खाड़ी युद्ध ने हमारी ऊर्जा आत्म-निर्भरता की पोल खोली 

चाहे सरकारी विभागों के छोटे से लेकर बड़े से बड़े अधिकारियों और नीचे से लेकर ऊपर तक के नेताओं ने इस बात को ज़ोर-शोर से प्रचारित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि भारत आत्म-निर्भर हो गया है और देश तीसरी या चौथी अर्थव्यवस्था बन गया है। इसके साथ ही हम तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं और दुनिया की कोई भी ताकत हमे नहीं रोक सकती। इसके बावजूद प्रधानमंत्री का वक्तव्य कि वर्तमान चुनौती कोरोना काल की तरह है और सब को मिलकर इसका सामना करना है, तो आशंका होती है कि वास्तविकता क्या है? प्रश्न यह है कि यदि हमारी ईंधन, बिजली आपूर्ति और गैर पारम्परिक स्रोतों से ऊर्जा उत्पन्न करने की नीतियां सही होतीं तो हम न केवल अपनी सभी आवश्यकताएं पूरी कर रहे होते।।
गलती कहां हुई : सरकार को लंबे खिंच गए रूस-यूक्रेन युद्ध से समझ लेनी चाहिए थी कि यह और कुछ नहीं, बल्कि रूस द्वारा अपने से छोटे देश के प्राकृतिक संसाधनों को हथियाने और यूक्रेन उन्हें बचाने के हर संभव प्रयास करने की कोशिश है। एक खूबसूरत और प्राकृतिक नज़ारों वाला देश बर्बाद हो गया और एक को अपने शक्ति संपन्न होने और हथियारों की मारक क्षमता का पता लगाने का मौका मिल गया। इसी तरह ईरान और इज़रायल की लड़ाई आज की नहीं है। इसमें अमरीका इसलिए कूदा क्योंकि वह ऊर्जा संसाधनों को अपनी बपौती समझता है। वेनेजुएला इसका उदाहरण है और अब वह मिडल ईस्ट के तेल भंडारों पर नज़र बनाए हुए है। ईरान की ताकत को बिना समझे आक्रमण कर दिया। बदले में सभी खाड़ी देशों के ऊर्जा भंडारों का अस्तित्व ही खतरे में आ गया। 
हमारे सर्वज्ञानी प्रशासक और भविष्य का अनुमान लगाने में माहिर नेतृत्व इस विषय में कुछ सोच ही नहीं सका और यह तो अब जनता को पता चल रहा है कि हम 41 देशों से प्रार्थना कर रहे हैं कि अपना तेल मुंह मांगे दाम पर हमें दे दो वरना हम तो कोरोना काल की तरह असहाय हो जाएंगे। देश में तेल, गैस और अन्य वस्तुओं की कमी महसूस होने लगी हैं, सिलेंडर के लिए लाइनें और मारपीट शुरू हो गई है और इसका असर उन पर अधिक पड़ रहा है जो छोटे सिलेंडर से अपनी ज़रूरतें पूरी करते थे। पैसे वालों ने बिजली से चलने वाले उपकरण खरीद लिए और मार्केट में अब उनका भी टोटा है। 
वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत : सन् 1970 में भी तेल का संकट हुआ था। तब विश्व के दूरदर्शी नेताओं ने सोचा कि अगर तेल मिलना बंद हो गया तो क्या होगा? जवाब था कि हमे ऊर्जा क्षेत्र में आत्म-निर्भर होना चाहिए और यह तब हो सकता है जब हम ऐसे वैकल्पिक स्रोत विकसित करें जिससे ऊर्जा प्राप्त कर अपनी घरेलू, व्यावसायिक और औद्योगिक गतिविधियां सुचारू रूप से चलाने में सक्षम हों सकें। उस समय अनेक देशों ने इस बात की गंभीरता समझ कर वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों से बिजली बनानी शुरू की और आज उन देशों में 10 प्रतिशत के लगभग पेट्रोलियम पदार्थों का उपयोग होता है और हम 90 प्रतिशत तक तेल उत्पादक देशों पर निर्भर हैं। उल्लेखनीय है कि भारत में प्राकृतिक ऊर्जा के रूप में सौर, पवन, जल और अवशिष्ट पदार्थों के अक्षय भंडार हैं। यह ऐसे साधन हैं जो कितना भी इस्तेमाल करो, ज़रा भी कम नहीं होंगे। इसे देखते हुए 1980 में पहल की गई कि अलग से एक विभाग हो जो इनके उपयोग के बारे में सटीक जानकारी दे और उसके आधार पर योजनाबद्ध तरीके से नवीन ऊर्जा स्रोतों से विद्युत उत्पादन किया जाए और हम तेल की ख़पत कम कर सकें। विदेशों से न मंगाना पड़े और जितना अपने पास है, उसके लिए देश में रिफाइनरीज़ स्थापित हों। इस बात को पचास से अधिक वर्ष हो गए और हम इन संसाधनों को न तो पूर्ण रूप से विकसित कर पाए और न ही दूसरे देशों पर निर्भरता कम कर पाएं। 
इससे भी ज़्यादा खतरनाक यह था कि इन ऊर्जा स्रोतों को इतना महंगा कर देना कि वे आम नागरिक नहीं, विलासिता का जीवन जीने वाले ही उनके उपयोग की क्षमता रखते हों। उदाहरण के लिए किसी ने बैटरी से चलने वाली कार या कोई अन्य वाहन खरीदा तो बैटरी चार्जिंग का दूर-दूर तक कोई इंतज़ाम नहीं। एक और क्षेत्र अर्थात् कृषि की बात करते हैं। हमारे वैज्ञानिकों ने बड़े जतन से ऐसी तकनीक विकसित की जो सूरज की दी गई धूप का इस्तेमाल कर किसान के सभी यंत्रों को चला सके, मतलब ट्रेक्टर के लिए डीज़ल न लेना पड़े। सौर उर्जा का उपयोग करने की अनेक तकनीक विकसित हुईं ताकि गांव देहात की गलियां, सड़कें और घर कभी अंधेरे का शिकार न हों। उम्मीद थी कि पवन ऊर्जा प्राप्त करने के लिए बड़ी-बड़ी बाहों वाले पंखे रेल या हवाई यात्रा के दौरान दिखाई देंगे लेकिन आज शायद ही इन्हें देखने का सौभाग्य किसी को मिलता होगा। इसी तरह वर्षा यानी जल संरक्षण कर हाइड्रो ऊर्जा प्राप्त करने के संयंत्र हर गांव नगर में लगाए जाते तो आज तेल के दामों से परेशान नहीं होते।
हरित ऊर्जा क्रांति हो : हरित ऊर्जा के उत्पादन से देश को आत्मनिर्भर बनाना ऐसा अवसर है कि हम अपनी ज़रूरतों को तो पूरा करते ही हैंए साथ में उन देशों को भी अंधेरे से बचा सकते हैं जो तेल की कमी से जूझ रहे हैंय लेकिन यह हो न सका। परिवहन और यातायात तथा किसी भी साधन से यात्रा करने के लिए पेट्रोलियम पदार्थों पर निर्भरता का अर्थ है कि यदि सप्लाई रुकी तो सब कुछ ठप हो जाएगा। अगर हम प्राकृतिक स्रोतों के इस्तेमाल की सही नीति बना लेते तो वर्तमान संकट नहीं होता। जो तेल उत्पादक देश है, उनके भंडारों और संस्थानों के तबाह होने की स्थिति में भारत की अर्थव्यवस्था को कितना नुकसान होगाए इसका अनुमान प्रधानमंत्री तथा संबंधित विभागों के मंत्रियों के वक्तव्यों से साफ तौर से झलकता है कि मुसीबत सिर पर है। 
यह छलावा है कि पेट्रोलियम पदार्थों के सस्ता होने के कारण वैकल्पिक ऊर्जा को महंगा रखा जाए। आज इस गलती का अहसास हो रहा है जब पेट्रोलियम पदार्थों के आयात पर संकट आया। यदि पिछली सरकारों और अब की सरकार ने इसे गंभीरता लिया होता तो आज हम निश्चिंत रहते। पेट्रोलियम की जगह विद्युतीकरण की लहर चलानी होगी। इनके उपयोग को प्रोत्साहन देने, सब्सिडी का लालच देकर लुभाने के बजाय सरकार को नियम बनाने होंगे कि अब सब कुछ उस बिजली से चलेगा जो सौर ऊर्जा कहलाती है। पेट्रोल पम्प के लिए अनिवार्य करना होगा कि उन्हें इलेक्ट्रिक चार्जिंग स्टेशन लगाना होगा। लाखों करोड़ रुपये तेल पर निर्भरता के लिए खर्च करने के स्थान पर इसे नवीकरणीय ऊर्जा के संसाधन बनाने पर खर्च करने की नीति बने तो किसी के आगे झुकना और दवाब में नहीं आना पड़ेगा। जो नहीं हुआ उसे अब किया जाना चाहिए वरना देश आत्मनिर्भर नहीं होगा। देश के वैकल्पिक ऊर्जा संसाधनों का पूरा लाभ उठाने की नीति बनाकर उस पर अमल करने की ज़रूरत है। 

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