ाना और शराब की काला बाज़ारी रोकना बताया गया था, परन्तु जुलाई 2022 में मुख्य सचिव की रिपोर्ट में प्रक्रियागत शामियां, मनमाने फैसले और 500 करोड़ से अधिक का नुकसान बताते हुए दिल्ली के तत्कालीन एलजी. वी.के. सक्सेना ने सीबीआई जांच की सिफारिश की।
उस समय केंद्र सरकार की अधीनस्थ संस्थाओं सीबीआई और ईडी द्वारा यह आरोप लगाया गया कि दिल्ली सरकार के तत्कालीन आबकारी मंत्री मनीष सिसोदिया द्वारा इस नयी आबकारी नीति को निजी शराब कंपनियों को ज़्यदा पहुंचाने के लिए तैयार किया गया था जिसमें 100 करोड़ के कैशबैक आम आदमी पार्टी के कई नेताओं को मिले। तत्कालीन मुख्य मंत्री अरविन्द केजरीवाल को इस पूरे मामले का मुख्य साज़िशकर्ता बताया गया। इसके बाद जुलाई 2022 में एलजी की सिफारिश से ही अगस्त में सीबीआई व ईडी द्वारा केस दर्ज किया गया तथा सितम्बर में नयी आबकारी नीति रद्द कर दी गयी। इसी के बाद फरवरी 2023 में मनीष सिसोदिया को और मार्च 2024 में  केजरीवाल को गिरफ्तार कर लिया गया था। अब जहां संबंधित अदालत द्वारा केजरीवाल व सिसोदिया समेत सभी 23 आरोपियों को बरी कर दिया गया हैं वहीं खबर यह भी है कि निचली अदालत के इस फैसले को चुनौती देने हेतु सीबीआई संभवत: हाई कोर्ट का रुख कर सकती है।
बहरहाल इस अदालती फैसले के बाद विपक्ष एक बार फिर केंद्र सरकार पर हमलावर है, क्योंकि मोदी सरकार के दौरान ही अरविंद केजरीवाल के अलावा और भी कई विपक्षी दलों के मुख्यमंत्रियों और नेताओं पर ईडी, सीबीआई जैसी एजेंसियों ने कार्रवाई करने की कोशिश की। इनमें गिरफ्तारियां भी हुईं परन्तु अधिकांश मामलों में या तो ज़मानत मिली या मामले डिस्चार्ज हुये या फिर उन्हें अदालत से राहत मिली। 
उदाहरणस्वरूप झारखंड के मुख्यमंत्री पद पर आसीन हेमंत सोरेन को 2024 में ईडी द्वारा जमीन घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे मामलों में गिरफ्तार किया गया। उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर जेल जाना पड़ा था। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 2026 में ईडी की कार्रवाई पर स्टे लगा दिया और वह रिहा होने के बाद पुन: मुख्यमंत्री बने। इसी तरह कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के विरुद्ध ईडी ने एमयूडीए स्कैम में हाईकोर्ट ने जांच की मंज़ूरी तो दे दी परन्तु लोकायुक्त ने उन्हें क्लीन चिट दे दी। यूँही कभी केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन को ईडी  द्वारा 466 करोड़ रुपये का एफईएमए नोटिस जारी किया गया व कई कारण बताओ नोटिस जारी किये गये। परन्तु अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं हो सकी। इसी तरह तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव, डी शिवकुमार, पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी जैसे और भी कई नेताओं से ईडी व सीबीआई पूछताछ कर चुकी है।
पिछले दिनों हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को भी पंचकूला के एजेएल ज़मीन आवंटन मामले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा  हुड्डा  के खिलाफ आरोप तय किए जाने के आदेश को रद्द कर दिया है और उन्हें ‘क्लीन चिट’ दे दी। इसके आधार पर आरोप तय करने के सीबीआई कोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया गया, परन्तु केंद्र सरकार के अधीनस्थ कार्यरत ईडी, सीबीआई या आयकर जैसे विभाग विपक्षी नेताओं पर कोई न कोई आरोप मढ़कर उन्हें न केवल परेशानियों में डाल देते हैं बल्कि इस तरह के आरोपों से उनके राजनीतिक चरित्र को भी दागदार बनाने की पूरी कोशिश करते हैं। 
आंकड़े यूं ही नहीं बताते कि ईडी ने 2014 से लेकर अब तक करीब 121 प्रमुख नेताओं पर मामले दर्ज किये, इनमें 95 प्रतिशत विपक्षी नेता थे। और 2015 से 2025 तक  ईडी द्वारा दर्ज 193 मामलों में केवल 2 ही दोष सिद्धियां हुईं। शेष अधिकांश मामलों में या तो अदालत ने आरोपियों को राहत दी या फिर सुबूतों के अभाव में मामले कमज़ोर पड़ गये। 

#जांच एजेंसियों की कारगुज़ारी पर उठते सवाल