युद्ध के कारण इंटरनेट सेवाओं पर संकट के बादल
अमरीका-इज़रायल व ईरान युद्ध के कारण विश्व के देश उर्जा संकट का समाधान निकालने तो सफल नहीं हो पा रहे कि दूसरी ओर डिजिटल सेवाओं के बाधित होने का खतरा भी मंडराने लगा है। इंटरनेट आज प्रमुख आवश्यकताओं में से एक है। इसमें बाधा आने से एयर लाइंस, बैंकिंग सेवाएं, संचार व्यवस्था जिसमें संवाद स्थापित करने से लेकर सभी तरह की डिजिटल सेवाएं, स्टॉक मार्केट आदि के बुरी तरह प्रभावित होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। आज इंटरनेट पर निर्भरता बहुत अधिक हो गई है। अमरीका-ईरान युद्ध को जिस तरह से शुरुआती दौर में ट्रम्प द्वारा हलके में लिया जा रहा था, वास्तव यह ट्रम्प की गलतफहमी थी। वैसे भी रूस-यूक्रेन के युद्ध से अमरीका को सबक लेना चाहिए था। दोनों देश पास-पास होने और संसाधनों की दृष्टि से रूस अधिक ताकतबर होने के बावजूद आज तक युद्ध समाप्त नहीं हुआ।
अमरीका-ईरान युद्ध के कारण आने वाले समय में मध्य-पूर्व देशों में पेयजल और विश्व में इंटरनेट सेवाओं के प्रभावित होने की संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता। जिस तरह युद्ध के कारण ऊर्जा संकट गंभीर रूप लेता जा रहा हैं। ठीक यही समस्या इंटरनेट को लेकर भी हो सकती है। कारण साफ है। होर्मुज जलडमरूमध्य की तरह ईरान समुद्र में बिछी इंटरनैट केबल्स को भी हथियार के रूप में इस्तेमाल करके उसे नुकसान पहुंचा सकता है। दुनिया की इंटरनेट लाइन का प्रमुख रास्ता भी यही है। होर्मुज जलडमरुमध्य में स्थिति यह है कि इस संकरे स्थान पर तो मात्र 200 फुट की गहराई पर ही इंटरनैट केबल लाईनें बिछी हुई हैं। लगभग यही स्थिति लाल सागर में है। वहां भी इंटरनेट सेवाओं के लिए फाइबर केबल्स बिछी हुई हैं। ऐसा कयास लगाया जा रहा है कि ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरुमध्य क्षेत्र में सुरंगे बिछाने का काम किया जा रहा है और इससे अन्य नुकसान होने के साथ ही फाइबर केबल्स के भी क्षतिग्रस्त होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
अधिकांश प्रमुख सेवाप्रदाताआें ने इसी क्षेत्र में डेटा सेंटर स्थापित कर रखे हैं। जानकारों के अनुसार होर्मुज क्षेत्र में से लगभग 20 और लाल सागर क्षेत्र में से 17 केबल्स गुज़रती है। 2024 में भी लाल सागर क्षेत्र में हूती हमलों के दौरान केबल प्रभावित हो चुकी है। वर्तमान हालातों में यदि ये केबल्स प्रभावित भी होती हैं तो हालात जिस तरह के हैं, उनमें प्रभावित केबल्स को ठीक करने में महीने या साल भी लग सकते हैं। ऐसे में दुनिया के देश एक नए संकट के दौर से गुजरने को मजबूर हो जाएंगे।
इंटरनेट की दुनिया अभी छह दशक भी पूरे नहीं कर पाई है कि एक बड़ी समस्या सामने आ सकती है। आज बड़ी समस्या यह है कि अमेजन, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट आदि के विशाल डेटा सेंटर यूएई और सउदी आदि देशों में हैं। यही कारण है कि समुद्री रास्ते से फाइबर केबल्स भी होर्मुज जलडमरुमध्य व लाल सागर होते हुए ही आगे जाती हैं। यदि केबल्स में व्यवधान होती है या किसी तरह से जाने-अनजाने नुकसान पहुंचता है तो इंटरनेट से जुड़ी सभी सेवाएं बंद या प्रभावित हो सकती है और इसे लेकर विश्व के देश चिन्ता में हैं।
आज उर्जा, पानी, स्वास्थ्य, डिजिटल दुनिया आदि ऐसी सेवाएं हैं जिनके प्रभावित होने का असर लगभग सभी देशों पर पड़ता है। इसका प्रभाव किसी देश के नागरिकों पर भी प्रत्यक्ष रूप में पड़ता है। ऐसे में पूरी वैश्विक व्यवस्था को ही ठप्प करने वाले प्रयासों पर अंकुश लगाया जाना ज़रूरी हो जाता है। दो देशों के टकराव के चलते समूची दुनिया को किसी भी संकट में नहीं डाला जा सकता। दुनिया के देशों को इस दिशा में ठोस पहल करने की ज़रूरत है।
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