अमरीकी चौधर की पुन: बहाली के लिए ही किया गया ईरान पर हमला

28 फरवरी की सुबह अमरीकी साम्राज्य और जियूनवादी इज़रायली राज ने एक साझे सैन्य आप्रेशन के तहत ईरान पर हमला कर दिया। इस घातक और अचानक हमले में ईरान के कई शहरों, मंत्रालय, सैन्य बुनियादी ढांचे और परमाणु संबंधित स्थानों को निशाना बनाया गया। गाज़ा की तज़र् पर इज़रायल द्वारा ईरान के दो स्कूलों पर किए हमले में 100 से अधिक निर्दोष विद्यार्थी मारे गये। अमरीका-इज़रायल द्वारा तेहरान, इस्फाहान, नतानज़ और अन्य ईरानी क्षेत्रों पर हवाई और मिसाइल हमले के साथ-साथ ईरान की चोटी के नेताओं को निशाना बनाकर हत्या करने की कोशिश जारी है। इन घातक हमलों में ईरान के सुप्रीम नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या कर दी गई, जिससे पूरे देश में शोक और गुस्से की लहर है। दूसरी तरफ ईरान ने जवाबी कार्रवाई में इज़रायल के तेल अवीव, यरुशलम और हाईफा सहित मध्यपूर्व में स्थित अमरीका के आठ सैन्य ठिकानों (कतर के अल-उदीद, कुवैत के अल-सलेम, यू.ए.ई. के अल-धफरा, रियाद, सऊदी अरब और बहरीन) पर हमले किए हैं। इन हमलों के साथ एक विशाल क्षेत्रीय युद्ध छिड़ने का डर पैदा हो गया है, जिसका सबसे बड़ा हर्जाना मध्यपूर्व एशिया को भुगतना पड़ेगा।
ट्रम्प-नेत्नयाहू की जंगबाज़ जोड़ी द्वारा ईरान के परमाणु हथियार प्रोग्राम चलाने के झूठे बहाने और इज़रायली सुरक्षा के लिए खतरा पैदा होने से रचा गया हमला असल में मध्यपूर्व में ‘ग्रेटर इज़रायल’ के रास्ते की रुकावट बने ईरान को हाशिये पर करना, रूस-चीन और ब्रिक्स के प्रभाव को कमजोर करना, ईरान के तेल और ऊर्जा स्त्रोतों पर कब्ज़ा करना, अरब सागर में अमरीकी चौधर की धाक जमाना, अरब सागर के अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक मार्ग को सेंध लगाकर नियंत्रित करना और डॉलर की सरदारी को बरकरार रखना है। दूसरा, इज़रायल द्वारा गाज़ा में फिलिस्तीनियों के नर-संहार के विरुद्ध ईरान फिलिस्तीन के पक्ष में और इज़रायल के खिलाफ डट कर खड़ा होने के कारण इज़रायल की आंख का रोड़ा बना हुआ था।
गत वर्ष जून माह में इज़रायल ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों का जबरदस्त प्रदर्शन देखकर उसको दबाने की ताक में था। उस समय इज़रायल की वायु रक्षा प्रणाली (आयरन डोम) ईरानी बैलिस्टिक मिसाइलों की ताब झेल नहीं सका था और अमरीका को आगे करके  नेतन्याहू को पीछे हटना पड़ा था। मौजूदा युद्ध दौरान  नेतन्याहू ने अमरीका का दौरा करके ट्रम्प को आगे करके ईरान के खिलाफ दोबारा से युद्ध का बिगुल बजा दिया है। इस बार  नेतन्याहू ने ट्रम्प द्वारा ईरान के अरब सागर में समुद्री घेराबंदी करके परमाणु समझौते के लिए दबाव बढ़ाया है। इस दौरान ओमान की मध्यस्थता के साथ ईरान और अमरीका-इज़रायल के बीच तीन चरणों की वार्ता बड़ी सफलता के कगार पर थी। परन्तु ट्रम्प- नेतन्याहू असल अर्थों में बातचीत का ढोंग रचाकर ईरान पर हमले के बहाने तलाश रहे थे और उन्होंने बातचीत का अंतिम दौर खत्म होने से पहले ही ईरान पर हमला कर दिया। यह हमला ईरान की प्रभुसत्ता पर विश्वासघात और अन्यायपूर्ण हमला है। यह हमला संयुक्त राष्ट्र के चार्टर नम्बर-2 का सीधा उल्लंघन है, जो संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों की प्रभुसत्ता की रक्षा करता है, जिसमें ईरान भी शामिल है। इसके अलावा इसी वर्ष के अक्तूबर माह में इज़रायल में संसदीय चुनाव (नेसेट) हैं और  नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप लगे हैं। इज़रायल में उसके खिलाफ भारी रोष है परन्तु  नेतन्याहू गाज़ा के बाद ईरान के साथ युद्ध छेड़कर देश में एमरजैंसी घोषित करके सत्ता में बने रहना चाहते हैं। यही दशा अमरीका में डोनाल्ड ट्रम्प की बनी हुई है, क्योंकि वह अपनी अराजकता वाली टैरिफ नीतियों, कज़र् संकट, गृह युद्ध, व्यापक विरोध, एपस्टीन फाइलों से ध्यान भटका कर तथा अमरीकी डालर की कम हो रही साख को बचाने के लिए वैनेजुएला के बाद मध्य-पूर्व में ‘तेल राजनीति’ करके युद्ध शुरू कर रहे हैं। वैनेजुएला के बाद ट्रम्प ईरान में सत्ता पलट (अमरीका पक्षीय सरकार) करके यहां के तेल और अन्य स्रोतों पर नियंत्रण करके अमरीकी आर्थिकता को सम्बल देना तथा इज़रायल के प्रभाव को निर्बाध आगे बढ़ाना चाहते हैं। 
ईरान संकट तथा इसकी अमरीका से दुश्मनी दशकों पुरानी है। अमरीका तथा अन्य औपनिवेशक ताकतों ने मनमाने ढंग से मध्य-पूर्व में सीमांत विभाजन करके धार्मिक कट्टरता को पोषित किया। अमरीका ने इस क्षेत्र में तेल-आधारित अर्थव्यवस्थाओं की नींव रख कर उन्हें विश्व पूंजीवाद की सेवादार बनाया है। इन औपनिवेशक-साम्राज्यवादी हस्तक्षेप ने ईरान सहित शेष खाड़ी देशों की घरेलू आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था को तबाह कर दिया और ईरानी तेल तथा ऊर्जा स्रोतों के निर्यात से ईरान के भीतर असमानता को जन्म दिया। इस क्षेत्र में अमरीकी रणनीति हमेशा तेल आपूर्ति को नियंत्रिण करने, सोवियत प्रभाव को रोकने तथा पश्चिम पूंजीपतियों के लिए खुली मंडी की नीति को बरकरार रखने में सक्रिय रही है। ईरानी शाहों सहित खाड़ी देशों की राजशाहियां सैन्य सुरक्षा, आर्थिक सहायता तथा मामूली राजनीतिक मदद के बदले अमरीकी नीतियों पर चलने वाली रही हैं। 1979 की ईरान क्रांति के समय अमरीका पक्षीय शाह को गद्दी से उतार कर अयातुल्ला खामेनेई सत्ता पर विराजमान हुए। यह क्रांति कोई समाजवादी या जनहितैषी बदलाव नहीं थी, अपितु एक राष्ट्रवादी तथा धार्मिक कट्टरपंथी लहर थी, जिसने राजशाही तथा साम्राज्यवादी हस्तक्षेप के खिलाफ आक्रोश को एक धर्मशाही शासन में बदल दिया। नये शासक ने पश्चिमी पूंजी के प्रति शाह की वफादारी को रद्द करके घरेलू नीति तथा अपने क्षेत्रीय प्रभाव पर अधिक प्रभुसत्ता की नीति अपनाई। ईरानी क्रांति साम्राज्यवादी दबदबे के खिलाफ बड़ी जीत अवश्य थी, परन्तु इसने लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित करने में कोई भूमिका नहीं निभाई, जिस कारण ईरान आज बड़े आर्थिक-सामाजिक संकट में फंस चुका है। अमरीका ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद अपने हितों के लिए इस पूरे क्षेत्र में साम्राज्य पक्षीय गठबंधनों तथा सैन्य ठिकानों का एक नेटवर्क स्थापित किया। ईरान के प्रति अमरीका की नीति आर्थिक अवरोधों, कूटनीतिक दबाव तथा सैन्य दबाव वाली रही है। इराक, सीरिया, लीबिया, यमन तथा लेबनान सहित पूरा अरब संसार छद्म युद्धों-टकरावों के कारण मुकाबलेबाज़ पूंजीवादी तथा साम्राज्यवादी हितों की भेंट चढ़ता आ रहा है। शीत युद्ध के बाद अमरीका-इजरायल मध्य-पूर्व में मुख्य बाहरी शक्ति के रूप में उभरे हैं। 
इस समय ईरान अमरीका-इज़रायल के साथ सीधे युद्ध में एक कमज़ोर ताकत अवश्य है, परन्तु वह इस युद्ध में अमरीका-इज़रायल गुट सहित अमरीकी सहायक खाड़ी देशों के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर रहा है। ईरान अरब देशों में स्थित अमरीकी सैन्य ठिकानों पर हमला करके तथा हार्मुज़ जलडमरू मध्य को बंद करके अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक गतिविधियों बुरी तरह प्रभावित करके कज़र् संकट में घिरे अमरीका को चुनौती पेश कर सकता है। मध्य-पूर्व, यूरोप तथा एशिया को इसका प्रभाव क्षेत्रीय शांति, तेल कीमतों में वृद्धि तथा महंगाई के रूप में सहन करना पड़ेगा। ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई की मौत के बाद ‘इस्लिमिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कोर’ से प्रशिक्षण प्राप्त प्रॉक्सी ग्रुपों जैसे कि लेबनान में हिज्बुल्ला, यमन में हूती, इराक, सीरिया में ईरान गठबंधन वाले शिया मिलिशिया भी अमरीकी सैन्य ठिकानों, समुद्री व्यापारिक मार्गों तथा सहयोगियों को निशाना बनाने के मूड में हैं। चीन तथा रूस भी हथियार, हवाई रक्षा प्रणाली तथा समुद्री मिसाइल तकनीक के द्वारा ईरान की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष मदद करके अमरीकी साम्राज्य की राह में अवरोध पैदा कर रहे हैं। खामेनेई की मौत के बाद ईरान हमले को और अधिक तेज़ करके युद्ध को लम्बा खींच सकता है, जबकि दूसरी ओर ट्रम्प इसे एक झटके में बड़े हमले से जल्द खत्म करने की इच्छा रख रहा है। चाहे ईरान के शासक पिछड़े हैं, परन्तु विश्व के लोगों को अमरीकी-इज़रायली साम्राज्यवादी हमले का विरोध करना चाहिए और ईरानी लोगों को अपनी स्वायतत्ता वाला राज-समाज सृजित करने का अधिकार होना चाहिए और समझ लेना चाहिए कि अमरीका-इज़रायल शांति तथा सुरक्षा के लिए नहीं लड़ रहे। 

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