यह युद्ध कब खत्म होगा ?
इस समय भारत ही नहीं पूरे विश्व के सुहृदय लोग एक ही सवाल कर रहे हैं कि यह युद्ध कब खत्म होगा? युद्धखोर शक्तियां युद्ध के दिनों इन्सान और इन्सानियत की कद्र-कीमत भूले रहती हैं। उनके सामने टारगेट रहता है। उस टारगेट में कितने मासूम लोगों की जान चली गई, वह महज एक आंकड़ा ही होता है, दिल को छुए बिना। ईरान युद्ध कब खत्म होगा, यह सवाल हर कोई हर किसी से पूछ रहा है। क्या इसका जवाब पहले उन देशों को नहीं देना चाहिए जिन्होंने युद्ध शुरू किया है- अमरीका और इज़रायल। दूसरे, यह युद्ध कुछ सीमा तक ईरान की प्रतिक्रिया तथा उसकी सेना की क्षमता तथा राजनीतिक क्षमता पर भी निर्भर करता है। क्योंकि जितना आसान अमरीका और इज़रायल ने समझा था, उतना सरल यह रहा नहीं। एक बात और समझनी ज़रूरी है वह यह कि इज़रायल के युद्ध के उद्देश्य जितने साफ और स्पष्ट हैं, वहीं अमरीका की स्थिति में उलझाव है।
ईरान की सरकार धार्मिक सरकार है, वह अपने नागरिकों के प्रति उदार नहीं रही और बाहरी तौर पर भी हमलावर रही है, खासकर इज़रायल को लेकर। इज़रायल को ईरान के नागरिकों की परवाह हो न हो, लेकिन अपने विरोध की चिंता बहुत है। वह ईरान की राजनीतिक ताकत को खत्म करना चाहता है उसकी सैन्य व्यवस्था पर हमले करके। ऐसा इसलिए है कि वह ईरान के सहयोगी समूहों की ताकत बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर पा रहा-विशेष तौर पर लेबनान में हिजबुल्ला और गाजा में हमास। अक्तूबर 2023 के बाद इन दोनों समूहों को भारी नुकसान उठाना पड़ा था। यहां तक कि कुछ लोगों को लगने लगा था कि वे दुबारा खड़े नहीं हो पाएंगे लेकिन लेबनान में हिजबुल्ला कमजोर तो हुआ परन्तु दुबारा सक्रिय हो गया। ईरान में इज़रायल का उद्देश्य ईरान में समाज को तबाह करना नहीं है बल्कि सरकार बदलने का है। अमरीकी राष्ट्रपति भी अपने भाषणों में इस बात के संकेत दे चुके हैं। ईरानी समाज 1979 से पहले (क्रांति से पहले) इज़रायल का मित्र माना जाता था। इज़रायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू और अन्य दक्षिणपंथी विचारधारा के समर्थकों के लिए अक्तूबर 2023 के बाद गाजा के फिलिस्तीनी दानव से कम माने जाने लगे थे। सो हिंसक विनाश को भी सही ठहराया गया। इतिहास समझता है कि ऐसी सोच नरसंहार या बड़े पैमाने पर हत्या को जन्म दे सकती है। इज़रायल में ईरान की सरकार को बुरा माना गया, लेकिन समाज को नहीं। इसलिए गाजा में अपनाई गई नीति और ईरान में अपनाई गई नीति में फर्क हो सकता है।
जो सामने नज़र आ रहा है वह यह कि सरकार बदलना मुमकिन लग नहीं रहा, या लम्बे समय तक संभव न हो। क्योंकि नाराज़ और विद्रोही शक्तियां फिलहाल उस तरह उभर कर सामने नहीं आ रहीं। नेताओं को मार देने से हमेशा राजनीतिक व्यवस्था बदल नहीं जाती। विशेष तौर पर ऐसे देश में जहां व्यवस्था के आधार अधिक मजबूत और स्पष्ट हों। 1979 की क्रांति के बाद ईरान ने संविधान के ज़रिए एक धार्मिक-शासन व्यवस्था बना ली, जिसमें धर्म गुरुओं के पास चुनी हुई सरकार से ज्यादा ताकत है। दूसरी ओर खास बात यह है कि क्रांति की रक्षा के लिए एक बड़ा संगठन बनाया गया। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड क्रांति यदि मौजदा नेतृत्व की बाहरी शक्ति हटा भी दें तो स्थापित प्रक्रिया के ज़रिये नया नेतृत्व उभर सकता है। इससे ज़ाहिर है कि निकट भविष्य में बाहरी ताकत इस पूरी व्यवस्था में सुराख नहीं कर सकती।



