बदलता मौसम, पिघलते ग्लेशियर और जल संकट

फरवरी 2026 ने भारत के मौसम इतिहास में एक असामान्य संकेत दर्ज किया। औसतन लगभग 32-33 डिग्री सेल्सियस तापमान के साथ यह महीना पिछले 125 वर्षों में सबसे गर्म और शुष्क फरवरी के रूप में सामने आया। आमतौर पर फरवरी भारत में हल्की ठंड और बसंत की शुरुआत का महीना माना जाता है, लेकिन इस बार तापमान का यह असामान्य उछाल संकेत देता है कि जलवायु प्रणाली में गहरे स्तर पर बदलाव हो रहा है ।
मार्च की शुरुआत ने इन आशंकाओं को और अधिक स्पष्ट कर दिया। राजधानी दिल्ली में विशेष रूप से सफदरजंग वेधशाला में मार्च के पहले ही सप्ताह में तापमान 35.7 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो पिछले लगभग 15 वर्षों का उच्चतम स्तर है। यह केवल एक शहर की स्थिति नहीं थी, बल्कि देश के व्यापक भू-भाग में इसी तरह की प्रवृत्ति देखने को मिली। राजस्थान के बाड़मेर में पारा 40 डिग्री से ऊपर दर्ज किया गया जबकि जयपुर में यह 37.8 डिग्री तक पहुंच गया। मध्य प्रदेश के रतलाम में 39.2 डिग्री और भोपाल में 36.8 डिग्री तापमान रिकॉर्ड किया गया। वहीं गुजरात के अहमदाबाद, राजकोट, दीसा और कांडला जैसे शहरों में तापमान 41 डिग्री तक पहुंच गया, जो सामान्य से काफी अधिक है।
मार्च का मौसम केवल गर्मी तक सीमित नहीं रहा बल्कि इसमें उतार-चढ़ाव भी  देखने को मिले। प्रथम सप्ताह जहां अधिक गर्म और शुष्क रहाए वहीं 15 मार्च के बाद अचानक ठंडी हवाएं, बारिश और ओलावृष्टि हुई। इसका मुख्य कारण पश्चिमी विक्षोभ रहा, जो सामान्यत: दिसंबर-जनवरी में सक्रिय होता है, लेकिन इस बार मार्च के मध्य में प्रभावी हुआ। इस असामान्य और विरोधाभासी मौसम पैटर्न का प्रभाव केवल मैदानी क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके संकेत हिमालयी क्षेत्रों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई दिए। वहां बर्फबारी में कमी और तापमान में असामान्य वृद्धि दर्ज की गई, जो पारिस्थितिक संतुलन के लिए एक गंभीर चेतावनी है। इसके दूरगामी प्रभाव कृषि उत्पादन, जल संसाधनों और समग्र जनजीवन पर पड़ सकते हैं।
हाल ही में अर्थ साइंस रिव्यु में प्रकाशित एक शोध ने चेतावनी दी है कि यदि वर्तमान तापमान वृद्धि का सिलसिला जारी रहा तो इस सदी के अंत तक हिमालय की लगभग 68 प्रतिशत बर्फ  समाप्त हो सकती है। यह केवल हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र का संकट नहीं होगा, बल्कि दक्षिण और मध्य एशिया के करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा, कृषि और आजीविका पर सीधा प्रभाव डालेगा। शोध के अनुसार 1980 से 2020 के बीच हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र का तापमान प्रति दशक 0.2 से 0.3 डिग्री सेल्सियस की दर से बढ़ा है। यह दर वैश्विक औसत से लगभग दोगुनी है। पूर्वी हिमालय के कई हिस्सों में यह वृद्धि और भी तेज़ देखी गई है। बढ़ते तापमान के साथ-साथ वर्षा के पैटर्न में भी बदलाव आ रहा है। इससे ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं और बर्फ की परत लगातार कम हो रही है। अध्ययन के अनुसार वर्ष 2000 से 2016 के बीच ग्लेशियर हर साल औसतन 0.37 मीटर पानी के बराबर बर्फ  खो रहे हैं। इसका मतलब यह है कि ग्लेशियरों की मोटाई धीरे-धीरे घटती जा रही है।
मध्य और पूर्वी हिमालय में स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक है। यहां वर्ष 1990 से 2020 के बीच लगभग 30 वर्षों में बर्फ की परत 30 प्रतिशत तक घट गई है। हालांकि कराकोरम क्षेत्र अपेक्षाकृत अलग तस्वीर प्रस्तुत करता है। यहां कुछ स्थानों पर बर्फ  की मात्रा स्थिर या थोड़ी बढ़ती हुई भी देखी गई है। इसका संबंध पश्चिमी विक्षोभ से मिलने वाली सर्दियों की वर्षा से जोड़ा जाता है, जो इस क्षेत्र में बर्फ के संतुलन को बनाए रखने में भूमिका निभाती है। ग्लेशियरों के पिघलने का एक और गंभीर परिणाम है ग्लेशियर झीलों की संख्या और आकार में तेज़ी से वृद्धि। जैसे-जैसे बर्फ  पिघलती है, पहाड़ों में बड़ी झीलें बनने लगती हैं। इन झीलों के अचानक फटने से ये अत्यंत विनाशकारी बाढ़ का कारण बन सकती हैं। मध्य हिमालय में 1977 में लगभग 1160 ग्लेशियर झीलें दर्ज की गई थीं। 2010 तक इनकी संख्या बढ़कर 2168 हो गई। यह संकेत देता है कि हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र तेज़ी से अस्थिर हो रहा है।
आने वाले दशकों में ग्लेशियरों के तेज़ी से पिघलने के कारण कुछ समय तक नदियों में पानी की मात्रा अधिक दिखाई दे सकती है, लेकिन यह अस्थायी स्थिति होगी। जैसे-जैसे ग्लेशियर सिकुड़ते जाएंगे, नदियों में पानी की मात्रा धीरे-धीरे घटने लगेगी। इसका सबसे बड़ा प्रभाव उन क्षेत्रों पर पड़ेगा जो पहले से ही जल संकट का सामना कर रहे हैं। दक्षिण एशिया के कई हिस्सों में कृषि और पेयजल व्यवस्था पर इसका गंभीर असर पड़ सकता है।  भारत के लिए यह स्थिति केवल पर्यावरणीय संकट नहीं है। यह जल सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा उत्पादन और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़ा हुआ मुद्दा है। भारत की बड़ी आबादी अभी भी मानसून और हिमालयी नदियों पर निर्भर है। यदि हिमालय के ग्लेशियर तेज़ी से घटते हैं, तो आने वाले दशकों में जल संसाधनों का संतुलन बिगड़ सकता है। इसके साथ-साथ बढ़ती गर्मी, हीटवेव और बदलते वर्षा पैटर्न कृषि उत्पादन को भी प्रभावित कर सकते हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य आपूर्ति दोनों पर दबाव बढ़ेगा।
बदलते मौसम, बढ़ते तापमान और पिघलते हिमालय के संकेत हमें एक ही बात बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता बन चुका है। यदि आज प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले दशकों में हिमालय का संतुलन बदल सकता है और इसके परिणाम एशिया के करोड़ों लोगों के जीवन, अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी पर गहरा प्रभाव डाल सकते हैं। (अदिति फीचर्स)

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