क्या मुफ्त तोहफे रोज़गार और क्रय शक्ति को बढ़ाते हैं ?

सरकार या राज्य एक सामाजिक समझौता है, जिसमें जन कल्याण सबसे बड़ा उद्देश्य है। जन कल्याण आर्थिक और सामाजिक समानता पर आधारित है। जब से चुनाव प्रक्रिया शुरू हुई है, तब से कई आर्थिक रियायत और वायदे किए जाते रहे हैं। लेकिन पिछले समय से प्रत्यक्ष लाभ जैसे मुफ्त बिजली, महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा और भत्ते आदि की घोषणा करके यह प्रभाव देने की कोशिश की जाती है कि जो वर्ग आर्थिक रूप से कमज़ोर हैं, वे इन सुविधाओं से सम्पन्न वर्ग के समान हो जाएंगे, जबकि इन मुफ्त तोहफों की कीमत भी उन्हीं लोगों को टैक्स देकर या अपने कल्याण के लिए ज़रूरी व्यवस्था में कटौती करके अदा करनी पड़ती है। भारतीय संविधान में समाजवाद का प्रावधान किया गया है, जिसका अर्थ   आर्थिक और सामाजिक समानता है। लेकिन इस संबंध में किसी भी राजनीतिक पार्टी ने एजेंडा नहीं अपनाया, न ही कभी चुनाव घोषणा पत्र में शामिल किया।
वास्तव में दुनिया का कोई भी ऐसा विकसित देश नहीं, जहां आर्थिक समानता न हो या जहां आर्थिक समानता हो और वह देश खुशहाल न हो। भारत का सकल घरेलू उत्पाद हर साल बढ़ रहा है और प्रति व्यक्ति आय में भी लगातार वृद्धि हो रही है, लेकिन गरीबी भी उसी तरह बढ़ रही है। बेरोज़गारी पिछले 50 सालों में सबसे ज़्यादा है। वास्तव में प्रति व्यक्ति आय या औसत आय किसी देश की खुशहाली का पैमाना नहीं है, क्योंकि किसी एक व्यक्ति की वार्षिक आय करोड़ों में होती है, लेकिन दूसरी तरफ हज़ारों लोगों की आय कुछ हज़ार होती है। 
एक रिपोर्ट के अनुसार 2020 से 2024 तक भारत के एक प्रतिशत लोगों के पास देश का 62 प्रतिशत धन था जबकि निचले वर्ग के 50 प्रतिशत लोगों के पास मात्र 6.4 प्रतिशत धन था। ऊपरी एक प्रतिशत लोगों के पास देश की कुल आय का 58 प्रतिशत था जबकि निचले 50 प्रतिशत लोगों के पास मात्र 15.7 प्रतिशत आय आती थी। 41.32 प्रतिशत लोगों के पास उपयुक्त घर नहीं है और 31.52 प्रतिशत लोगों को संतुलित भोजन नहीं मिलता। 2022 में भारत के शहरों का कुल घरेलू आय में 67 प्रतिशत हिस्सा था, जबकि ग्रामीण क्षेत्र में चाहे 68 प्रतिशत आबादी रहती है, लेकिन उनका हिस्सा मात्र 33 प्रतिशत है। कृषि चाहे देश का मुख्य व्यवसाय है, लेकिन कृषि और गैर-कृषि आय में बड़ा अंतर है। कृषि में लगी 55 प्रतिशत से ज़्यादा आबादी का देश की कुल आय में मात्र 14 प्रतिशत हिस्सा है जबकि 45 प्रतिशत गैर-कृषि आबादी के हिस्से 84 प्रतिशत या 6 गुना ज़्यादा आय आती है। इसका कारण कृषि में अर्ध-बेरोज़गारी है। यह अर्ध-बेरोज़गारी प्रति व्यक्ति भूमि की औसत में कमी के कारण और कम हो रही है।
जब वोट पाने के लिए मुफ्त तोहफों का वादा किया जाता है, तो सार्वजनिक वित्त पर दबाव पड़ता है। इससे फिज़ूल खर्च होता है और समाज कल्याण योजनाओं को आगे बढ़ाने में बड़ी बाधा आती है। 
खुशहाली और आय में समानता का सबसे ठोस आधार है रोज़गार। यह रोज़गार पैदा करने के लिए वस्तुओं और सेवाओं की मांग में वृद्धि होनी चाहिए, जिसके लिए क्रय शक्ति हो। किसी विकसित देश में जब बेरोज़गारी फैलती है तो बेरोज़गारों को भत्ता दिया जाता है ताकि उनकी क्रय शक्ति बनी रहे और उनके द्वारा वस्तुओं और सेवाओं की मांग लगातार की जाए। क्रय शक्ति का बने रहना ही निरन्तर विकास का आधार है। राजनीतिक पार्टियों के एजेंडा में क्रय शक्ति को स्थायी करने की कोशिशें शामिल होनी चाहिएं। आय में समानता पूरे देश का एजेंडा होना चाहिए। यह अकेले राज्यों का एजेंडा नहीं बन सकता,  परन्तु राज्यों द्वारा मुफ्त तोहफे देना उन राज्यों के सार्वजनिक खर्च में वृद्धि करता है, जिसे वे निरन्तर बढ़ रहे कज़र् से पूरा करते हैं। इस प्रकार के मुफ्त तोहफे देते समय यह ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि इससे रोज़गार या क्रय शक्ति बढ़ेगी या नहीं?

#क्या मुफ्त तोहफे रोज़गार और क्रय शक्ति को बढ़ाते हैं ?