परमाणु जंग की दहलीज पर खड़ी हो गई है दुनिया

पश्चिम एशिया में जिस तेजी से सामरिक परिदृश्य बदल रहा है, उससे इज़रायल-अमरीका-ईरान जंग धीरे-धीरे परमाणु युद्ध की दहलीज पर आ खड़ी हुई है। जिस तरह जंग के 23वें दिन ईरान ने कई इज़रायली शहरों पर कलस्टर बमों की झड़ी लगा दी और उसके डिमोना व अराद जैसे परमाणु शोध के सबसे संवेदनशील शहरों को निशाना बनाया, उससे भले इज़रायल ईरान को घुटनों पर ला देने की धमकियां दे रहा हो, लेकिन सैन्य विशेषज्ञों के मुताबिक सच्चाई यह है कि इज़रायल के होश फाख्ता हो गये हैं। 28 फरवरी 2026 को जिस आक्रामक तरीके से इज़रायल और अमरीका ने मिलकर ईरान पर महज कुछ घंटों के भीतर 50 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा के बम बरसाये थे और ईरान के टॉप लीडर अयातुल्ला खामेनेई सहित 9 शीर्ष राजनेताओं और 11 से ज्यादा वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को पहले ही दिन मार डाला था, उससे दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश हुई थी कि ईरान के विरुद्ध तो अमरीका और इज़रायल चंद घंटों में ही जंग खत्म कर देंगे। लेकिन 23 मार्च 2026 को 24वें दिन भी न सिर्फ ईरान दोहरी ताकत से पलटवार कर रहा है बल्कि किसी भी ईंट का जवाब पत्थर से दे रहा है। हकीकत ये है कि अब अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और उनकी टीम जब ईरान से युद्ध विराम करने की बेसब्री से फिराक में है, तब ईरान न केवल अमरीका के हर हमले का पलटकर जवाब दे रहा है बल्कि साफ शब्दों में उसने कह दिया है कि अगर युद्ध विराम चाहिए तो पहले 6 शर्तें माननी होंगी। ईरान की ये शर्तें हैं-
* भविष्य में दोबारा युद्ध नहीं होगा, इसकी गारंटी दें।
* मध्य पूर्व में अमरीका के जो 38 सैन्य ठिकाने हैं, उनको बंद किया जाए।
* ईरान को इस युद्ध में अब तक हुए सारे नुकसान का मुआवजा देकर भरपायी की जाए।
* पूरे मध्य पूर्व में चल रहे सभी युद्ध खत्म किए जाएं।
* होर्मुज स्ट्रेट के नये नियम बनाए जाएं।
* ईरान के खिलाफ मीडियाकर्मियों पर कार्रवाई की जाए।
इस तरह भले अमरीका में इज़रायल के राजदूत येचिएल लीटर कह रहे हों कि वो ईरान को घुटनों पर लाकर ही दम लेंगे, लेकिन खुली नज़रों से इस जंग पर नज़र रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि अब तो यह महज इज़रायल की गीदड़ भभकी ही लगती है। क्योंकि इज़रायली राजदूत की प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म होते-होते ही ईरान ने राष्ट्रपति मसूद पज़शकियान ने गरजकर कहा कि हम किसी भी हमले का न सिर्फ जवाब देंगे बल्कि अगर ईरान के परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया गया, तो होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह से बंद कर देंगे, जिससे पूरी दुनिया तेल संकट से घिर जायेगी। इज़रायल भले ईरान को लेकर लापरवाह बयान और बार-बार मिटा देने की धमकी दे रहा हो, लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और उनके मुख्य सलाहकारों में से दो सलाहकार जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ ने वास्तव में ईरान की धमकियों को गंभीरता से लिया है। शायद यही कारण है कि एक्सियोज न्यूज के मुताबिक राष्ट्रपति ट्रम्प अपने सलाहकारों के साथ इस बात पर गंभीरता से चर्चा कर रहे हैं कि सीजफायर की कोई राह कैसे निकले?
हालांकि उन्होंने ईरान की मुआवजा संबंधी शर्त को न केवल मानने से इंकार कर दिया है बल्कि अपनी सोशल मीडिया पोस्ट पर यह धमकी भी दी है कि अगर 48 घंटों के भीतर ईरान का होर्मुज स्टे्रट को लेकर रवैया नहीं बदलता तो उसके ऊर्जा ठिकानों पर बमबारी की झड़ी लगा दी जायेगी। अगर ट्रम्प अपने कहे को नाक का बाल बनाते हैं, तो सोमवार (23 मार्च 2026) की देर शाम 48 घंटे की अवधि खत्म हो जाती है और अगर सचमुच ट्रम्प दु:साहस पर उतरे तो सैन्य विशेषज्ञों को शक है कि सीमित प्रभाव वाला ही सही, पर परमाणु युद्ध भी छिड़ सकता है। लेकिन अगर परमाणु युद्ध न भी छिड़े और जिस तरह दोनों तरफ से एक-दूसरे पर हमलों की झड़ी लगी हुई है, अगर ये भी अगले एक हफ्ते तक जारी रहा, तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पटरी से उतर जायेगी। 
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के प्रमुख फातिह बिरोल ने दुनिया को चेतावनी दी है कि ईरान की जंग दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है। 22 मार्च 2026 को कैनबरा में उन्होंने कहा, ‘जंग के हालात बेहद खराब हैं. यह अगर सिर्फ कुछ दिन यानी एक सप्ताह तक भी और जारी रही, तो पूरी दुनिया तेल और गैस संकट में फंस जायेगी। उन्होंने साफ कहा कि हालात ऐसे हो गये हैं कि दुनिया का कोई भी देश इससे बच नहीं पायेगा और पूरी दुनिया की तेल व गैस सप्लायी चेन पूरी तरह से बाधित हो जायेगी’। अब दुनिया की कई दूसरी ताकतों को आगे बढ़कर इस खतरनाक हो चली जंग पर दखल देना होगा और इसमें यूरोप के साथ बड़ी भूमिका भारत की भी हो सकती है। भारत एकमात्र ऐसी बड़ी राजनीतिक ताकत है, जिसके इस युद्ध में शामिल तीनों पक्षों के साथ अच्छे रिश्ते हैं।
अमरीका के राष्ट्रपति ट्रम्प चाहे जिस भी वजह से कहते हों, लेकिन वह कोई ऐसा एक हफ्ता नहीं गुजरने देते, जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना सबसे अच्छा दोस्त न कहते हों। दूसरी तरफ सच्चाई ये है कि इस जंग के शुरू होने के ठीक दो दिनों पहले प्रधानमंत्री मोदी ने इजरायल की यात्रा की थी। इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू उन्हें अपना दोस्त और दुनिया के महत्वपूर्ण राजनेताओं में शुमार करते हैं। साथ ही इस जंग का सबसे संवेदनशील पहलू यानी ईरान भी भले दुनिया के दूसरे देशों को इतना महत्व न देता हो, लेकिन पिछले 72 घंटों में ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने प्रधानमंत्री मोदी से न सिर्फ दो बार बात की है बल्कि साफ शब्दों में कहा है कि ब्रिक्स के अध्यक्ष होने के नाते मोदी इस युद्ध को रुकवाने में अपनी भूमिका निभाएं। गौरतलब है कि पिछले 72 घंटों में पूरी दुनिया में इस युद्ध को लेकर सिहरन बढ़ गई है और यूरोप से लेकर दक्षिण अफ्रीका तक हर महत्वपूर्ण और बड़े राजनेता के माथे पर परेशानियों की लकीर देखी गई है, क्योंकि यह जंग अब परमाणु युद्ध की दहलीज पर पहुंच गई है।
जिस तरह से ईरान ने इजरायल के डिमोना और अराद जैसे शहरों को निशाना बनाया, जिसे वह हमेशा इस जंग से बिल्कुल दूर रखने की कोशिश कर रहा था, उससे इजरायल में तो हड़कंप मचा ही है। दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि ईरान ने जिस तरह हिंद महासागर में स्थित ब्रितानी और अमरीका के साझे सैन्य ठिकाने डियागोगार्सिया तक मिसाइल हमला किया है, उससे साफहै कि अभी तक दुनिया को यही मालूम था कि ईरान के पास 2000 से 2500 किलोमीटर तक मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइलें ही हैं, लेकिन लगभग 4000 किलोमीटर दूर डियागोगार्सिया पर उसने जिस तरह बैलिस्टिक मिसाइल से हमला किया है, उससे बात साफ हो गई है कि पूरा यूरोप उसके निशाने की जद में है। इसलिए अब भारत जैसे देश को कूटनीतिक कमर कस कर आगे आना ही होगा ताकि दुनिया युद्ध की आग में राख होने से बच सके। भारत पूर्व की गुटनिरपेक्ष ताकत होने के कारण न सिर्फ अपना असर रखता है बल्कि बड़ा उपभोक्ता बाजार होने के कारण दुनिया की हर आर्थिक शक्ति उसके बाजार में कारोबार करने के लिए लालायित है। भारत को अपनी इस हैसियत का फायदा उठाना चाहिए और प्रधानमंत्री मोदी को आगे बढ़ कर सचमुच युद्ध को रुकवाने का श्रेय लेना चाहिए।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर

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