हिन्दू समाज में होने लगा साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का विरोध
आज मैं अपने पाठकों को 2006 के एक वाकये की याद दिलाना चाहता हूँ। उस समय देश में कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार थी। यह सात मार्च की घटना है जो वाराणसी में घटी थी। इसका आजकल घटित हो रही कई घटनाओं से गहरा ताल्लुक है। लोक-मान्यता के अनुसार गोस्वामी जी ने अपने जीवनकाल में इस नगरी में हनुमान जी की कोई 11-12 मूर्तियां स्थापित की थीं जिनमें सबसे ज्यादा प्रतिष्ठा संकटमोचन मंदिर की है। लगभग 500 साल पुराने इसी संकटमोचन मंदिर में 7 मार्च, 2006 को आंतकवादियों ने बम विस्फोट किये। इन धमाकों में साम्प्रदायिक राजनीति की बारूद भरी हुई थी। उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में अपने लगातार गिरते हुए प्रभाव से संघ परिवार परेशान था। जैसे ही बम धमाके हुए, संघ परिवार के दो प्रमुख नेताओं लालकृष्ण आडवाणी और विनय कटियार ने ़फौरन मौका ताड़ा और संकटमोचन के महंत वीरभद्र मिश्र की घेराबंदी कर डाली। अगर महंत की बात पर यकीन किया जाए तो हनुमान जी के नाम पर ही बनाए गये संघ परिवार के आक्रामक संगठन बजरंग दल के संस्थापक अध्यक्ष विनय कटियार की योजना मंदिर के सामने धरना लगाने की थी, और आडवाणी मंदिर से अपनी एक और रथयात्रा शुरू करना चाहते थे लेकिन वीरभद्र मिश्र ने इन नेताओं को इसकी इजाज़त देने से इन्कार कर दिया। उधर बनारस के मुफ्ती मौलाना अब्दुल बतीन नोमानी ने बिना देर किये विस्फोटों की निंदा की और ़फौरन घटनास्थल का दौरा करने पहुंचे। मौलाना नोमानी अस्पतालों में घायलों की मिज़ाजपुर्सी करने भी गये। उसके बाद नोमानी और मिश्रा की ज़ोरदार जुगलबंदी शुरू हुई। रामनवमी के मौके पर हर साल होने वाली रामकथा मंदाकिनी शोभायात्रा के लिए दो मुख्यातिथि तय किये गये। इनमें एक तो मौलाना नोमानी स्वयं थे, और दूसरी थीं ़फौजदारी की वकील नूर फातिमा जिन्होंने पिछले साल शहर में एक मंदिर बनवाया था। इसके अलावा इस पावन अवसर पर रामधुन बजाने की ज़िम्मेदारी उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के सुपुत्र मोहम्मद जामिन खान ने निभायी। इधर यात्रा खत्म हुई, और उधर बुर्का पहने हुए मुसलमान महिलाएं सड़कों पर निकल आयी, वे नारे लगा रही थीं : ‘खिचड़ी है सारा हिंदुस्तान, अलग न होगा हिंदू-मुसलमान’ और ‘मुसलिम महिलाओं ने ठाना है, आतंकवाद मिटाना है’। यह चुनौती रैली थी, जिसका समापन संकटमोचन मंदिर पर हुआ तो ठीक जिस जगह बम फटे थे, वहीं पर हनुमान चालीसा का पाठ किया गया। शाम होते ही पूरा संकटमोचन मंदिर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत से गूंज उठा।
2006 की यह कहानी यहीं पूरी हो जाती है। अब आइए अपनी राजनीति के मौजूद मुकाम पर। पिछले कुछ सप्ताहों से देश में एक नया नैरेटिव चल निकला है। एक नयी कहानी हवाओं में है। और यह कहानी है भाजपा और संघ की धौंसपट्टी के खिलाफ जनता की तरफ से दिये जाने वाले जवाब की। खास बात यह है कि इस कहानी के पात्र मुसलमान नहीं, बल्कि हिंदू समाज से आये हैं। जगह-जगह इसकी मिसालें मिल रही हैं। कहीं मुसलमानों की नमाज के इर्द-गिर्द हिंदू युवक हाथ में हाथ पकड़े जंज़ीर बना कर सुरक्षा मुहैया करते हुए दिख रहे हैं।
2014 के बाद से ही बजरंगदल ने गली-कूंचों, मोहल्लों, पार्कों, चौराहों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर अपने वर्चस्व प्रदर्शन की मुहर लगा रखी थी। लोग पहले उनसे बच कर चलते थे। ये लोग किसी का भी धर्म पता लगाने की फूहड़ हरकत कर सकते थे लेकिन अचालक बजरंगदलियों को अब अपनी हरकतों का उल्टा स्वाद चखने के लिए मज़बूर होना पड़ रहा है। लोगों ने उनसे डरना बंद कर दिया है। वे जवाब देने लगे हैं। ज़ाहिर है कि माहौल बदलने लगा है। आज स्थिति यह है कि लोग प्रभावित होने के लिए तैयार नहीं हैं। उनकी हर तिकड़म नाकाम हो रही है। प्रधानमंत्री मोदी अपने ही बनाये हुए जाल में दिन ब दिन फंसते चले जा रहे हैं। राष्ट्रीय राजनीति का नैरेटिव मोदी जी के हाथों से छूटता जा रहा है और सड़कों का नैरेटिव बजरंग दल के हाथ से फिसलता नज़र आ रहा है।
दीपक मोहम्मद नेता विपक्ष राहुल गांधी के निमंत्रण पर दिल्ली आया। मुलाकात के बाद दीपक ने बाहर निकल कर पत्रकारों से कहा कि राहुल गांधी जी मुझसे मिले। उन्होंने मुझे समझाया कि डरने की कोई ज़रूरत नहीं, आपने कोई गलत काम नहीं किया है। राहुल ने यह भी कहा कि वह कोटद्वार आकर मुझसे मिलेंगे और मेरे जिम की मेंबरशिप लेंगे। उधर राहुल गांधी ने भी सोशल मीडिया पर पोस्ट किया कि उन्होंने उत्तराखंड के ‘मोहम्मद दीपक’ से मुलाकात की। मोहम्मद दीपक ने एकता, भाईचारे और हिम्मत की वो मिसाल पेश की है जो देश के हर युवा को अन्याय और नफरत के खिलाफ लड़ने का हौंसला देगी। दीपक ‘मोहब्बत की दुकान’ के योद्धा हैं, पूरे देश को उन पर गर्व है। मुझे तो लगता है कि अगर बदायूँ में जिस समय बजरंग दल के वर्कर और उनका नेता अक्षय बेवज़ह कुछ मुसलमान बुजुर्गों को पीट रहा था, अगर वहां कुछ दलेर हिंदू युवक होते तो उस घटना का भी प्रतिकार होता। अक्षय को छटी का दूध याद दिला दिया गया होता। बदायूं की घटना बजरंग दल की गुंडागर्दी का जीता-जागता प्रमाण है। मैं समझता हूँ कि यह एक हकीकत ज़रूर है, लेकिन यह बजरंग दल वाले ऐसा इसलिए करते हैं कि उन्हें लगता है कि उन्हें कोई रोकने वाला नहीं है।
इस संगठन की स्थापना 1984 में हुई थी जब सरकार ने विश्व हिंदू परिषद द्वारा आयोजित राम-जानकी यात्रा की सुरक्षा के लिए पुलिस की तैनाती करने से इन्कार कर दिया था। उस समय संघ परिवार ने इस दल का गठन किया और इसकी बागडोर खास तौर से ओबीसी समुदाय से आये युवकों के हाथ सौंपी। कुर्मी समाज से आये विनय कटियार को इसकी अध्यक्षता दी गई। पहले दौर में तो इस संगठन के लगभग सभी नेता और कार्यकर्ता पिछड़े समाज से ही चुने गये। यह बजरंग दल की एक खास प्रवृत्ति थी। इसमें ऊंची जातियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं की गैर-मौजूदगी एक जानाबूझा पैटर्न था जिस पर बहुत देर में ध्यान गया। भाजपा के भीतर के नेताओं से जब अंतरंग बातचीत होती थी, तो वे साफ कहते थे कि हमने तो यह संगठन अपने विरोधियों को डराने के लिए ही बनाया है। ज़ाहिर है कि भाजपा और संघ के ऊंची जाति के नेताओं के लिए ओबीसी युवकों का लठैती के लिए इस्तेमाल एक ऐसी राजनीतिक टेक्नोलोजी था जिसकी तरफ समीक्षकों का ध्यान धीरे-धीरे ही गया। ऐसी बात नहीं कि बजरंग दल में ऊंची जाति के लोग होते ही नहीं हैं, पर इसकी स्थापना, विकास और मौजूद समय में भी इसकी आक्रामकता यानी सबकुछ पिछड़ी जाति के युवकों द्वारा ही सुनिश्चित किया गया है। इस लिहाज़ से बजरंग दल हिंदुत्व की राजनीति के लाज़िमी तौर पर जातिवादी और ऊंची जातियों के वर्चस्व वाले किरदार का सबूत है। अब समय आ गया है कि जब हिंदुत्व के इन लठैतों को समाज की उदार और भाईचारे की समर्थक शक्तियों की ताकत का सामना करना पड़ रहा है। यह बहुत अच्छा संकेत है। ऐसी कुछ और घटनाएं घटित होते ही, बजरंग दल जैसों द्वारा डाले गये डर के शिकंजे से समाज पूरी तरह से आज़ाद होने की तरफ चल पड़ेगा।
लेखक अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में प्ऱोफेसर और भारतीय भाषाओं के अभिलेखागारीय अनुसंधान कार्यक्रम के निदेशक हैं।



