प्रकृति और सौन्दर्य का सुरताल है नैनीताल

कुमाऊं क्षेत्र के छखाता परगने में स्थित नैनीताल भारत से सर्वाधिक लोकप्रिय हिल स्टेशनों में शामिल है। अचल में कभी साठ मनोरम ताल थे। वैसे आज भी नैनीताल ज़िले में सबसे अधिक ताल हैं, इसीलिए इसे झीलों का शहर कहा जाता है। सत्य तो यह है कि प्रकृति से सौंदर्य की सुरताल उत्तर भारत में कहीं सर्वाधिक देखने को मिलती है तो वह यही स्थान है।
तीनों ओर से घने-घने वृक्षों की छाया में ऊंचे पहाड़ों की तलहटी में नैनीताल झील की लम्बाई डेढ़ किमी तो चौड़ाई लगभग आधा किमी और गहराई लगभग 150 मीटर तक आंकी गयी है। नैनीताल झील के जल की विशेषता यह है कि इस ताल में सम्पूर्ण पर्वतमाला और वृक्षों की छाया स्पष्ट दिखाई देती है। दिन के आकाश में छाए हुए बादलों की छांव में यह तालाब बहुत सुन्दर प्रतीत होता है तो किसी पूर्णिमा की रात चांद-तारों से सजी रात ताल के पानी में तैरती बत्तखें, झिलमिलाती रंगीन बोट बहुत सुंदर दृश्य उत्पन्न करती है। इस ताल का पानी गर्मियों में हरा, बरसात में मटमैला और सर्दियों में हल्का नीला हो जाता है।
नैनी झील के उत्तरी किनारे पर नैना देवी मंदिर स्थित है। 1880 में भूस्खलन के दौरान यह मंदिर नष्ट हो गया था। बाद में इसे दुबारा बनाया गया। यहां सती के शक्ति रूप की पूजा की जाती है। मंदिर में दो नेत्र हैं जो नैना देवी को दर्शाते हैं। कहा जाता है कि जब शिव सती की मृत देह को लेकर कैलाश पर्वत जा रहे थे, तब जहां-जहां उनके शरीर के अंग गिरे, वहीं शक्तिपीठों की स्थापना हुई। नैनी झील के स्थान पर देवी सती के नेत्र गिरे थे। नयनों की अश्रुधार ने ताल का रुप ले लिया। तबसे यहां शिवपत्नी नन्दा (पार्वती) की पूजा नैनादेवी के रुप में होती है। माता नैना देवी के मेले के अवसर पर तो नैनीताल में बहुत भीड़ रहती है। 
यहां यह उल्लेखनीय है कि समस्त गढ़वाल-कुमाऊं अंचल में नंदा की ही पूजा-अर्चना की जाती है। प्रतिवर्ष नंदा अष्टमी के दिन नंदापार्वती की विशेष पूजा होती है। नंदा के मायके से ससुराल भेजने के लिए भी नन्दा जात का आयोजन होता है। एक अन्य श्रुति के अनुसार गढ़वाल और कुमाऊं के राजाओं की भी नंदा देवी इष्ट रही हैं। एक राजकुमारी नंदा को एक देवी के रुप में पूजा जाता है। वैसे मुझे इस कथा में कोई दम दिखाई नहीं देता। और हां, स्कंद पुराण में भी इसका उल्लेख ऋषि सरोवर के रूप में मिलता है। कहा जाता है कि जब अत्री, पुलस्त्य और पुलह ऋषि को नैनीताल में कहीं पानी नहीं मिला तो उन्होंने एक गड्ढा खोदा और मानसरोवर झील से पानी लाकर उसमें भरा। इस झील में डुबकी लगाने से मानसरोवर से पुण्य फल का विश्वास श्रद्धालुओं को है।
कुमाऊं अंचल में मुक्तेश्वर की घाटी अपने सौंदर्य के लिए विख्यात है। देश-विदेश के पर्यटक यहां गर्मियों में अधिक संख्या में आते हैं। भीमताल, नोकुचियाताल, सातताल, रामगढ़ आदि स्थानों को देखने के साथ-साथ मुक्तेश्वर के रमणीय अंचल को देखना नहीं भूलते। ठण्ड के मौसम में यहां बर्फीली हवाएं चलती हैं।  भीमताल इस अंचल का बड़ा ताल है। नैनीताल के दो कोने हैं जिन्हें तल्ली ताल और मल्ली ताल कहते हैं। निकट ही माल रोड है जिसे अब गोविंद बल्लभ पंत मार्ग कहा जाता है। हर हिल स्टेशन की तरह यहां भी माल रोड पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। यह रोड मल्लीताल और तल्लीताल को जोड़ती है। झील के दूसरी ओर ठंडी रोड है जहां पशान देवी मंदिर है। ठंडी रोड पर वाहनों का प्रवेश वर्जित है। एरियल रोपवे नैनीताल का एक और आकर्षण है। यह रोपवे मल्लीताल से स्नो व्यू पाइंट ले जाता है। चढ़ते अथवा उतरते रोपवे से शहर का खूबसूरत दृश्य दिखाई पड़ता है।
यहाँ की सात चोटियां नैनीताल की शोभा बढ़ाने में विशेष महत्व रखती हैं। सात चोटियों में नैना पीक या चाइना पीक 2611 मीटर की ऊंची है। नैनीताल से लगभग साढ़े पांच किलोमीटर स्थित इस चोटी से जहां एक ओर बर्फ से ढका हिमालय दिखाई देता है वहीं दूसरी ओर नैनीताल नगर का पूरा भव्य दृश्य दिखाई देता है। आश्चर्य है कि इस चोटी पर एक रेस्तरां भी है। दूसरी पर्वत चोटी किलवरी पिकनिक के लिए खूबसूरत स्थान है। यहां पर वन विभाग का एक विश्रामगृह भी है जिसमें बहुत से प्रकृति प्रेमी रात्रि-निवास करते हैं।
लड़ियाकांटा, देवपाटा, केमल्सबौग, डेरोथीसीट भी प्रमुख चोटियाँ है। डेरोथीसीट का असली नाम अयांरपाटा पहाड़ी है। अंग्रेज केलेट की पत्नी डेरोथी जिसकी विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी की कब्र यहां है। उस कब्र ‘डारोथीसीट’ के नाम से इस पर्वत का नाम पड़ गया। इसके अतिरिक्त स्नो-व्यू और हन-बनी नैनीताल से केवल ढाई किलोमीटर दूर हवाई पर्वत-चोटी है। शेर का डाण्डा पहाड़ पर यह चोटी स्थित है, जहां से हिमालय का दृश्य साफ-साफ दिखाई देता है। इसी तरह स्नोव्यू से लगी हुई दूसरी चोटी हनी-बनी है।
ज्योलिकोट की खूबसूरती पर्यटकों को अपनी तरफ आकर्षित करती है। यहां पर दिन के समय गर्मी और रात के समय ठंड पड़ती है। आसमान आमतौर पर साफ और रात तारों भरी होती है। योगीराज अरविंद और स्वामी विवेकानन्द भी यहां की यात्रा कर चुके हैं। यहां से कुछ ही दूरी पर कुमाऊं की झील, बिनसर, कौसानी, रानीखेत और कार्बेट नेशनल पार्क स्थित हैं। ज्योलिकोट में अनेक पहाड़ियां हैं जो एक-दूसरे से जुडी हुई हैं। इन पहाड़ियों में अनेक गुप्त रास्ते हैं। ब्रिटिश राज के समय इन रास्तों का प्रयोग संदेशों के आदान-प्रदान के लिए किया जाता है। यहां पर अनेक हिल रिजार्ट भी थे। किलबरी में बर्फ की सुन्दर चोटियों को देखा जा सकता है। पंगोट, नोकचौतल और बिनसर में खूबसूरत पक्षियों को देखा जा सकता है। (उर्वशी)

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