विकेन्द्रीकृत रणनीति के कारण बचा हुआ है ईरान

पिछले सप्ताह मेरी मुलाकात एक ऐसी हस्ती से हुई जिनसे बात करके मुझे इज़रायल-अमरीका के ईरान के साथ हो रहे भीषण युद्ध के बारे में ताज़ा और प्रामाणिक जानकारी मिली। मैं इस जानकारी को दैनिक अजीत समाचार के साथ साझा करने जा रहा हूँ। ज़ाहिर है कि जानकारी के साथ मेरा विश्लेषणात्मक परिप्रेक्ष्य भी होगा। जिनके साथ मेरी मुलाकात हुई वे थे ईरान के एक शीर्ष नेता अयातुल्ला अब्दुल मजीद हाकिम इलाही। मुलाकात की जगह थी नयी दिल्ली के तिलक मार्ग पर बना ईरान का कल्चरल सेंटर। अयातुल्ला इलाही की खास बात यह है कि वे ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला मुजतबा खामनेई के भारत में विशेष प्रतिनिधि हैं और मुजतबा से पहले उनके पिता और युद्ध में शहीद हो चुके अयातुल्ला अली खामनेई के भी विशेष प्रतिनिधि रह चुके हैं। इस पद पर उनकी नियुक्ति पिछले साल हुई थी। वे सर्वोच्च नेता के उन पांच प्रतिनिधियों में से एक हैं जिन्हें सारी दुनिया में इस पद पर रखा गया है। अयातुल्ला इलाही मौजूदा सर्वोच्च नेता मुजतबा खामेनेई के काफी निकट माने जाते हैं। उन्होंने खुद ही मुझे बताया कि वे छात्र जीवन में मुजतबा के सहपाठी भी रह चुके हैं। मुझसे बात करते-करते जब बीच में अयातुल्ला इलाही किसी काम से थोड़ी देर के लिए कमरे से बाहर गए तो उनके साथ के लोगों ने बताया कि अगर परिस्थितिवश कभी ईरान के सर्वोच्च नेता की जगह फिर से खाली हुई तो सर्वोच्च पद के लिए अयातुल्ला इलाही के नाम पर भी विचार किया जा सकता है। कहने के मतलब यह है कि जिस हस्ती से मैं बात कर रहा था उसके द्वारा दी गई जानकारी की प्रामाणिकता पर रंच मात्र भी शक नहीं किया जा सकता है। मेरे साथ दो वरिष्ठ पत्रकार और भी थे। 
मेरे  मेरा पहला सवाल यह था कि आखिरकार इज़रायल और अमरीका को यह कैसे पता चल जाता है कि ईरान के सर्वोच्च नेतृत्व मंडल के सदस्य किसी खास वक्त पर ठीक-ठीक कहां मौजूद हैं। और वे घात लगाये रहते हैं और मौका आने पर सटीक निशाना लगाते हैं जिससे एक के बाद एक ईरानी नेताओं को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा है। सबसे पहले तो युद्ध के शुरुआती दौर में ही इज़रायलियों को यह पता था कि अयातुल्ला अली खामेनेई किस इमारत में अपने नेतृत्वकारी साथियों के साथ बैठक कर रहे हैं। इज़रायल ने उसी इमारत को निशाना बना कर तीस बंकर-बस्टर बम गिराये  जिनके कारण ईरान अपने नेता से वंचित हो गया। उसके बाद कुछ और हमलों में ईरान के कुछ और नेता मारे गए। हाल ही में लारीजानी जैसे अहम नेता को मारने में भी हमलावर सफल रहे। मेरा पूछना था कि क्या ईरान में इज़रायली खुफिया एजेंसी मोसाद और अमरीकी जासूसी संस्था सीआईए के एजेंट बड़ी संख्या में सक्रिय हैं जिनसे सारी जानकारी दुश्मनों तक पहुंचती रहती है।
इस सवाल के बदले अयातुल्ला इलाही ने एक लम्बा जवाब दिया। इसके दो हिस्से थे। पहले हिस्से में उनका कहना था कि ईरान में इज़रायल और अमरीका के जासूस तो सक्रिय हैं किन्तु वे इतने ज्यादा नहीं हैं जितने बताये जाते हैं। वे थोड़े से हैं, और उनकी पकड़-धकड़ जारी है। उन्होंने बताया कि अयातुल्ला अली खामेनेई को जब भी हम लोग विशेष सुरक्षा देने का आग्रह करते थे, वे इसे स्वीकार करने से इंकार कर देते थे। उन्होंने बंकर में रहने से भी मना कर दिया। उनका आग्रह था कि वे लोगों के बीच रहना चाहते हैं और सर्वोच्च नेता होने के नाते किसी भी तरह की विशेष सुविधाएं नहीं लेना चाहते। अयातुल्ला इलाही ने यह भी बताया कि ईरानी लोग आम तौर पर शहादत की किसी भी संभावना का स्वागत करते हैं। अली खामेनेई का भी स्पष्ट कहना था कि शहीद होना उनके लिए फख्र की बात है। अयातुल्ला इलाही का कहना था कि इस्लामिक रिपब्लिक के सभी नेता बहुत सादा और किफायती जीवन जीते हैं। उनके पास दो-तीन जोड़ी से ज्यादा कपड़े भी नहीं होते। वे खान-पान के मामले में आम ईरानियों की तरह ही होते हैं। किसी विशेष सुविधा में उनकी दिलचस्पी नहीं होती। ईरान के खुफिया तंत्र को संचालित करने वाले लारीजानी से भी आग्रह किया गया था कि वे लोगों के बीच जाने से जुड़े अंदेशों को समझें, लेकिन उन्होंने भी इस बात को मानने से इंकार कर दिया। वे आम लोगों के बीच जाते रहे और इसका अंत भी उनकी शहादत में निकला। 
जब मैंने अयातुल्ला इलाही से सवाल पूछा कि क्या उन लोगों ने पिछले साल हुए बारह दिन के युद्ध के बाद अगले युद्ध के लिए अपनी तैयारी शुरू कर दी थी, तो उनका जवाब ‘हां’ में था। उनके साथ के लोगों ने बताया कि एक-एक पद के लिए तीन-तीन और चार-चार विकल्प तैयार कर लिए गये थे। अगर एक नेता मारा जाएगा, तो उसकी जगह लेने के लिए दूसरा तैयार रहेगा। इस तरह ईरानी सत्ता का ढांचा कुछ इस तरह का बना दिया गया था कि अमरीका और इज़रायल बार-बार हमला करके भी ईरान को नेतृत्व विहीन नहीं कर सकते थे और दरअसल हुआ भी यही। विभिन्न रक्षा विशेषज्ञों ने बताया है कि मोसाद की थ्यूरी यह थी कि युद्ध से पहले या उसके होते ही सबसे पहले अगर नेतृत्व को खत्म कर दिया जाए तो सत्ता का ढांचा भरभरा कर ढह जाएगा। सीआईए को भी यह थीसिस पसंद आई। इसलिए आक्रमणकारियों ने शुरू से योजना बना कर नेताओं का खात्मा करना जारी रखा, लेकिन वे नहीं जानते थे कि ईरान में एक नेता जैसे ही सीन से हटेगा, उसकी जगह लेने के लिए दूसरा नेता तैयार होगा। यह ऐसी तैयारी थी जिसके बारे में अमरीकी रणनीतिकारों ने पहले सोचा भी नहीं था। दरअसल, यह रणनीति कई दशकों से धीरे-धीरे तैयार की जा रही थी, खासकर 2000 के दशक से ताकि ‘डिकेपिटेशन स्ट्राइक’ (शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाने वाले हमलों) से पूरा सिस्टम ठप न हो जाए। 
इसमें सबसे उल्लेखनीय है ‘मोज़ेक डिफेंस’ स्ट्रेटेजी। यह ईरान की मुख्य सैन्य रणनीति है, जिसके बारे में विदेश मंत्री अब्बास आराघची युद्ध के शुरुआती दिनों में ही जानकारी दे चुके हैं। इसके तहत ईरान ने अपनी सेना और रेवोल्यूशनरी गॉर्ड को केंद्रीय कमांड से हटाकर 31 प्रांतीय/क्षेत्रीय इकाइयों में बांट दिया। इसके मुताबिक हर प्रांत या क्षेत्र एक ‘मोज़ेक टाइल’ की तरह स्वतंत्र रूप से काम करता है। स्थानीय कमांडरों को पहले से ही व्यापक अधिकार दिए गए हैं कि वे बिना तेहरान से आदेश के फैसले ले सकें, हमले कर सकें या जवाबी कार्रवाई करें। अगर तेहरान या शीर्ष कमांडर मारे जाते हैं, तो भी स्थानीय यूनिट्स लड़ाई जारी रख सकती हैं। यह 1980 के ईरान-इराक युद्ध और 2003 के इराक युद्ध से सीखी गई रणनीति पर आधारित है। जैसा कि पहले बताया जा चुका है, शीर्ष पदों पर कई उत्तराधिकारी तय कर दिये गए थे। खामेनेई ने युद्ध से पहले ही हर महत्वपूर्ण सैन्य और सरकारी पद के लिए 3-4 उत्तराधिकारी नामित कर दिए थे। अगर पहला मारा जाता है, तो दूसरा/तीसरा/चौथा तुरंत कमांड संभाल लेता है। 
हम लोगों का एक सवाल यह भी था कि क्या ईरानी नेतृत्व को भारत सरकार की तरफ से अपनाये गये रवैये का पहले से अंदाज़ा था। नरेंद्र मोदी की सरकार ने आज तक ईरान पर हुए वहशियाना हमले की निंदा नहीं की है। प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति ने आज तक सर्वोच्च नेता की हत्या पर शोक व्यक्त नहीं किया है। उल्टे भारत ने ईरान द्वारा अपने बचाव में की गई कार्रवाई को घातक हमला कह कर भर्त्सना की है। इस सवाल के जवाब में ईरानी नेताओं का कहना था कि उन्होंने पहले भारत सरकार के इस रवैये का अनुमान नहीं लगाया था। यानी, उन्हें इस पर ताज्जुब हुआ। उनका कहना था कि भारत और ईरान के बीच सात हज़ार साल पुराने सांस्कृतिक रिश्ते हैं यानी ईरान में इस्लाम के आने से बहुत पहले से दोनों देशों के बीच संबंध रहे हैं। इसके बाद उन्होंने यह भी कहा कि भारत सरकार के इस रवैये के बावजूद ईरान भारत को अपना पुराना पड़ोसी मानता है और उसने भारत को शत्रु देश की श्रेणी में नहीं डाला है। पड़ोसी देश मानने के कारण वह भारत को प्राथमिकता देता है, इसीलिए होर्मुज जलडमरू मध्य से भारत के चुनिंदा जहाजों को निकलने की इजाज़त दी गई। 

लेखक अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में प्ऱोफेसर और भारतीय भाषाओं के अभिलेखागारीय अनुसंधान कार्यक्रम के निदेशक हैं।

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