भारत सरकार की चिंता
ईरान और इज़रायल-अमरीका का युद्ध चौथे सप्ताह में प्रवेश कर गया है। अमरीका और इज़रायल ने 28 फरवरी को ईरान पर हमला किया था और उसके प्रमुख नेताओं और जरनैलों सहित बहुत सारे पदाधिकारियों को खत्म कर दिया था। उसके बाद शुरू हुआ युद्ध लगातार भयानक होता जा रही है। इससे ज्यादातर खाड़ी देश भी इसकी चपेट में आ गये हैं। ईरान के ज़रिये होर्मुज जलडमरूमध्य पर लगाये सख्त पहरे के कारण वहां से समुद्री जहाज़ों की आवागमन ठप्प होकर रह गया है, जिससे तेल का संकट भी पैदा हो गया है, क्योंकि होर्मुज द्वारा दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल का व्यापार होता है, जिस कारण दुनियाभर में तेल और गैस का संकट पैदा होना शुरू हो गया है। इससे भारत भी अछूता नहीं रहा। यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि यह युद्ध जितना लम्बा होगा, उतना ही ऊर्जा का संकट पैदा हो जाएगा।
विगत तीन सप्ताह में ईरान द्वारा खाड़ी देशों के तेल भंडारों और गैस भंडारों पर किए गये मिज़ाइल हमलों के कारण वहां बहुत से देशों ने तेल और गैस निकालना बंद कर दिया है। इससे तेल और गैस की अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में अब तक 60 प्रतिशत से अधिक वृद्धि दर्ज की गई है। इससे पहले इज़रायल ने ईरान के तेल और गैस से भरपूर इलाके साऊथ पार्स पर हमला किया था, जिसकी प्रतिक्रिया स्वरूप ईरान ने खाड़ी देशों के इन स्रोतों पर लगातार हमले शुरू कर दिए थे। तेल और गैस की निकासी और सप्लाई बंद होने से दुनिया भर में ऊर्जा का बड़ा संकट पैदा हो सकता है। कतर इन स्रोतों के पक्ष से बेहद अमीर देश है। उस पर इस युद्ध के पड़े असर के कारण बड़ी चिंता पैदा हुई है। अब तक ईरान के हमलों से कतर की कुदरती गैस पैदा करने की सामर्थ्य पर प्रभाव पड़ने के कारण वहां से निर्यात पर बड़ा असर पड़ा है, जिसका अब तक नुकसान 20 बिलियन डॉलर अर्थात (1 लाख, 87 हज़ार करोड़ रुपये) हो चुका है। कतर के ऊर्जा प्रमुख साद शेरिदा अल-काबी ने इसके प्रति बड़ी चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा है कि अब तक देश के ऊर्जा क्षेत्र में जितना नुकसान हो चुका है, उसकी पूर्ति के लिए ही 3 से 5 वर्ष का समय लग सकता है। उन्होंने यह भी कहा है कि वह स्वप्न में भी यह नहीं सोच सकते थे कि एक पड़ोसी मुस्लिम देश द्वारा उस पर इस तरह हमला किया जाएगा। यह भी कहा कि कतर से भारी मात्रा में गैस की सप्लाई इटली, बैल्जियम, दक्षिण कोरिया तथा चीन को जाती थी। उन्होंने यह भी कहा कि अब तक गैस और पैट्रोल पदार्थों के निर्यात पर 24 प्रतिशत फर्क पड़ चुका है तथा जो इकाइयां तबाह हुई हैं, उनकी कीमत लगभग 26 बिलियन डालर (2 लाख, 43 हज़ार, 1 सौ करोड़ रुपये) है।
इस संकट को देखते हुए प्रत्येक देश ने अपनी-अपनी योजनाबंदी शुरू कर दी है। इस चिन्ता से ही अब ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जर्मनी, दक्षिण कोरिया, आस्ट्रेलिया, यूएई तथा बहरीन ने ईरानी सेना द्वारा होर्मुज जलडमरूमघ्य की नाकाबंदी की कड़ी आलोचना की है। अमरीका के रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने भी यह धमकी दी है कि उनके देश का लक्ष्य ईरान के मिसाइल स्टेशनों को तबाह करने के साथ-साथ उनकी नौसैना का नुकसान करना तथा ईरान को परमाणु बम बनाने से रोकना है। उन्होंने बताया है कि अब तक ईरान में 7 हज़ार लक्ष्य साधे गए हैं। उसके 40 जहाज़ तथा 11 पनडुब्बियां भी तबाह कर दी गई हैं। पैदा हुए इस हालात के दृष्टिगत भारत सरकार की चिन्ता भी बढ़ी है।
देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा में पैदा हुई इस स्थिति के बारे में सम्बोधित करते हुए बताया कि पश्चिम एशिया में पैदा हुई स्थिति के हम पर कई पहलुओं से प्रभाव पड़ रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने आश्वासन दिया है कि सरकार युद्ध के कारण पैदा हुए संकट से निपटने के लिए हर सम्भव कदम उठा रही है। हमें कोरोना संकट के समय की तरह अपनी एकता के साथ इस संकट का सामना करना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमारा उद्देश्य खाड़ी देशों में रहते अपने लोगों को सुरक्षित रखना तथा अपनी तेल व गैस की ज़रूरतों की पूर्ति के लिए यत्न जारी रखने का है। खाड़ी देशों में से 3,75,000 लोगों को और ईरान से 1000 नागरिकों को वापिस लाया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि होर्मुज की खाड़ी में व्यापारिक समुद्री जहाज़ों के लिए रास्ता बंद करना सही नहीं है। तेल और गैस संकट पैदा करने वाले आधारभूत ढांचे पर हमले भी उचित नहीं हैं। पैदा हुई समस्या का समाधान बातचीत के ज़रिये ही किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बाधाओं के बावजूद तेल और गैस की सप्लाई जारी रखने के भी यत्न किए जा रहे हैं।
नि:संदेह प्रधानमंत्री ने पैदा हुए संकट संबंधी तथा भारत सरकार के यत्नों संबंधी लोकसभा में जो जानकारी और आश्वासन दिया है, उससे देश को इस संकट का सामना करने में मदद मिलेगी।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

