ब्रज की माटी के दिव्य शौर्य की प्रतीक लट्ठमार होली
उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र की प्रसिद्ध लट्ठमार होली मात्र रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि अध्यात्म, इतिहास और लोक संस्कृति के त्रिवेणी संगम के रूप में सहस्त्राब्दियों से भारत की आत्मा में रची बसी है। विश्व की सबसे अनूठी परम्पराओं में से एक बरसाना और नंदगांव में खेली जाने वाली यह लट्ठमार होली ब्रज की माटी का दिव्य शौर्य और प्रेम उत्सव की प्रतीक है। यह द्वापर युग की दिव्य प्रेम गाथा का जीवंत पुनर्मूल्यांकन है। धार्मिक मान्यतानुसार यह परम्परा भगवान श्रीकृष्ण और राधा के बीच प्रेमपूर्ण नोकझोंक की प्रतीक है। मान्यता है कि श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ बरसाना आकर राधा और उनकी सखियों को चिढ़ाते थे, जिसके जवाब में गोपियां उन्हें लाठियों से भगाती थीं। इस उत्सव में महिलाएं पुरुषों पर अर्थात हुरियारिनें हुरियारों पर लाठियों से वार करती हैं, जबकि पुरुष ढाल का उपयोग करके स्वयं को बचाते हैं। यह मुख्य रूप से दो चरणों में होता है— पहले दिन बरसाना में नंदगांव के पुरुष आते हैं। अगले दिन नंदगांव में बरसाना के पुरुष होली खेलने जाते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण अपने सखाओं अर्थात ग्वालों के साथ नंदगांव से बरसाना आकर राधारानी और उनकी सखियों को गुलाल लगाकर छेड़ते थे। कान्हा की शरारतों से तंग आकर राधा और उनकी सखियां (गोपियां) उन्हें सबक सिखाने के लिए लाठियां लेकर उनके पीछे दौड़ती थीं। आज भी इस परम्परा में नंदगांव के पुरुषों को हुरियारे अर्थात श्रीकृष्ण के प्रतीक और बरसाने की महिलाओं को हुरियारिन राधा के प्रतीक माना जाता है। नंदगांव की लट्ठमार होली, बरसाना की होली का ही दूसरा और पूर्ण पक्ष है। जहां बरसाना में नंदगांव के पुरुष जाते हैं, वहीं अगले दिन बरसाना के हुरियारे भगवान श्रीकृष्ण के गांव नंदगांव में अपने प्रेम प्रदर्शन हेतु पहुंचते हैं। पौराणिक मान्यता है कि जब बरसाना की गोपियों ने श्रीकृष्ण और ग्वालों को लाठियों से भगाया था, तब अगले दिन ग्वालों ने उन्हें अपने गांव नंदगांव आने का निमंत्रण दिया लेकिन यहां उलटी गंगा बहने लगती है। यहां परम्परा थोड़ी बदल जाती है। अब नंदगांव की गोपियां (श्रीकृष्ण की सखियां) बरसाना के पुरुषों पर प्रहार करती हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि कृष्ण के गांव में गोपियां ही सर्वोपरि हैं।
नंदगांव की होली का केंद्र नंद राय मंदिर (नंदभवन) है, जहां का वातावरण अबीर-गुलाल और समाज गायन से आध्यात्मिक हो उठता है। बरसाना के हुरियारों को नंदगांव में पाहुन (अतिथि) माना जाता है। यहां लाठियों की गूंज के साथ ‘नंद के आनंद भयो’ जैसे जयकारों का अनूठा संगम होता है। यहां हुरियारिनों की लाठियां अधिक तीव्र मानी जाती हैं। पुरुष चमड़े की ढालों से अपनी रक्षा करते हैं। यह दृश्य भक्ति के उस स्तर को दर्शाता है जहां भक्त और भगवान के बीच का अंतर समाप्त होकर केवल खेल शेष रह जाता है। यह केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि सदियों पुरानी उस मर्यादा का पालन है जहां प्रहार में भी प्रेम और चोट में भी आशीर्वाद का अनुभव होता है। लट्ठमार होली ब्रज की संस्कृति का वह दर्पण है, जहां भक्ति, श्रृंगार और वीरता एक साथ परिलक्षित होते हैं। यह उत्सव पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं की शक्ति और स्वाभिमान का एक अनूठा उदाहरण पेश करता है। यह सामाजिक समरसता का प्रतीक है। नंदगांव के हुरियारों को बरसाने में दामाद के समान सम्मान दिया जाता है। लाठियों की मार के बीच भी गूंजते होरी के गीत और प्रेम के रंग द्वेष को समाप्त कर देते हैं। यह होली शरीर की नहीं, अपितु आत्मा के उल्लास की है। रंगीली गली और लाडली जी मंदिर के प्रांगण में जब ढाल पर लाठियां पड़ती हैं, तो वह ध्वनि भक्ति के नाद जैसी प्रतीत होती है। यदि कोई हुरियारा पकड़ा जाता है, तो उसे दंड स्वरूप महिलाओं के वस्त्र पहनाकर नृत्य कराया जाता है, जो अहंकार के विसर्जन का प्रतीक है। (सुमन सागर)



