गुलाम कश्मीर में आतंकी स्कूल पैदा कर रहे हैं बाल जिहादी
पाकिस्तान और गुलाम कश्मीर में जैश-ए-मोहम्मद और लश्करे-तैयबा की नई साजिश अब बाल जिहादी पैदा करने की शुरू हो गई है। आतंकी शिविरों, धार्मिक सम्मेलनों और जुलूसों के बाद अब पाठशालाओं में छात्रों को बाल जिहादी बनाने के लिए प्रशिक्षित करने का खेल शुरू हो गया है। इन आतंकी संगठनों ने इस्लाम, पीओके में जिहाद और शिक्षा के बहाने आतंकियों की नई फौज खड़ी करने के लिए छात्रों की भर्ती आरम्भ की है। इसके लिए बकायदा विज्ञापन व पोस्टर जारी कर माता-पिताओं से कहा जा रहा है कि वे 7 से 13 साल तक के बच्चों को उनके द्वारा संचालित मदरसों में भर्ती करें। यहां उन्हें शिक्षा के साथ मुफ्त खाना, मासिक भत्ता और इस्लाम की मान्यताओं के अनुसार जंग में लड़ने की तालीम भी दी जाती है। यही नहीं आतंकी संगठनों के उत्प्रेरक पीओके के सरकारी व गैर-सरकारी स्कूलों में जाकर जिहादी भाषण दे रहे हैं। छात्रों के लिए इन स्कूलों में नाटकों के जरिए आतंकियों की वेशभूषा में प्रतियोगिताएं कराई जा रही हैं, जिससे बालपन से ही इन छात्रों में आतंकी मानसिकता विकसित हो जाए। यह खेल सितम्बर 2025 से चल रहा है। ये संगठन मुख्य रूप से गरीब बच्चों के अभिभावकों को बरगला रहे हैं।
इन सब कारणों के चलते वैश्विक आतंकवाद सूचकांक-2026 के अनुसार पाकिस्तान सूचकांक के शीर्ष पर होने के साथ आतंकवाद से सबसे अधिक प्रभावित देश बना हुआ है जबकि अफगानिस्तान में हालात सुधर रहे हैं। इस कारण यह देश अब शीर्ष 10 देशों की सूची से बाहर हो गया है। हालांकि दक्षिण एशिया अभी भी आतंकवाद से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र बना हुआ है। इसके बावजूद भारत के लिए यह अच्छी बात है कि यहां आतंकी घटनाओं में 43 प्रतिशत की कमी आई है। दुनियाभर में 2025 में आतंकवाद से होने वाली मौतों में 28 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। कुल मिलाकर आतंक से ग्रस्त 81 देशों में स्थिति सुधरी है, जबकि 19 देशों में बदतर हुई है।
इनमें सबसे खराब स्थिति पाकिस्तान की है क्योंकि वह आतंकी हालात से उबरने की बजाये अपने ही देश के बच्चों को जिहादी बना देने का क्रूरतम खेल खेलने में लम्बे समय से लगा है। पाकिस्तान स्थित प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिद्दीन ने जम्मू-कश्मीर में सेना और सुरक्षा बलों पर जो भी आत्मघाती हमले कराए हैं, उनमें बड़ी संख्या में मासूम बच्चों और किशोरों का इस्तेमाल किया गया था। इस सत्य का खुलासा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की ‘बच्चे एवं सशस्त्र संघर्ष’ नाम से आई रिपोर्ट में भी किया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे आतंकी संगठनों में शामिल किए जाने वाले बच्चों और किशोरों को आतंक का पाठ मदरसों में पढ़ाया गया है। पुलवामा ज़िले में मुठभेड़ के दौरान 15 साल का एक नाबालिग मारा गया था और नाबालिग सज्जाद बट शामिल था। मुंबई के ताज होटल पर हुए आतंकी हमले में भी पाकिस्तान द्वारा प्रशिक्षित अजमल कसाब भी नाबालिग था।
इस रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान में मौजूद आतंकी संगठनों ने ऐसे वीडियो जारी किए हैं, जिनमें किशोरों को आत्मघाती हमलों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। पाकिस्तान में सशस्त्र समूहों द्वारा बच्चों व किशोरों को भर्ती किए जाने की लगातार खबरें मिल रही हैं। कुछ साल पहले तहरीक-ए-तालिबान ने एक वीडियो जारी किया था, जिसमें लड़कियों सहित बच्चों को सिखाया जा रहा है कि आत्मघाती हमले किस तरह किए जाते हैं। दरअसल पाकिस्तानकी अवाम में यह मंसूबा पल रहा है कि ‘हंस के लिया था पाकिस्तान, लड़ कर लेंगे हिंदुस्तान।’ इस मकसदपूर्ति के लिए मुस्लिम कौम के उन गरीब और लाचार बच्चों, किशोर और युवाओं को इस्लाम के बहाने आतंकवादी बनाने का काम किया जा रहा है, जो अपने परिवार की आर्थिक बदहाली दूर करने के लिए आर्थिक सुरक्षा चाहते हैं।
पाकिस्तानी सेना के भेष में यही आतंकी अंतर्राष्ट्रीय नियंत्रण रेखा को पार कर भारत-पाक सीमा पर छद्म युद्ध लड़ रहे हैं। कारगिल युद्ध में भी इन छद्म बहरूपियों की मुख्य भूमिका थी। इस सच्चाई से पर्दा संयुक्त राष्ट्र ने तो बहुत बाद में उठाया, पाक के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल एवं पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई के सेवानिवृत्त अधिकारी रहे, शाहिद अजीज ने ‘द नेशनल डेली अखबार’ में पहले ही उठा दिया था। अजीज ने कहा था कि ‘कारगिल से भी हमने कोई सबक नहीं लिया है। हकीकत यह है कि हमारे गलत और जिद्दी कामों की कीमत हमारे बच्चे अपने खून से चुका रहे हैं।’ इसे पाकिस्तान के बच्चों का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि वे आज भी आतंकी बनाए जाने के लिए ‘गिनी-पिग’ बनाए जा रहे हैं।
आतंकवाद के बहाने धार्मिक कट्टरवाद का जहर मुस्लिम समाज की भीतरी सतहों को संकीर्ण बनाने का काम कर रहा है। यह संकीर्णता मुसलिम बहुलता वाले देशों में रहने वाले अल्पसंख्याकों के लिए तो घातक साबित हो ही रही है, इस्लाम धर्म से जुड़ी विभिन्न नस्लों को भी आपस में लड़ाने का काम कर रही है। अफगानिस्तान, इराक, मिस्र, नाइजरिया, सीरिया, पाकिस्तान में अलकायदा और आईएस आखिरकार किससे लड़े थे? यह लड़ाई शिया, सुन्नी, कुर्द, अहमदिया और बहावी इस्लाम धर्मावलंबियों में ही तो परस्पर हुई थी।
अमरीका-इज़रायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध में हम देख रहे हैं कि ईरान मुस्लिम देशों को ही ध्वस्त करने में लगा है। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के काबुल में एक नशा-मुक्ति अस्पताल पर हवाई हमला करके 400 से भी अधिक लोगों को मार डाला। पाकिस्तान में शिया-सुन्नियों के बीच भी हिंसक वारदातें निरंतर होती रहती हैं। पाकिस्तान सुन्नी बाहुल्य होने के बावजूद शियाओं के हित साधता रहा है। पाकिस्तान को इस लाचारी का सामना इसलिए करना पड़ता है, क्योंकि ईरान अरबों रुपए पाकिस्तान को मदद के रूप में देता है। लिहाजा आर्थिक लाभ मिले तो पाकिस्तान अपने ही देश की नस्लों को आपस में लड़ाने से नहीं चूकता है।



