खाड़ी युद्ध में परमाणु खतरे के प्रति लापरवाही की गुंजाइश नहीं
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अब होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने की अंतिम घोषित तिथि बढ़ा दी है। ऐसा लगता है कि यह फैसला उनके वरीय सैन्य नेतृत्व की सलाह पर और साथ ही यूरोपीय देशों और खाड़ी सहकारी परिषद् (जीसीसी) के देशों के दबाव में लिया गया है। इन देशों को डर है कि अमरीका द्वारा ज़रूरी अवसंरचनापर बमबारी के बदले में ईरान डीसेलिनेशन और जल शोधन संयंत्रों को निशाना बना सकता है, जिससे इस इलाके में लाखों लोगों को पानी की भारी कमी का सामना करना पड़ सकता है। ट्रम्प ने यह भी कहा है कि ईरान के साथ अच्छी बातचीत चल रही है लेकिन ईरान ने ट्रम्प के इस दावे को पूरी तरह से खारिज कर दिया है कि अमरीका और ईरान के बीच बातचीत चल रही है। यह दावा ध्यान भटकाने की एक तरकीब हो सकती है, हालांकि इस बात की ज्यादा संभावना है कि अमरीकी प्रशासन को ईरान के खिलाफ अपने सैन्य विकल्प की सीमाओं का एहसास होने लगा है। अमरीका के अंदर भी ट्रम्प की बात को कोई बहुत ज्यादा समर्थन नहीं मिल रहा है। लोगों की राय का एक बढ़ता हुआ हिस्सा मानता है कि वह नेतन्याहू के सामरिक एजेंडा से प्रभावित हुए हैं और यह अमरीका की लड़ाई नहीं है।
ट्रम्प ने यह भी दावा किया है कि वह 30 मिनट के अंदर लड़ाई खत्म कर सकते हैं। सामरिक मामलों के विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ऐसा नतीजा सिर्फ नाभिकीय हथियारों के इस्तेमाल से ही मुमकिन होगा। यह बयानबाज़ी बहुत चिंताजनक है, खासकर ऐसे नेता की तरफ से जिसे जल्दबाज़ी में काम करने वाला और अलग-अलग राय रखने वाला माना जाता है- जो अक्सर अचानक फैसले लेता है, अपने बयान बदलता है और लंबे समय की कोई सही रणनीति नहीं दिखाता।
लगभग तीन हफ्ते की लड़ाई के बाद अमरीका और इज़रायल दोनों ही निराश दिख रहे हैं। उन्हें उम्मीद थी कि ईरान कुछ ही दिनों में हार मान लेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उम्मीदों के उलट ईरान ने न सिर्फ अमरीकी-इज़राइली हमले का विरोध किया है, बल्कि खाड़ी में अमरीकी ठिकानों को निशाना बनाकर जवाबी कार्रवाई भी की है। ईरान के एफ.35 जैसे अतिविकसित लड़ाकू विमान को गिराने की खबरों ने हैरानी और बढ़ा दी है- जिन्हें सिर्फ अमरीका और इज़राइल चलाते हैं। इसके अलावा ईरान ने हिंद महासागर में 4000 किलोमीटर दूरी तक मार करने वाली लंबी दूरी की मिसाइलें दागी हैं, जिससे उसके दुश्मन परेशान हैं। डिमोनानाभिकीय संयंत्र समेत संवेदनशील जगहों के पास हाल के हमलों ने इज़रायल की चिंता बढ़ा दी है। यह युद्ध एक बार फिर इज़रायली सरकार की मानवीय नियमों और अन्तर्राष्ट्रीय समझौतों की अनदेखी को दिखाता है। बच्चों समेत आम लोगों को हमलों का सबसे ज्यादा सामना करना पड़ा है, जबकि ज़रूरी अवसंरचना को सुनियोजित तरीके से नष्ट कर दिया गया है। गाज़ा में हुई तबाही और लेबनान में दुश्मनी का बढ़ना इस रूझान को और मज़बूत करता है। साथ ही, खाड़ी देश अमरीका के सुरक्षा भरोसे की कमियों को तेज़ी से पहचान रहे हैं। ऐसा लगता है कि अमरीका भी बढ़ते अकेलेपन का सामना कर रहा है। नाटो ने कथित तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य को सुरक्षित करने में शामिल होने से मनाकर दिया है, जबकि यूरोपीय देश सैन्य गतिविधियों में शामिल होने से हिचकिचा रहे हैं। ट्रम्प ने इन देशों को ‘कायर’ कहकर उनकी बुराई की है, जिससे रिश्ते और खराब हो गए हैं। यूरोपीय नेताओं ने उनके शामिल होने की संभावना पर ही सवाल उठाते हुए जवाब दिया है, यह देखते हुए कि अगर अमरीका- अपनी ज़बरदस्त नौसैनिक शक्ति के साथ जलडमरूमध्य को सुरक्षित नहीं रख सकता, तो छोटी यूरोपीय सेनाएं तो बेअसर हो जाएंगी।
खतरा यह है कि तनाव और बढ़ सकता है। अगर ईरान इज़राइल या पूरे इलाके में अमरीकी सैन्य ठिकानों पर ज़रूरी सामरिक हमला करने में कामयाब हो जाता है, तो अमरीकी नेतृत्व में निराशा और बढ़ सकती है। ट्रम्प के जल्दबाज़ी स्वभाव को देखते हुए, इस बात की असली चिंता है कि वह नाभिकीय हथियारों के इस्तेमाल सहित बहुत ज्यादा सख्त कदम उठा सकते हैं। इस खतरे को और बढ़ाने वाली बात मौजूदा अमरीकी नेतृत्व की बनावट है, जिसमें अनुभवी राजनेता की कमी दिखती है और जो रणनीतिगत दूरदर्शिता के बजाये व्यापारिक सोच से ज्यादा प्रेरित है। अगर हालात ऐसे ही रहे, तो इससे बड़े पैमाने पर औद्योगिक बंदी हो सकती है, छोटे व्यवसाय बंद हो सकते हैं और परिवहन प्रणाली में गंभीर रुकावटें आ सकती हैं, जिसमें रेल, सड़क और हवाई यात्रा शामिल है। कई देशों के पास लंबे समय तक रुकावट झेलने के लिए तेल भंडार पर्याप्त नहीं हैं। रासायनिक खाद की कमी से दुनिया भर में खाद्य सुरक्षा को और खतरा हो सकता है।
यह बेहद चिंता की बात है कि फिलहाल कोई भी वैश्विक शक्ति इस संघर्ष को खत्म करने के लिए प्रभावी मध्यस्थता करने में सक्षम नहीं दिख रही है। ब्रिक्स, जिसकी अध्यक्षता अभी भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर रहे हैं, की विश्वसनीयता पर वैश्विक भू-राजनीति में सवाल उठने लगे हैं। खासकर युद्ध शुरू होने से ठीक पहले उनके हाल ही में इज़रायल दौरे के बाद। इससे यह धारणा बनी है कि भारत, अमरीका-इज़राइल गुट के साथ है। (संवाद)



