अलौकिकता और आत्म-जागृति का पर्व है होली

बुराई पर अच्छाई की जीत, अहंकार पर विनम्रता की जीत और भक्ति की शक्ति का संदेश देता रंगों का त्योहार होली सामाजिक बंधुत्व और समानता का प्रतीक पर्व है। सही मायनों में भारतीय उपमहाद्वीप का यह प्रमुख पर्व केवल मनोरंजन का ही साधन नहीं है बल्कि धार्मिक और आध्यात्मिक भावनाओं का अनूठा संगम भी है। धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के साथ मनाया जाने वाला यह पर्व प्रेम, भाईचारे, एकता, क्षमा, आत्म-शुद्धि, नवीनता व खुशी का संदेश देता है जो भक्ति के पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। होली भगवान श्रीकृष्ण और राधा के प्रेम का भी प्रतीक है। जहां भक्त प्रह्लाद की धर्म और सत्य की विजय कथा धार्मिक विजय का संदेश देती है, वहीं प्रह्लाद के अहंकारी पिता हिरण्यकश्यप की बहन होलिका का जलना अहंकार के विनाश का प्रतीक है। हिरण्यकश्यप का अहंकार इतना बढ़ गया था कि वह स्वयं को भगवान से भी ऊपर समझने लगा था। प्रह्लाद को मारने के लिए उसने बहन होलिका को आदेश दिया था कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में प्रवेश करे। दरअसल होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह अग्नि से नहीं जलेगी लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बच गए और होलिका जल कर राख हो गई। चूंकि प्रह्लाद की भक्ति की शक्ति ने उन्हें विष्णु की कृपा प्राप्त करने में मदद की, इसीलिए यह पर्व संदेश देता है कि भक्ति की शक्ति से हम समस्त चुनौतियों का सामना कर सकते हैं। होली के दिन सभी जाति, धर्म और वर्ग के लोग एक साथ रंगों से खेलते हुए खुशियां मनाते हैं, ऐसे में यह पर्व सामाजिक बंधुत्व को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
आनंदोल्लास का पर्व होली प्रेम का त्योहार है, सद्भावना का त्योहार है और इसका सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि मनुष्य सदैव यह स्मरण रखे कि वह इन्सान है, भगवान नहीं, इसलिए उसे सत्ता, धन-वैभव, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, जन समर्थन तथा अन्य किसी भी चीज़ के द्वारा अर्जित की गई शक्ति का अहंकार नहीं होना चाहिए। होलिका दहन का यह आध्यात्मिक महत्व भी माना गया है कि हम अपने भीतर की बुराइयों को जलाकर सदाचारी जीवन व्यतीत करें तथा जिस प्रकार हम एक-दूसरे पर रंग-गुलाल डालकर यह पर्व मनाते हैं, उसी प्रकार हम ध्यान-अभ्यास द्वारा अपने अंतर में ईश्वर के विभिन्न रंगों को देखकर सच्ची होली अपने अंतर में भी खेलें। आध्यात्मिक चिंतकों के अनुसार ‘होलिका’ शब्द का अर्थ है ‘भुना हुआ अन्न’ और होलिका दहन के अवसर पर लोग गेहूं और जौ की बालियों को भूनते हैं, जो वास्तव में आध्यात्मिक रहस्य को उजागर करता है। जैसे भुना हुआ अन्न आगे उत्पत्ति नहीं करता, वैसे ही ज्ञान-योग की अग्नि में तपकर किया गया कर्म भी अकर्म हो जाता है। होली पर अग्निकर्म यानी दहन को समस्त नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करने वाला माना जाता है। इस सामूहिक अग्नि संपादन में नारियल, गाय के गोबर के उपले, कण्डे के साथ ऋतु फल तथा हरे चने का अर्पण समृद्धिकारक और आयु वृद्धि करने वाला कर्म माना गया है। जन चेतना का यह जागरण पर्व हमें परस्पर मेल-जोल बढ़ाने और आपसी वैर-भाव भुलाने की प्रेरणा देता है। होली का धार्मिक और आध्यात्मिक पक्ष विभिन्न आयामों में उसके महत्व को दर्शाते हुए लोगों को धार्मिकताए प्रेम और सांस्कृतिक संदेशों को समझने के लिए प्रेरित करता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार होलिका दहन व होली के दिन भगवान श्रीकृष्ण, भगवान विष्णु और कुल देवी-देवताओं की पूजा करने से सभी नकारात्मक शक्तियों का नाश हो जाता है और जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
एक ओर जहां होली की कथा प्रमुख रूप से भक्त प्रह्लाद और हिरण्यकश्यप से जुड़ी है, वहीं यह उल्लेख भी मिलता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने जब पूतना राक्षसी का वध किया था, तब उसी खुशी में गोकुलवासियों ने हर्षोल्लाससे होली खेली थी। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा पूर्णिमा तिथि के दिन गोपियों के साथ रास-लीला रचाने और अगले दिन रंग वाली होली खेलने का वर्णन भी मिलता है। होली का संबंध भगवान शिव से भी जोड़ा जाता है। होली का वर्णन नारद पुराण, भविष्य पुराण जैसे प्राचीन हस्तलिपियों और धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है। संस्कृत और अवधी के कई प्रसिद्ध और प्राचीन महाकवियों ने भी अपनी कविताओं में होली का उल्लेख किया है। महाकवि सूरदास ने भी बसंत तथा होली पर अनेक पद लिखे हैं। वैसे तो होली का त्योहार देश के विभिन्न हिस्सों में विभिन्न नामों और रूपों से मनाया जाता है लेकिन ब्रज में यह पर्व बसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है और यहां उसी दिन से गुलाल से होली खेली जाती है। मथुरा और वृंदावन में भी होली 14 दिनों तक खूब धूमधाम से मनाई जाती है। यह त्योहार फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे ‘फाल्गुनी’ के नाम से भी जाना जाता है। होली का त्योहार हरियाणा में धुलंडी, पंजाब में होला मोहल्ला, महाराष्ट्र में रंग पंचमी, बिहार में फगुआ, छत्तीसगढ़ में होरी इत्यादि विभिन्न नामों से मनाया जाता है लेकिन सभी जगह इस पर्व का धार्मिक और आध्यात्मिक उद्देश्य एक ही है। पुरी, उड़ीसा तथा उत्तर प्रदेश के मथुरा-वृंदावन में लोग होली का त्योहार चैतन्य महाप्रभु के जन्मदिन के रूप में भी मनाते हैं।

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