धार्मिक ग्रंथों की बेअदबी का मामला तथा कानून
खंदा-ज़न क़ुफ्रर है एहसास तुझे है कि नहीं,
अपनी तौहीद का कुछ पास तुझे है कि नहीं।
अल्लामा इकबाल के इस शे’अर का अर्थ है कि क़ुफ्र (झूठ/़गैर) तेरी हालत पर हंस रहा है, तुझे इसका कुछ एहसास है या नहीं और अपने एकमात्र रब्ब (तौहीद) होने का कोई ख्याल या फ्रिक या इज़्ज़त (पास) है या नहीं? बिल्कुल यही सवाल मैं अपनी समूची सिख कौम तथा विशेषकर इस कौम के धार्मिक तथा राजनीतिक रहनुमाओं से पूछने के लिए मजबूर हूं, जबकि वे गुरु ग्रंथ साहिब की बे-अदबी बारे कानून बनाने की जल्दबाज़ी में लगे हुए हैं। रब्ब का वास्ता यदि किसी राजनीतिक दबाव में आकर या अपने राजनीतिक लाभ के लिए जल्दबाज़ी में बिना इस कानून के लाभ-हानि पर विचार किए, कोई कानून बनाया जाता है तो उससे नुकसान ही होगा।
गत दिवस दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आर.एस. सोढी (सेवा-निवृत्त) का एक लेख पढ़ा। उन्होंने लिखा है,‘क्या कोई जज यह निर्धारित कर सकता है कि पवित्र श्री गुरु ग्रंथ साहिब की ‘बेअदबी’ क्या है, जिसका सार इसके शब्दों की सदीवता में है? श्री गुरु ग्रंथ साहिब में स्थान-स्थान पर शब्द की महिमा की गई है, जिसे सिख दर्शन में सदीवी तथा सर्वव्यापी माना जाता है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब के स्वरूप बारे बनाया गया कोई भी दुनियावी कानून शब्द गुरु की रूहानी शक्ति को कम नहीं कर सकता।’ जज साहिब यह भी लिखते हैं, ‘सिख विचारधारा के मूल में एक गहन दार्शनिक सिद्धांत है, जिसे श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने फरमान, ‘गुरु मानिओ ग्रंथ’ के माध्यम से बयान किया है। इस घोषणा से देह-धारी गुरु की परम्परा का अंत हो गया और श्री गुरु ग्रंथ साहिब को सिख समुदाय के लिए सदैव मार्गदर्शक के रूप में स्थापित किया गया। फिर भी इस घोषणा के सही अर्थ नहीं समझे जाते। गुरु साहिबान का इरादा हरगिज़ यह नहीं था कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब को कट्टर रीति-नीति अथवा कानूनी नियमों तक महदूद कर दिया जाए। इसके विपरीत इसको ज्ञान के स्वरूप, रूहानी तथा दार्शनिक दिशा-निर्देशक के रूप में सम्मानित किया जाना था, जो सत्य, विनम्रता तथा ब्रह्म के मार्ग को रौशन करता है।’ जज साहिब लिखते हैं, ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब की रूहानी सर्वोच्चता बिना किसी कानूनी सुरक्षा से सदियों के लिए उथल-पुथल भरे समय के दौरान भी कायम रही है। इसलिए पहले से ही मज़बूत संवैधानिक ढांचे के भीतर कोई विशेष कानून बनाने के ज़रूरत नहीं प्रतीत होती, क्योंकि इसका मतलब रूहानी गुरु की सर्वोच्चता को दुनियावी सीमाओं तक सीमित करना होगा।’
नि:संदेह मैं न तो कोई ज्ञानी हूं, न धार्मिक शख्सियत और न ही कोई दार्शनिक हूं, परन्तु हाईकोर्ट के इस पूर्व तथा गुरु को समर्पित जज के उद्गारों से पूरी तरह सहमत हूं। मुझे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि इस बारे कानून बनाना विशुद्ध राजनीतिक लाभ-हानि को देखना है। मेरी साफ सोच है कि ऐसे कानून का सिख कौम तथा धर्म को लाभ तो शायद ही कोई हो, परन्तु कुछ बड़े नुकसान स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। पहला तथा सबसे बड़ा नुकसान इससे यह होगा कि यह सिखी के प्रचार-प्रसार तथा गुरबाणी की विचारधारा के प्रसार को रोकने का काम करेगा। इससे गुरबाणी के शब्द गुरु जो अमूर्त्त तथा रूहानी है, के साथ सिर्फ कागज़ पर स्याही से लिखे ग्रंथ के रूप में व्यवहार किया जाएगा जिससे श्री गुरु ग्रंथ साहिब की स्थिति ‘बुत्त-पूजा’ की भांति ही निश्चित हो जाएगी। दूसरा, कानून राजनीतिक दुरुपयोग का खतरा पैदा करेगा। यह विरोधियों के खिलाफ झूठी शिकायतें तथा झूठे मामले और सबक सिखाने के लिए इस्तेमाल किए जाने का अंदेशा पैदा करेगा। गुरबाणी जो सर्व-साझी है, सभी लोगों के लिए है।
गुरबाणी इसु जग महि चानणु
करमि वसै मनि आये।।१।।
(सिरीरागु म: 3, अंग 67)
की भांति नहीं, अपितु लोग कानूनी डर-भय के कारण गुरबाणी के प्रकाश पर चर्चा करने से हिचकिचाएंगे, विशेषकर लिखित, अकादमिक और ऑनलाइन चर्चा कम होगी या रुकेगी, जो सिखी के वैश्विक प्रसार के लिए ज़रूरी है, थम जाएगी। तीसरा, इस कानून के बनने से पंथक एकता तथा ताकत भी कम होगी, क्योंकि धार्मिक मामलों में बरतरी अदालतों की होगी। श्री अकाल तख्त साहिब की सर्वोच्चता की परम्परा को ठेस लगेगी और शिरोमणि कमेटी की ताकत भी कम होगी। चौथा नुकसान यह होगा कि यह सिख धर्म के सरबत दे भले, सर्व सांझीवालता वाली छवि को ठेस पहुंचाएगा। इसका प्रभाव कट्टर मुल्लानों द्वारा बनाए ‘ईश निंदा’ के कानून जैसा होगा। अन्य कई नुकसान भी होंगे। लोग गुरबाणी का भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद करने से पीछे हटेंगे। कथाकार भी डर-डर कर गुरबाणी की कथा करेंगे और विशेषकर विद्वान गुरबाणी पर खोज तथा थीसिस लिखने से पीछे हटेंगे।
वैसे भी ऐसे कानून की मांग सिखों की हैसियत एक कमज़ोर तथा निराश्रित कौम को तौर पर प्रकट है, क्योंकि श्री गुरु ग्रंथ साहिब के पृष्ठ फाड़ने या जलाने से गुरबाणी की कोई बेअदबी नहीं होती, गुरबाणी की बेअदबी तो हो ही नहीं सकती। हां, यह सिख कौम को चुनौती अवश्य देती है। फिर कोई भी कानून बेअदबी होने के बाद ही सक्रिय हो सकता है, जबकि ज़रूरत तो ऐसा वातावरण सृजित करने की है कि कोई बेअदबी करने के बारे में सोच ही न सके। ज़रा सोचें, हमने सदियों म़ुगलों के ज़ालिम शासन का मुकाबला किया। उस समय कौन-सा कानून हमारे पक्ष में था। हमने घोड़ियों की पीठ पर रख कर श्री गुरु ग्रंथ साहिब को जंग के मैदानों में अंग-संग रखा। हमने उन हालात का मुकाबला किया, जब गुरु का नाम लेने से रोकने के लिए कानून बना दिया गया कि कोई भी गुड़ को गुड़ नहीं, अपितु रोड़ी या भेली कहेगा। हम दिखावे की इज़्ज़त से बढ़े हैं। गुटका नहीं गुटका साहिब बना लिया है, परन्तु सम्मान सिर्फ दिखावे का है, शब्द गुरु का नहीं। हम सत्कार कमेटियां बना कर लोगों के घरों में से श्री गुरु ग्रंथ साहिब को उठा लेने को गुरबाणी का सम्मान समझ रहे हैं जबकि भाई गुरदास तो यह लिखते हैं :
घरि घरि अंदर धर्मसाल,
होवै कीर्तनु सदा विसोआ।
बाबे तारे चारि चकि,
नओ खंडि प्रिथमी सचा ढोआ।
क्या हम घर-घर में धर्मसाल की स्थापती के विरोधी हैं? इस प्रकार तो हम कल को गुटके हर समय पास रखने पर पाबंदी लगाएंगे, गुरबाणी के ऐप भी नहीं बनने देंगे। सिर्ख धर्म, जो एक वैज्ञानिक धर्म है, को वापस मध्य युग में धकेल कर समयानुकूल नहीं रहने देंगे। ज़रा याद करें, जब गुरु नानक साहिब जी मक्का गए तो भाई गुरदास जी अपनी वार में क्या लिखते हैं :
बाबा फिरि मक्के गया नील बस्तर धारे बनवारी,
आसा हथि किताब कछि कूजा बांग मुसला धारी।
नि:संदेह वह गुरु साहिब स्वयं थे, हम लोग उनके समान नहीं हैं, परन्तु उदाहरण के रूप में देखें कि उनकी कच्छ में जो पुस्तक थी, उसके सिर्फ दो अर्थ ही हो सकते हैं। पहला यह कि पुस्तक में गुरु नानक साहिब द्वारा उच्चारण की गई बाणी दर्ज होगी या फिर दूसरे अर्थ पुस्तक से कुरान शरीफ के लिए हो सकते हैं, क्योंकि कतेब आम तौर पर ज़ंबूर, अंजील (बाइबल) तथा कुरान के लिए इस्तेमाल किया जाता है। खैर, इसका अर्थ यह नहीं कि हम साहिब श्री गुरु गं्रथ साहिब को कच्छ में लेकर जाने की अनुमति दे दें, क्योंकि उस समय सिर्फ पोथियां थीं, परन्तु साहिब श्री गुरु ग्रंथ साहिब के सम्पादन के बाद तथा गुरु गोबिन्द सिंह जी द्वारा इसे गुरु का दर्जा देने के बाद स्थिति बदल गई। सम्मान ज़रूरी है—नियम ज़रूरी हैं, परन्तु ‘ईश निंदा’ जैसे कानूनों की ज़रूरत नहीं।
वतन को कुछ नहीं ़खतरा निज़ाम-ए-ज़र है खतरे में,
हकीकत में जो राहजन है वही रहबर है ़खतरे में।
—हबीब जालिब
यह पहला नहीं, चौथा या पंचवां कानून है
कैसे की जाये रफू अमन की चादर सोचो,
सोचने वालो ज़रा सोचो मुकर्रर सोचो।
ज़रूरत तो सिर्फ यह सोचने की है कि ऐसी सोच ही कैसे बदली जाए जो किसी धर्म की या धर्म ग्रंथ की बेअदबी करने की होती है, परन्तु वैसे अब 13 अप्रैल को बनने वाला सम्भावित कानून कोई पहला कानून नहीं, अपितु इस तरह का चौथा या पांचवां कानून होगा। पहला कानून 2007 वाले अकाली-भाजपा के शासन में 20 जून, 2008 को विधानसभा में पारित किया गया था। इस कानून का नाम ‘जागत जोत श्री गुरु गं्रथ साहिब सत्कार एक्ट-2008’ था। यह मुख्य रूप में पावन स्वरूपों के प्रकाशन के अधिकार तथा वितरण शिरोमणि कमेटी या उसके द्वारा मान्यता प्राप्त संस्था को देता था और यह गुरु ग्रन्थ साहिब के स्वरूपों की सम्भाल तथा सत्कार को सुनिश्चित बनाने के लिए बनाया गया था, जो बाकायदा राज्यपाल द्वारा प्रमाणित है और लागू है चाहे इसके उपयोग का कोई उदाहरण हमारे सामने नहीं है। दूसरा, कानून बहिबल कलां तथा बरगाड़ी जैसी घटनाओं के बाद अकाली-भाजपा के शासन के समय 22 मार्च, 2016 को पारित किया गया। राज्यपाल के हस्ताक्षर हो गए। इसमें धारा 295-ए जोड़ी गई, परन्तु केन्द्र सरकार ने सी.आर.पी.सी. कानून में बदलाव करने से इन्कार कर दिया कि यह कानून सिर्फ एक समुदाय से संबंधित है। फिर कांग्रेस सरकार के समय तीसरा कानून 28 अगस्त, 2018 को पारित किया गया। राज्यपाल ने राष्ट्रपति के पास भेजा, जो आई.पी.सी. के स्थान पर बी.एन.एस. लागू होने के बाद वापस हो गया। चौथा कानून 15 जुलाई, 2025 को ‘पंजाब प्रीवेंशन ऑफ आफैंसिस अगेंस्ट हॉली स्करिप्चर(ज़) बिल-2025 था, जो विधानसभा की सिलैक्ट कमेटी को सौंप दिया गया, जिसकी रिपोर्ट शायद कभी नहीं आएगी, क्योंकि जैसे हमें जानकारी मिली है, उसके अनुसार 13 अप्रैल को विधानसभा में पारित होने वाला कानून संत समाज की सहमति से एक तरह से 5वां नया कानून होगा, जो वास्तव में पहले पारित कानून ‘जागत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार एक्ट-2008’ में संशोधन बिधेयक होगा और इसमें कई नई सख्त धाराएं जोड़ी जा सकती हैं, जिनमें भारी जुर्माना, सम्पत्ति ज़ब्त जैसी सज़ाएं होंगी।
सच जे मैं कहां, ओह करुण दास्तां,
शायद मैं ना रहां जां कि मेरी ज़ुबां,
‘लाल’ बोलन तों पहिलां मेरे दिल दे विच,
इस तरां दे कई डर गुज़रदे गये।
—लाल फिरोज़पुरी
-मो. 92168-60000

