पंजाब विधानसभा चुनावों में भाजपा की रणनीति क्या रहेगी ?
तुझे दुश्मनों की ़खबर ना थी
मुझे दोस्तों का पता नहीं
तेरी दास्तां कोई और थी
मेरा वाक्या कोई और है।
चाहे किसी समय अकाली दल बादल तथा भाजपा में नाखून-मांस के रिश्ते की बात की जाती थी, परन्तु अब तो हालत सलीम नौसर के उक्त शे’अर जैसी ही है। दोनों पार्टियां इस समय एक-दूसरे से समझौते के मामले में फिलहाल तो ‘तौबा’ वाला स्टैंड ही ले रही हैं। हालांकि राजनीति में आम तौर पर नेता जो कहते हैं, वास्तविकता उससे बहुत दूर होती है, परन्तु इस समय तो अकाली दल तथा भाजपा एक-दूसरे पर तीव्र हमले ही कर रहे हैं। चाहे कांग्रेस से भाजपा में आए कैप्टन अमरेन्द्र सिंह जैसे नेता यह महसूस करते हैं कि अकाली दल के साथ समझौते के बिना पंजाब में भाजपा का सत्ता में आना सम्भव नहीं है, परन्तु भाजपा के अधिकतर नेता अकाली दल के साथ समझौते का विरोध कर रहे हैं। हालांकि उनमें से भी बहुत-से निजी बातचीत में चुनावों के निकट जाकर समझौता होने के आसार बन सकने से भी इन्कार नहीं करते। इस समय पंजाब में भाजपा का चुनाव अभियान सम्भाल रहे हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने भी स्पष्ट कहा है कि फिलहाल अकाली दल से समझौते के कोई आसार नहीं। उन्होंने पंजाब में भाजपा सरकार बनाने की बात भी कही। इसके जवाब में प्रमुख अकाली नेता डा. दलजीत सिंह चीमा ने कहा कि हम भाजपा द्वारा पंजाब की सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का स्वागत करते हैं। राजनीति सम्भावनाओं, समझ, मेहनत तथा साम-दाम-दंड-भेद का खेल है और इसमें कोई संदेह नहीं कि 2014 से भाजपा इन सभी मापदंडों पर अन्य शेष सभी से समर्थ पार्टी है। नि:संदेह भाजपा की यह रणनीति देश को विभाजित कर रही है। ़खैर, हम देश की नहीं, पंजाब की बात कर रहे हैं।
बेशक भाजपा यह दावा बहुत दृढ़ता से कर रही है कि पंजाब में आगामी सरकार भाजपा बनाएगी, परन्तु सब जानते हैं कि इन दावों में सच्चाई और सम्भावना कितनी है? यह स्पष्ट है कि भाजपा, कांग्रेस या ‘आप’ से समझौता कर नहीं सकती। वह अकाली दल (पुनर्सुरजीत) या अकाली दल बादल से ही समझौता कर सकती है, परन्तु अभी तक अकाली दल (पुनर्सुरजीत) अपने पांवों पर खड़ा होने के यत्नों में ही है। इसलिए यदि भाजपा पंजाब में सत्ता चाहती है तो उसे अकाली दल बादल या अकाली दल (पुनर्सुरजीत) दोनों से ही समझौता करके गठबंधन बनाना पड़ेगा, परन्तु कुछ संकेत ऐसे भी मिल रहे हैं कि भाजपा पंजाब में सरकार में भागीदार बनने की बजाय अपने ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यह चुनाव अकेले लड़ने को प्राथमिकता दे सकती है और कांग्रेस की पंजाब में हार सुनिश्चित बनाने के यत्न कर सकती है, जिसके परिणामस्वरूप प्रदेश में आम आदमी पार्टी की सरकार पुन: बनने के आसार बन सकते हैं। यहां उल्लेखनीय है कि भाजपा नेतृत्व प्रधानमंत्री से लेकर स्थानीय स्तर तक पंजाब के उन डेरों से सम्पर्क बढ़ा रहा है, जो आम तौर पर कांग्रेस का ही समर्थन करते रहे हैं।
हालांकि आम लोगों के लिए यह अनहोनी-सी बात है, क्योंकि आम आदमी पार्टी तथा भाजपा के नेता तो एक-दूसरे पर तीव्र हमले करते हैं। फिर भाजपा यह कैसे चाह सकती है कि ‘आप’ की सरकार पंजाब में पुन: बन जाए, परन्तु राजनीति में दो दूनी चार कम ही होता है, 5,7 या 8 चाहे हो जाए।
यहां ज़रा यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि पंजाब में यदि कांग्रेस जीत जाती है तो वह 2027 के अंत तथा 2028 के शुरू में अन्य राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में भी भाजपा को कड़ी टक्कर देने के समर्थ दिखाई देगी। उसका विश्वास मज़बूत होगा, परन्तु यदि कांग्रेस हारती है और ‘आप’ जीत जाती है तो अन्य राज्यों के चुनावों में ‘आप’ भाजपा विरोधी वोट बांटेगी, जिससे भाजपा की जीत की राह आसान होगी। यह भी स्पष्ट है कि फरवरी-मार्च 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों में ‘आप’ सिर्फ पंजाब में ही जीत सकती है। पंजाब के अतिरिक्त अन्य राज्यों उत्तर प्रदेश, गोवा, उत्तराखंड तथा मणिपुर जहां भी ‘आप’ चुनाव लड़ेगी, वहां जितने भी वोट लेगी, वे भाजपा विरोधी वोट बांटने का काम ही करेगी। हालांकि कहा जा सकता है कि भाजपा ने दिल्ली में ‘आप’ को क्यों हराया, परन्तु नोट करने वाली बात है कि दिल्ली में ‘आप’ के हारने से कांग्रेस नहीं जीत सकती थी, जबकि पंजाब में ऐसा सम्भव हो सकता है।
यह स्पष्ट है कि यदि ‘आप’ पंजाब में हार गई तो नवम्बर-दिसम्बर 2027 में होने वाले गुजरात तथा हिमाचल प्रदेश के चुनावों में भी ‘आप’ कमज़ोर पड़ जाएगी और इसका सीधा नुकसान भाजपा को तथा लाभ कांग्रेस को होगा। इसलिए फिलहाल कुछ भी नहीं कहा जा सकता कि भाजपा पंजाब में अंतिम समय क्या रणनीति अपनाएगी। वह सचमुच अकेले चुनाव लड़ेगी या चुनाव के निकट जाकर अकाली दल या अन्य दलों से समझौता कर लेगी। नि:संदेह भाजपा गलियारों में एक दुविधा यह भी है कि कहीं ‘आप’ पूरी तरह कांग्रेस का विकल्प न बन जाए। भाजपा के रवैये बारे यह शे’अर बिल्कुल चरितार्थ होता है :
तेरे सलूक से मिलता नहीं किसी का पता,
न दोस्ती, न मुरव्वत, न दुश्मनी का पता।
—समीर कबीर
(मुरव्वत = आदर, सम्मान)
2022 में ‘आप’ के कारण कांग्रेस का नुकसान
यहां यह समझना ज़रूरी है कि ‘आप’ के 2022 में अकेले चुनाव लड़ने के कारण कांग्रेस का कितना नुकसान हुआ। गोवा में 2022 में ‘आप’ ने 40 में से 39 सीटों पर चुनाव लड़ा, ‘आप’ को 6.77 प्रतिशत वोट मिले और दो सीटें जीतीं, परन्तु कांग्रेस का भाजपा के खिलाफ सत्ता विरोधी रुझान होने के बावजूद लगभग 5 प्रतिशत वोटें कम हुईं और उसकी सीटें भी 17 से कम होकर 11 रह गईं। फिर 2022 के अंत में गुजरात में ‘आप’ ने 182 में से 180 सीटों पर चुनाव लड़ा। उसने लगभग 13 प्रतिशत वोट लिए और 4 या 5 सीटें जीतीं, परन्तु कांग्रेस के 2017 में मिले वोट 41.4 प्रतिशत से कम होकर 2022 में 27.28 प्रतिशत पर आ गए। उसकी सीटें भी 77 से कम होकर 17 ही रह गईं। ‘आप’ ने अधिकतर पटेल तथा मुस्लिम वोट लिए जो परम्परागत रूप में कांग्रेस पक्षीय वोट होते हैं। हिमाचल में भी चाहे ‘आप’ ने 67 सीटों पर चुनाव लड़ा, परन्तु अचानक ‘आप’ ने अपना पूरा नेतृत्व हिमाचल से गुजरात भेज दिया। परिणामस्वरूप हिमाचल में ‘आप’ को सिर्फ लगभग 1 प्रतिशत वोट मिले। वोटों का विभाजन न होने के कारण हिमाचल में कांग्रेस की सरकार बन गई। अत: स्पष्ट है कि पंजाब में ‘आप’ की मज़बूती भाजपा के लिए लाभदायक तथा कांग्रेस के लिए देश भर में नुकासनदेह सिद्ध होगी।
हज़ारों मुश्किलें हैं दोस्तों से दूर रहने में,
मगर इक ़फायदा है पीठ पर खंजर नहीं लगता।
—मुजफ्फर हऩफी
दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी चुनाव
दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी चुनाव बारे दिल्ली हाईकोर्ट के सुयोग्य न्यायाधीश अमित बांसल ने 24 फरवरी, 2026 के फैसले में 30 जून तक मतदाता सूची तैयार करने तथा 30 सितम्बर, 2026 तक चुनाव करवाने के आदेश दे दिए हैं। इस समय दिल्ली गुरुद्वारा चुनाव लड़ने वाले तीन प्रमुख गुट अकाली दल बादल, परमजीत सरना गुट तथा मनजीत सिंह जी.के. गुट इकट्ठे हैं, जबकि काबिज़ भाजपा समर्थक गुट के प्रधान चाहे हरमीत सिंह कालका हैं, परन्तु इस गुट के असल नेता तो दिल्ली के मंत्री मनजिन्दर सिंह सिरसा ही माने जाते हैं। यदि चुनाव हुए तो मुख्य मुकाबला इन दोनों गुटों में ही होगा। चाहे कुछ अन्य अकाली एवं पंथक गुट तथा ‘आप’ समर्थक भी चुनाव मैदान में होंगे, परन्तु जहां तक अकाली दल बादल का संबंध है, उसके नेता समझते हैं कि अदालत के कड़े आदेशों के बावजूद काबिज़ भाजपा गुट किसी न किसी बहाने चुनाव लटकाने का यत्न करेगा। चाहे वह अदालती आदेशों को चुनौती के माध्यम से तथा चाहे प्रशासनिक कारणों से, परन्तु उल्लेखनीय है कि दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी के प्रधान कालका यह कह रहे हैं कि वह हर समय चुनाव करवाने के लिए तैयार हैं।
-1044, गुरु नानक स्ट्रीट, समराला रोड, खन्ना
-मो. 92168-60000



