ट्रम्प की हठधर्मिता से धूमिल हुई अमरीका की वैश्विक छवि
नि:संदेह संयुक्त राज्य अमरीका विश्व के शक्तिशाली देशों में अपना सर्वोच्च स्थान रखता है। यही वजह है कि दुनिया के अधिकांश देश सर्वशक्तिमान अमरीका से अपने मधुर सम्बन्ध बनाये रखना ही बेहतर समझते हैं। अपने प्रभुत्व या दबदबे को कायम रखने के लिये अमरीका भी अन्य देशों के बीच ‘बांटो और राज करो’ का खेल खेलता आ रहा है। इसी घिनौने खेल के तहत वह दुनिया के लगभग 57 इस्लामिक देशों में शिया-सुन्नी मतभेद को हवा देता रहता है। और इसी प्रोपेगेंडा की आड़ में अमरीका कई इस्लामिक देशों में सामरिक महत्व के अनेक अड्डे संचालित कर रहा है। विदेश संबंध परिषद के अनुसार अमरीका इस क्षेत्र में कम से कम 19 देशों पर स्थायी और अस्थायी दोनों तरह के सैन्य ठिकानों का एक व्यापक नेटवर्क संचालित करता है। इनमें बहरीन, मिस्र, इराक, जॉर्डन, कुवैत, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में स्थित आठ स्थाई सैन्य अड्डे भी शामिल हैं। अधिकांश इस्लामिक देशों में सैन्य अड्डे संचालित करने के बदले अमरीका को वहां की सरकारों से भारी धन भी मिलता है। उदाहरण के तौर पर सऊदी अरब जैसा इस्लामिक देश अमरीका को अपने यहां तैनात अमरीकी सैनिकों के खर्च को आंशिक तौर पर उठाने के बदले में लगभग 500 मिलियन डॉलर देता आ रहा है। अमरीका और मेज़बान देश आमतौर पर स्टेटस ऑफ फोर्सेज़ एग्रीमेंट और अन्य रक्षा समझौतों के तहत तय करते हैं कि कौन कितना खर्च उठाएगा। इन देशों को भी अमरीकी संरक्षण, हथियारों की बिक्री, प्रशिक्षण, रक्षा गठबंधन और अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ने के रूप में लाभ होता है, जिसके बदले वे अमरीकी सैनिकों के खर्च या उपयोग के लिए कुछ न कुछ भुगतान या संसाधन देते हैं। अमरीका दशकों से इसी नीति पर चलते हुये अनेक तेल उत्पादक इस्लामिक देशों से अपनी आवश्यकता के अनुसार तेल लेता है, साथ ही इनकी सुरक्षा के नाम पर इन्हें हथियार भी बेचता है। कुल मिलकर इस प्रपंच के पीछे वह इन देशों को यही सन्देश देता आ रहा है कि अमेरिका ही तुम्हारा रक्षक है अन्यथा ईरान जैसा देश मध्य एशिया के खाड़ी देशों को निगल जायेगा।
गत 28 फरवरी को अमरीका व इज़रायल द्वारा ईरान पर थोपे गये युद्ध के बाद ईरान जिस तरह पलटवार कर रहा है, उसने अमरीका व इज़रायल सहित स्वयं को अमरीकी सैन्य ठिकानों के बल पर सुरक्षित रहने की दशकों से गलत धारणा पाले बैठे इस्लामिक देशों को भी बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया है। ईरान ने जिन लगभग 8 मुस्लिम देशों पर हमले किए इनमें असली निशाना खाड़ी देशों में फैले अमरीकी सैन्य ठिकाने थे। इन हमलों में अमरीका की रडार, संचार-सिस्टम, थाड एंटी-मिसाइल रडार, हैंगर, रिफ्युलिंग विमान और ढांचा जैसे संवेदनशील टार्गेट पर निशाने साधे जिससे अमरीकी सैन्य संचालन की क्षमता कहीं कम हो गई तो कहीं बिल्कुल ही समाप्त हो गयी। इन्हीं ईरानी हमलों के बाद अमरीका को अपना रक्षक समझने वाले खाड़ी के इस्लामिक देशों को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ा कि जब अमरीका खुद अपने सैन्य ठिकानों की हिफाजत नहीं कर सका तो वह दूसरे देशों की रक्षा कैसे करेगा?
ट्रम्प ने अपनी हठधर्मिता के कारण इज़रायल के साथ ईरान विरोधी सैन्य अभियान में शामिल होने जैसा जो घातक फैसला किया, उससे अमरीका में भी ट्रम्प के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। अमरीकियों ने ईरान के खिलाफ जारी सैन्य हमलों का विरोध किया है या ट्रम्प के इस निर्णय से अपनी असहमति जताई है। डेमोक्रेट पार्टी के विशेष जनसमूह और कई उदारवादी व प्रगतिशील संगठनों ने ट्रम्प की ऐसी नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन किये, ऑनलाइन अभियान चलाये और कांग्रेस में प्रस्ताव लाकर इसका विरोध भी किया। कांग्रेस में डेमोक्रेट नेता टिम केन द्वारा रिपब्लिकन रेंड पॉल के साथ एक द्विदलीय ‘वार पावर रेज़ोल्यूशन’ भी लाया गया जिसका उद्देश्य ट्रम्प को ईरान के खिलाफ हथियारबंद अभियान सीमित करने के लिए बाध्य करना था। हालांकि यह प्रस्ताव खारिज ज़रूर हो गया, परन्तु इसके ज़रिये अमरीका में ही ट्रम्प की नीतियों का औपचारिक विरोध ज़रूर उजागर हुआ। कई प्रमुख अमरीकी मीडिया और विदेश नीति विशेषज्ञों ने ईरान में युद्ध को अमरीका की गलत रणनीति बताया और इसे इज़रायल के दबाव में लिया गया फैसला बताया गया। ट्रम्प प्रशासन के भीतर कुछ राष्ट्रीय सुरक्षा और खुफिया विभाग के अधिकारियों में भी ईरान युद्ध को लेकर असंतोष और मौन विरोध है। यह कहना गलत नहीं होगा कि राष्ट्रपति ट्रम्प अमरीकी इतिहास में पहले ऐसे राष्ट्रपति हैं जिन्होंने अपने बड़बोलेपन व गलत निर्णयों से अमरीका की छवि को भारी ठेस पहुंचाई है। ट्रम्प की हठधर्मिता ने अमरीकी प्रभुत्व की वैश्विक छवि को पूरी तरह से धूमिल कर दिया है।
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