भविष्य में ज़मीनी जंग लड़ेंगे मशीनी योद्धा
समय के साथ युद्ध में हमेशा अधुनिक तकनीक का इस्तेमाल होता है। भाले से लेकर बंदूकों तक और टैंकों से लेकर परमाणु मिसाइलों तक। इस दलील के साथ कि एआई युक्त रोबो सैनिक युद्ध को अधिक मानवीय बना सकते है, रक्तपात रोक सकते हैं। अब युद्ध में मानवीकृत रोबोट सैनिकों के आमद की आहट सुनाई देने लगी है। क्या वाकई युद्ध क्षेत्र में सैनिकों के खून नहीं बल्कि मशीन का ‘बाइनरी कोड’ बहेगा? युद्ध ज़मीन पर कम और स्क्रीन पर ज्यादा लड़े जाएंगे। ‘सॉफ्टवेयर’ केवल संचार का माध्यम नहीं घातक हथियार बनेगा और ‘एल्गोरिद्म’ अब कमांडर की भूमिका निभाएंगे। इस महीने यूक्रेन में पहले मानवीकृत रोबोट सैनिक के परीक्षण से निकले नतीजों ने तमाम ऐसे सवालों को जन्म दिया है।
टाइम पत्रिका ने अमरीका निर्मित ‘फैंटम एमके-1’ जैसे ऐसे युद्धक सिस्टम का विवरण दिया है, जिसका पिछले महीने यूक्रेन युद्ध में परीक्षण किया गया। यह एक मिलिट्री मानवीकृत रोबोट है। इन रोबोटिक इकाइयों को गोदामों, डॉकयार्ड्स और फैक्ट्रियों में सामान ढोने या लॉजिस्टिक्स का प्रबंधन करने और टोह लेने के लिए इस्तेमाल करने की बात कही जा रही है, लेकिन यह केवल एक मुखौटा है। सैन्य रणनीतिकारों के लिए ‘फैंटम’ एक ऐसा हथियारबंद सैनिक है, जिसे दूर से नियंत्रित किया जा सकता है। यह कभी सोता नहीं, इसे भूख नहीं लगती और डर से मुक्त है, हर तरह के हथियार चलाकर घातक हमले में सिद्धहस्त है। ‘दोहरे उपयोग वाली तकनीक’ का यह सबसे खतरनाक उदाहरण है। जो रोबोट आज कारखाने में बक्से उठा रहा है, उसे कल ‘मशीनगन’ थमाकर मोर्चे पर तैनात किया जायेगा। इन मशीनी मानवों का हर सेंसर, 360 डिग्री तक देख सकने वाला कैमरा जो डेटा इकट्ठा करेगा, उसे एक विशाल ‘क्लाउड नेटवर्क’ में भेजेगा, जहां एआई इस डेटा का विश्लेषण कर दुश्मन की अगली चाल का अनुमान लगा लेगा। यह ऐसी तकनीक से युक्त हैं, जिनकी मदद से एक सेकैंड के हज़ारवें हिस्से में दुश्मन को पहचानकर हमला कर सकेंगे। ऐसे मानवीकृत रोबोट्स को ऐसे इलाकों में भेजने की योजना है, जहां मानवीय जोखिम बहुत अधिक है—जैसे शहरी युद्ध या रासायनिक, जैविक हमले वाले क्षेत्र।
यहां एक तकनीकी और रणनीतिक पेच है। क्या ये मशीनें किसी दुश्मन सैनिक, आतंकवादी और डरे हुए नागरिक के बीच अंतर कर पायेंगी? एआई की पहचान करने की क्षमता अभी भी त्रुटिपूर्ण हो सकती है। इससे ‘कोलेटरल डैमेज’ का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है, क्योंकि मशीन केवल डेटा देखती है, संदर्भ नहीं। मशीनी सैनिकों का मार्च का दुष्परिणाम केवल शारीरिक नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है। रोबोट सैनिकों की ऐसी सेना का सामना करना कठिन है, जिससे किसी रियायत या गलती की उम्मीद नहीं कर सकते, जिसे आप डरा नहीं सकते। यह दुश्मन के मनोबल को पूरी तरह तोड़ देगा। ये जब जंगी मैदान में उतरेंगे तो केवल गोलियां नहीं बरसायेंगे, गहरा खौफ पैदा करेंगे। दूर से नियंत्रित किए जाने वाले ये रोबोट सैनिक युद्ध को वास्तविकता, ज़िम्मेदारी और मानवीयता से काट देंगे।
रोबोट्स विद गन्स की अवधारणा केवल एक सैन्य विकास का विवरण नहीं है बल्कि यह उस नैतिक पतन की चेतावनी है, जहां युद्ध की क्रूरता को ‘कोड’ के पीछे छिपा दिया गया है। सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि मशीनें क्या कर सकती हैं बल्कि यह है कि क्या उन्हें वह सब करने की अनुमति दी जानी चाहिए? युद्ध के मैदान में एक सैनिक केवल अपने हथियार का उपयोग नहीं करता बल्कि वह अपने विवेक, प्रशिक्षण और मानवीय संवेदनाओं का भी प्रयोग करता है। वह एक निहत्थे नागरिक, एक घायल दुश्मन या एक आत्म-समर्पण करते सिपाही के बीच अंतर करना जानता है। लेकिन जब यह ऐसे ‘स्वायत्त प्रणालियों’ के हाथ में आता है, तो यह सब ‘डेटा पॉइंट’ में बदल जाता है। एआई के पास करुणा या संदर्भ की समझ नहीं होती। यदि एक मशीन को आदेश दिया गया है कि वह ‘हथियारबंद खतरे’ को समाप्त करे, तो क्या वह उस बच्चे को पहचान पाएगी जो खिलौना बंदूक लेकर खेल रहा है या उस किसान को, जिसके हाथ में हथियार नहीं खेती का औज़ार है? यह स्थिति हमें एक ऐसी भयावह वास्तविकता की ओर ले जाएगी।
युद्ध अपराधों के लिए हमेशा किसी कमांडर को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है। लेकिन यदि एक स्वायत्त रोबोट किसी अस्पताल पर हमला कर दे, तो कटघरे में कौन खड़ा होगा? वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय कानून इस ‘जवाबदेही की खाई’ को भरने में सक्षम नहीं हैं। यह कानूनी शून्यता निरंकुश शासकों और सेनाओं को एक सुरक्षा कवच प्रदान करती है, जहां वे ‘तकनीकी खराबी’ का बहाना बनाकर नरसंहार से बच सकते हैं। जब युद्ध रोबोटों द्वारा लड़े जाएंगे तो हमलावर पक्ष के लिए युद्ध की विभीषिका ‘अदृश्य’ हो जाएगी। दूर बैठा ऑपरेटर या एक स्वचालित प्रणाली जब तबाही मचाएगी, तो उसमें रक्त और चीखों का एहसास नहीं होगा।
मशीनों के साथ सबसे बड़ा जोखिम यह है कि वे हैक की जा सकती हैं। अगर किसी आतंकवादी समूह या प्रतिद्वंद्वी देश ने एक स्वायत्त रोबोटिक सेना के नियंत्रण तंत्र में सेंध लगा दी, तो क्या होगा?
हम एक डिजिटल आर्म्स रेस के बीच में हैं। चीन, अमरीका और रूस जैसे देश इस दौड़ में इसलिए शामिल हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि यदि दुश्मन ने पहले ‘सुपर-इंटेलिजेंट’ रोबोटिक सेना बना ली, तो वे रक्षाहीन हो जाएंगे। यह डर नैतिकता पर भारी पड़ रहा है। विभिन्न मानवाधिकार संगठनों और ‘स्टॉप किलर रोबोट्स’ जैसे अभियानों की चेतावनियों के बावजूद, निवेश बंद नहीं हो रहा है। युद्ध के मैदान में ‘ह्यूमनाइड रोबोट्स’ और ‘ऑटोनॉमस वेपन्स’ का प्रवेश केवल सैन्य रणनीति का हिस्सा नहीं है बल्कि यह अंतर्राष्ट्रीय कानून, नैतिकता और मानवीय अस्तित्व के लिए भी एक बड़ी चुनौती है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर

