खाड़ी देशों की उलझन
ईरान और अमरीका-इज़रायल की जंग में खाड़ी देश भी बुरी तरह फंसे नज़र आते हैं। ये अरब देश हैं, जिनमें से साऊदी अरब सबसे बड़ा देश है, जिसका इतिहास और महत्व मुस्लिम भाईचारे का धार्मिक केन्द्र होने के कारण भी अंतर्राष्ट्रीय तौर पर माना जाता है। इसके अलावा बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर और संयुक्त अरब अमीरात (यू.ए.ई.) जो अपने-आप में कुछ छोटे आज़ाद देशों का समूह है, भी खाड़ी देशों में शामिल हैं। इन देशों ने गल़्फ कॉआप्रेशन कौंसिल बनाई हुई है। ये देश आज इसलिए हर पक्ष से बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं, क्योंकि इनके पास तेल और गैस के भंडारों का अथाह प्राकृतिक ़खज़ाना है। पिछले दशकों में इन्होंने इस ‘खज़ाने’ का सूझ-बूझ से उपयोग करके अपने देशों को बेहद साधन-सम्पन्न बनाया है।
दुनिया भर में इनके शासकों की अथाह जायदादें फैली हुई हैं। अंतर्राष्ट्रीय बैंकों के लिए भी ये बड़ी टेक बने हुए हैं। क्षेत्रफल में अनुपाततया ये छोटे देश हैं। इसलिए अपनी सुरक्षा के लिए इनके द्वारा दशकों से अमरीका जैसे ताकतवर देश की सुरक्षा छतरी हासिल की हुई है। इस मकसद के लिए ही इन देशों में अमरीकी सैन्य अड्डे भी स्थापित हैं। ये देश फारस की खाड़ी के साथ लगते हैं। इराक और ईरान इनके पड़ोसी देश हैं। इस लड़ाई में ये देश न चाहते हुए भी बुरी तरह फंसे नज़र आते हैं। अमरीका और इज़रायल द्वारा ईरान पर लगातार की गई बमबारी की प्रतिक्रिया के तौर पर जहां ईरान ने इज़रायल पर मिज़ाइलों और ड्रोनों के साथ लगातार हमले किए हैं, वहीं उसने खाड़ी देशों को भी इसलिए अपने रोष का निशाना बनाया है, क्योंकि वहां अमरीका के सैन्य अड्डे स्थापित हैं। ईरान ने लगातार साऊदी अरब के तेल भंडार वाले इलाकों पर बमबारी की है। इसी प्रकार ईरान ने यूएई पर भी हमले जारी रखे हुए हैं। इन देशों में स्थित अमरीकी सैन्य ठिकानों तथा तेल भंडारों पर हमले करने के साथ-साथ ईरान ने खाड़ी देशों के बड़े होटलों तथा हवाई अड्डों को भी अपना निशाना बनाया है। रिपोर्टों के अनुसार यूएई पर ईरान ने अब तक 2000 हमले किए हैं। इनमें कतर के बड़े ऊर्जा केन्द्र रास लाफान पर हमला करके उसका भारी नुकसान किया है। कुवैत भी लगातार ईरान के गुस्से का शिकार हो रहा है।
चाहे अब तक इन खाड़ी देशों ने लगातार होते हमलों के बावजूद ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू करने की घोषणा नहीं की, परन्तु जिस दिशा की ओर घटनाचक्र मोड़ ले रहा है, उसे देखते हुए इन देशों के भी ईरान के खिलाफ युद्ध में कूदने से इन्कार नहीं किया जा सकता। इससे ईरान के खिलाफ युद्ध का एक और मोर्चा खुल जाएगा, क्योंकि इन देशों ने अपनी अथाह दौलत के साधनों से लगातार आधुनिक हथियारों के ज़खीरे भी जमा किए हुए हैं। खाड़ी के इन देशों की अब तक बड़ी चिन्ता यह बन गई है कि ईरान ने होर्मुज की खाड़ी पर जिस प्रभावशाली ढंग से कब्ज़ा किया है, उससे आगामी समय में भी ईरान खाड़ी देशों सहित अंतर्राष्ट्रीय समुद्री यातायात के इस समुद्री मार्ग पर अपना बड़ा प्रभाव जमा लेगा, जो हमेशा के लिए इन देशों के समुद्री जहाज़ों की आवाजाही के लिए खतरा बना रहेगा। युद्ध के शुरू में इन कुछ देशों पर ईरान द्वारा किए गए मिसाइल हमलों के बाद ईरान द्वारा यह बयान दिए गए थे कि वह अपने पड़ोसी खाड़ी देशों पर हमले नहीं करेगा, परन्तु इज़रायल द्वारा ईरान के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा क्षेत्र साऊथ पारस पर किए गए हमलों के बाद ईरान ने गुस्से भरी प्रतिक्रिया के रूप में अब खाड़ी देशों को भी लगातार निशाना बनाना शुरू कर दिया है।
ऐसी स्थिति में हालात के और भी बिगड़ने की सम्भावना बनी दिखाई देती है, जो खाड़ी देशों तथा पड़ोसी अरब देशों के लिए ऐसी तबाही ला सकते हैं, जिसका नुकसान दशकों में पूरा किया जाना भी कठिन होगा।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

