हिंदी और उर्दू शायरी में आसमान का संकल्प और पाश की तलख, तुरष व शीरीं रचनात्मकता

कहावत ‘कहीं दी ईंट, कहीं का रोड़ा’ भावनमती ने कुनबा जोड़ा’ के अनुसार वर्तमान निक-सुक में परिवार भी है, कुनबा ङी और निक-सुक भी। शहीद-ए-आज़म भगत सिंह हैं, जिन्हें अंग्रेज सरकार ने राजगुरु और सुखदेव सहित 23 मार्च को हुसैनवाला स्थान पर ने  फांसी दे दी थी। भगत सिंह का जन्म 23 सितम्बर, 1907 को पंजाब  के लायलपुर ज़िले के बंगा गांव (अब पाकिस्तान) में हुआ था। यह अलग बात है कि 1947 में देश के विभाजन के बाद उनका परिवार (स्वतंत्रता सेनानी पिता किशन सिंह और चाचा अर्जन सिंह) अपने पैतृक गांव खटकड़कलां आकर बस गया था, जहां से भगत सिंह का ननिहाल गांव मोरांवाली सिर्फ  4-5 किलोमीटर दूर है। मैं पाकिस्तान के बंगा गांव भी गया हूं, मोरांवाली समेत। मेरे पिता खटकड़ कलां को सिखों का मक्का कहते थे।
लोक गीत प्रकाशन मोहाली द्वारा प्रकाशित ‘सरदार भगत सिंह की जीवनी’ में से ‘इंकलाब ज़िंदाबाद’ के नारों के साथ शहीद भगत सिंह तो 23 मार्च को विदा ले गए, परन्तु सरकार का परिवार पर नज़र-ए-कहर बदस्तूर जारी रहा। 
सुखदेव के माता-पिता का गोत्र थापर था। उनका पूरा परिवार क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ा हुआ था। उनका जन्म 15 मई, 1907 को लायलपुर में हुआ था। राजगुरु का जन्म 24 अगस्त, 1908 को पूना में हुआ था। वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन के सदस्य रहते हुए एक दूसरे को जानने लगे।
यदि अवतार सिंह पाश की रचनात्मकता की बात करें तो इसकी बुलंदी का शिखर और आसमान अलग-अलग  हैं। लखविंदर सिंह जौहल ने इसका सारंश निम्नलिखित शब्दों में किया  है :
‘पंजाबी कविता में एक बवंडर की तरह आए और अपने पीछे बहुत कुछ ऐसा छोड़ गए,  जिसे समझना उनके बिछुड़ जाने के इतने सालों बाद भी एक रहस्य बना हुआ है। वह एक कवि थे, एक समाज सुधारक थे और एक ऐसी शख्सियत के मालिक थे जो अपने इरादों की ओर बहुत तेज़ी से आगे बढ़ते दिखई देते थे।’ क्या हो सकते थ, उनके इरादे? यह रहस्य भी अब तक बना हुआ है। पाश सिर्फ लगभग बीस साल के थे, जब उनकी पहली काव्य-पुस्तक ‘लोह कथा’ प्रकाशित हुई थी। कविता की उन्होंने सिर्फ तीन पुस्तकें लिखी थीं। लोहकथा (1970), उड़ते बाजां मगर (1973) तथा साडे सामियां विच्च (1978)। उनकी रचनाओं की चौथी पुस्तक ‘खिल्लरे होये वरके’ उनकी मौत के बाद 1989 में प्रकाशित हुई। उनका परिवार मध्यमवर्गीय किसान परिवार था। पिता सोहन सिंह संधू सैनिक थे जिन्हें कविता लिखने का शौक था। उन्होंने जालन्धर छावनी के जैन हाई स्कूल में दसवीं तक की पढ़ाई की। फिर उन्होंने ज्ञानी की और फिर सरकारी स्कूल समराय जंडियाला में जेबीटी करने लगे। यहीं से वह शेखपुरा (कपूरथला) के  स्कूल में गए। जेबीटी करने से पहले ही वह जेल यात्राओं के रंग देख चुके थे और दो पुस्तकों के लेखक भी बन चुके थे। 
मई 1970 में उन्हें एक हत्या के मामले में गिरफ्तार किया गया। एक साल बाद वह रिहा हो गए तो 1972 में मोगा कांड में फिर गिरफ्तार हो गए। उन्हें केन्द्रीय जेल जालन्धर में रखा गया। 1973 में जब वह बाहर आए तो नक्सली दौर के कई साहित्यिक पर्चों के कर्ता-धर्ता बने, जिनमें ‘सियाद और ‘होका’ आदि शामिल हैं। उन्होंने 1967 में बीएसएफ में भर्ती होकर अपने करियर की शुरुआत की, लेकिन उनके जिज्ञासु स्वभाव ने उन्हें वहीं रुकने नहीं दिया।
इस पुस्तक में उनकी बहुचर्चित कविताएं सबसे खतरनाक, धार्मिक दीक्षा के लिए आवेदन और अंग्रेज़ी कवि कातल सैंडबर्ग की प्रसिद्ध कविता ‘ग्रास’ का पंजाबी रूपांतरण ‘घास’ भी शामिल है। इस किताब में उनकी गज़लें,  कुछ दोहे और कुछ पत्र भी शामिल हैं। 9 सितम्बर, 1950 को दोआबा के छोटे से गांव तलवंडी सलेम में सोहन सिंह संधू के घर जन्मे अवतार सिंह संधू अपने कलमी नाम ‘पाश’ से प्रसिद्ध हुए।
1973 में उन्होंने पंजाबी साहित्य और सांस्कृतिक मंच की स्थापना की। यह वही दौर था, जब पाश पारंपरिक वामपंथियों से दूरी बनाने की राह पर निकल चुके थे। वह ट्रॉटस्की के कला और साहित्य हरफों विचारों के कट्टर समर्थक थे। इसीलिए उन्होंने ‘तोहले बाण’ से ‘सियाद’ नाम से अलग खर्चे ‘सियाड़’ की स्थापना की थी। कुछ वर्षों के बाद प्रकाशित ‘साड़े समियां विच्च’ पुस्तक के मुख्य पंक्ति में उन्होंने लिखा :
‘पार्टी लेबलों से पीछे छुड़वने के बाद मुझे पता नहीं क्या-क्या शरारतें करनी पडीं। राजनीतिक गतिविधियों से हाथ खींच लेने से स्वाभाविक था कि मेरी कविता अंतर्मुखता कीओर बढ़ जाती।’
यह अंतर्मुखता उनके समाज शास्त्री नज़रिए का ही विस्तार है, जिसने उन्हें काव्य रचना के साथ-साथ एक गहन विचारशील व्यक्ति के तौर पर भी जीवित रखा। इस नज़रिए से उनकी कविता ने वास्तविक बन जाना था। समाज को बदलने के लिए निकले पाश के आदर्शों का इस तरह टूटना और उनकी रचनात्मक क्षमता में इस टूट-फूट का इस तरह ओत-पोत हो जाना ही पाश का संताप था। इसी संताप ने उन्हें वह बहुत सिद्दत से वह दिशा भी प्रदान की, जो अपनी राजनीतिक तथा सांस्कृतिक रहतलों में से बाहर आने के लिए भारतीय समाज के लिए बेहद ज़रूरी हैं। अपनी इस तीसरी आंख के खुलने से पैदा होने वाले खतरे से वह वाकिफ थे :
‘चाहने लगता हूं पल की पल अचानक आए कहीं से वह न्यूटन का दरवेश डायमंड, फिर सुनें एक बार जलती मोमबत्ती मेरे दिमाग के खुले द्राज में, इससे पहले कि मेरे दिमाग में मौजूद कुल अहुरियां इतलाहां किसी सिद्धांत में वटण, उन्हें जला दे, उनके न जलने में बहुत खतरा है।’
उनका यह काव्या-बयान कम्युनिस्ट सिद्धांत के प्राप्त परिपेक्ष के विरोध में एक नए विस्तार के सृजन का संकेत देता है। इस नए विस्तार की रूपरेखा क्या थी? इसकी तलाश में वह पंजाब संकट के सबसे भयानक दिनों में अमरीका चले गए थे। कुछ साल बाद 1988 के शुरू में वह अपना वीज़ा के नवीकरण के लिए यहां आए, जिन दिनों उन्होंने अपनी सबसे खतरनाक कविता लिखी। शायद यह कविता उनकी लिखी आखिरी कविता है।
23 मार्च, 1988 को अचानक खबर आई कि पाश और उनके दोस्त हंसराज को गोलियां लगीं और उनकी मृत्यु हो गई। पाश बिछोड़े ने पाश को एक मिथक के तौर पर स्थापित कर दिया। उन्होंने पंजाबी कविता को बगावत का वह मुहावरा दिया जिसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं है :
मैं उम्र भर उसदे खिलाफ सोचिया ते लिखिया
जे उस दे सोग विच सारा ही देश शामिल है
तां इस देश ’चों मेरा नाम कट्ट देवो 
(बेदखली हेतु आवेदन)
वह एक ही समय में बुलंद कवि थे, ऊंचे दर्जे के अदि गंभीर चिन्तक और बेहद लचीले और चुलबुले व्यक्ति थे। उनकी शख्सियत की यही विशिष्टता उन्हें सदैवीय बनाती है। उर्दू और हिंदी शायरी में आसमान के सिद्धांत को बहु-अर्थों भावना से इस्तेमाल किया जाता है। इसे उत्तमता प्रदान करने  वाले राम प्रसाद बिलमिल थे, जिन्होंने इस शब्द का इस्तेमाल शहीद-ए-आज़म भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के प्रसंग में किया था।
सऱफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-कातिल में है।
वक्त आने पे बता देंगे तुझ ए आसमां,
हम अभी से क्या बताएं जो हमारे दिल में है।
ई-मेल : sandhugulzar@yahoo.com

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