अलग-थलग पड़ते ट्रम्प

28 फरवरी को अमरीका और इज़रायल की ओर से ईरान पर किए गए हमले को आज 26वां दिन हो गया है। इस युद्ध से जहां पश्चिम एशिया के देशों पर गहरा प्रभाव पड़ा है, वहीं विश्व भर के अन्य देश भी इससे बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। अकेले तेल और गैस की कमी से ही एक तरह से अफरा-तफरी मच गई है। अमरीका जैसा देश भी इससे बुरी तरह प्रभावित हुआ है। वहां प्रत्येक क्षेत्र में महंगाई बढ़ने के समाचार प्राप्त हो रहे हैं। खाड़ी देशों में तेल के मूलभूत ढांचे के लगभग 40 प्रतिशत तक तबाह होने के समाचार प्राप्त हुए हैं। तेल के बड़े-बड़े निर्यातक सऊदी अरब, यूनाइटिड अरब अमीरात और कतर जिन पर ईरान ने हमले किए हैं, बुरी तरह घबरा गए हैं। 
अन्तर्राष्ट्रीय तेल सप्लाई प्रतिदिन एक करोड़ बैरल कम हो गई है। इससे विश्व भर में कृषि के लिए आवश्यक  खाद का भी संकट पैदा हो गया है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि यह संकट कोविड-19 जैसी गम्भीर चुनौती है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत का यत्न सभी देशों के बीच शीघ्र-अतिशीघ्र शांति स्थापित करने का है। दूसरी तरफ भारत ने ऊर्जा संकट पर नियंत्रण रखने के लिए 27 से बढ़ा कर 41 देशों तक तेल और गैस की सप्लाई हासिल करने के लिए सम्पर्क किया है।  इसी कारण अभी तक तेल के मामले पर स्थिति संकटमय नहीं हुई। समाचारों के अनुसार देश के पास इस समय 53 लाख मीट्रिक टन पैट्रोलियम आरक्षित है जिसे 65 लाख मीट्रिक टन तक बढ़ाने का यत्न किया जा रहा है। बड़ी चिन्ता पश्चिमी एशिया के देशों में काम-काज के लिए गये लगभग एक करोड़ भारतीय लोगों की सुरक्षा की है। ईरान में पढ़ाई हेतु गये बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को भी वापिस बुला लिया गया है। इस युद्ध में राष्ट्रपति ट्रम्प बुरी तरह से घिर गए प्रतीत होते हैं। समाचारों के अनुसार वह इसमें से निकलने का पूरा यत्न कर रहे हैं। पिछले सोमवार को उन्होंने पांच दिनों के लिए अपने तौर पर युद्ध-विराम की घोषणा की थी और यह भी दावा किया था कि ईरान बातचीत के लिए सहमत है। इसलिए अमरीका ईरान के बिजली और तेल के ज़खीरों पर हमले नहीं करेगा,परन्तु इस संबंध में अभी तक इज़रायल और ईरान द्वारा पक्ष स्पष्ट नहीं हुआ। इज़रायल अभी भी तेहरान पर कलस्टर बम द़ाग रहा है। दूसरी तरफ ईरान ने भी कहा है कि वह चुप नहीं बैठेगा। चाहे ये भी समाचार आ रहे हैं कि मिस्र, तुर्की, कतर और पाकिस्तान आदि देश दोनों पक्षों के बीच युद्धबंदी करवाने के लिए बड़े यत्न कर रहे हैं।
अब ट्रम्प की बड़ी घबराहट यह भी है कि नाटो गठबंधन से संबंधित 32 यूरोपीयन देशों ने भी उसके साथ युद्ध में शामिल होने से इन्कार कर दिया है। चीन के साथ लगते द्वीप देश ताईवान के लिए भी चीन की ओर से ़खतरा मंडराता दिखाई दे रहा है। ट्रम्प अब अकेले पड़ते दिखाई देते हैं, क्योंकि अमरीका में भी उनकी कड़ी आलोचना होना शुरू हो गई है। अमरीकी रक्षा मंत्रालय ने वहां की कांग्रेस से इस युद्ध के लिए 19 लाख करोड़ रुपये का बजट मांगा है। युद्ध पर प्रतिदिन का खर्च 13 हज़ार करोड़ रुपये आ रहा है। अमरीकी संसद में ट्रम्प की अपनी रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं द्वारा भी उनका विरोध होना शुरू हो गया है और यह प्रतीत हो रहा है कि शायद युद्ध के लिए बजट पारित ही न हो सके। नि:संदेह विश्व इस विनाशकारी युद्ध के शीघ्र ही समाप्त होने की उम्मीद लगाये बैठा है। हालात भी ऐसे ही बनते दिखाई दे रहे हैं। यदि ट्रम्प को युद्धबंदी करने के लिए विवश होना पड़ता है तो यह विश्व भर के लिए एक बड़ा और सन्तोषजनक सन्देश होगा। 

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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