पंजाब में गेहूं का अच्छा उत्पादन होने की सम्भावना
पंजाब की कृषि विरोधाभासी और अजीब है। यह अजीब स्थिति कई बार उम्मीदों के विपरीत परिणाम देती है। कृषि (ज़रायत) 60 प्रतिशत से ज़्यादा आबादी को प्रत्यक्ष रूप में रोज़गार देती है और पंजाब की आर्थिकता का स्तम्भ है। इसने पिछले 2 वर्षों में 173 लाख टन चावल और 124 लाख टन गेहूं केन्द्रीय अनाज भंडार में देकर प्रभावशाली योगदान दिया है। हालांकि पिछले कुछ सालों में मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्य इससे आगे निकल गए हैं। गत वर्ष पंजाब ने 40 प्रतिशत गेहूं और 31.42 प्रतिशत चावल केन्द्रीय भंडार में दिए। फिर भी किसानों पर भारी कज़र् है और प्रति घर कज़र् बढ़ कर 2.03 लाख हो गया। बढ़ रहा कृषि एवं घरेलू खर्च, रासायनिक खाद तथा अन्य सामग्री का वैज्ञानिकों की सिफारिशों से अधिक मात्रा में डालना, खेतों का छोटा हो जाना, मौसम में बदलाव तथा मॉनसून का अधिक या कम आना तथा मंडीकरण में आ रही समस्याएं इसके लिए ज़िम्मेदार हैं। कज़र् की अधिक सुविधाएं मिलने से चाहे उत्पादन बढ़ा, परन्तु इससे किसानों पर कज़र् में वृद्धि हुई है।
अमरीका-इज़रायल तथा ईरान आदि खाड़ी देशों के बीच युद्ध के कारण बासमती का निर्यात प्रभावित होने से किसानों की आय कम होने की संभावना है और फसली विभिन्नता जिसमें पंजाब पहले ही पीछे है, और पिछड़ जाएगा। भारत से 50 हज़ार करोड़ रुपये की 60 लाख टन बासमती निर्यात की जा रही है, जिसमें पंजाब की बासमती का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा है। राज्य में खरीफ के दौरान धान और रबी में गेहूं की काश्त ज़्यादा होती है, जिसकी सरकारी खरीद होने और एमएसपी बढ़ने से किसानों की आय तो बढ़ी, लेकिन फसली विभिन्नता (जैसे फल और अन्य फसलों की काश्त) नहीं बढ़ी।
पंजाब में फलों और सब्ज़ियों की काश्त की बहुत सम्भावना है। इसीलिए पंजाब सरकार का भी भविष्य में इन फसलों की काश्त का रकबा बढ़ाने की योजना है। विगत कई वर्षों से सरकार धान के प्रदूषण और पराली की समस्या से निजात पाने के लिए 500 करोड़ रुपये की सब्सिडी योजना के तहत किसानों को क्रॉप रैज़ीडियो मशीनें जैसे हैप्पी सीडर, सुपर सीडर तथा ट्रैक्टर के साथ इस्तेमाल होने वाले औज़ार आदि दे रही है। लेकिन इसमें से एक-चौथाई से ज़्यादा मशीनें खेतों में बिना इस्तेमाल के खड़ी हैं। जो किसान मशीनें सब्सिडी पर लेते समय खुश थे, अब उन्हें पछतावा हो रहा है। कृषि अनुसंधान में सरकारी खर्च में कमी से किसानों के लिए कृषि का भविष्य खतरे में प्रतीत होता है। हाल ही में खरीफ की फसल की जानकारी देने के लिए आयोजित किए गए किसान मेलों में किसानों ने बहुत कम बीज खरीदे। निजी विक्रेताओं के भी कोई खास बीज नहीं बिक सके। यूरिया और डीएपी जैसी रासायनिक खादों पर सीधे सब्सिडी देने हेतु केन्द्र सरकार गंभीरता से जो विचार कर रही है, उससे किसानों पर मायूसी के बादल मंडरा रहे हैं। सीधे सब्सिडी देने का फैसला लागू होने के बाद किसानों को एक एकड़ में चार थैले यूरिया डालने के लिए 1080 रुपये नकद देने पड़ेंगे। किसानों को यूरिया की पूरी कीमत देनी होगी। बाद में उनके खाते में पैसे भेजे जाएंगे। 45 किलो यूरिया के थैले की कीमत 268 रुपये है। पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण खादों की कीमतें और बढ़ने की संभावना है। अंतर्राष्ट्रीय मंडी में खाद की कीमतें बढ़ चुकी हैं। छोटे और सीमांत किसानों के लिए सब्सिडी की राशि नकद देना मुश्किल होगा। अगर सब्सिडी सीधे खाते में डालनी शुरू की गई तो छोटे और सीमांत किसानों को कज़र् लेने के लिए आढ़तियों, बड़े किसानों और दुकानदारों का दरवाज़ा खटखटाना पड़ेगा, जो उनको बहुत महंगा पड़ेगा। इससे उन पर कज़र् और बढ़ जाएगा।
इस वर्ष मौसम अनुकूल होने से गेहूं की अच्छी फसल होने की उम्मीद बंधी थी। फिर कुछ दिन तापमान बढ़ने के कारण किसान मायूस हो गए। चाहे अब मार्च महीने में सर्दी पड़ने से मौसम अनुकूल हो गया। आईसीएआर-आईएआरआई के सीनियर ब्रीडर डॉ. राजबीर यादव के अनुसार अब फसल अच्छी होने की संभावना है। चाहे कुछ स्थानों पर ज़्यादा बारिश और तेज़ हवाओं के कारण फसल गिर गई है, जो उन स्थानों पर उत्पादन को प्रभावित करेगी। पंजाब सरकार को 122 लाख टन गेहूं किसानों द्वारा मंडियों में लाने की सम्भावना है, जबकि गत वर्ष 129 लाख टन गेहूं मंडियों में आया था। गेहूं की सरकारी खरीद कीमत जो बढ़ाकर 2,585 रुपये प्रति क्ंिवटल कर दी गई है, उससे किसान ज़्यादा से ज़्यादा फसल मंडियों में बेचने के लिए लाएंगे।
गत सप्ताह रखड़ा मिन्नी किसान मेले का उद्घाटन करते हुए आईसीएआर (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) के निदेशक और उपकुलपति डॉ. सी.एच. श्रीनिवासा राव ने कहा था कि अब लक्ष्य किसानों की आय बढ़ाने का होगा और अनुसंधान ज़्यादा तेज़ और कृषि के हित में किया जाएगा।



