चालीस साल की चुप्पी
(क्रम जोड़ने के लिए पिछला रविवारीय अंक देखें)
उसने हंसकर सिर हिलाया था। उसे लगा था- भूख आदमी को मार सकती है,भाषा थोड़े ही। मगर क्या पता था, यह वायदा इतना आसान नहीं है। मां बोली छूटना, कभी-कभी मां के छूटने से भी ज्यादा त्रासद होती है। शुरू के दिनों में दिन भर वह शहर की भाषा सुनता रहता। कुछ सालों में उसने शहर की उतनी भाषा सीख ली,रोजमर्रा के काम के लिए जितनी ज़रूरी थी।
‘हां’, ‘नहीं’, ‘ठीक है’, ‘पैसे’, ‘कल’।
लेकिन इस सबके बीच अपनी भाषा भूलने लगा-क्योंकि अब अपनी भाषा में वह किसी से कभी भी कोई बात नहीं करता था। इसलिए शाम को जब वह कमरे में लौटता तो वह खुद से, अपनी भाषा में बात करने की कोशिश करता-
‘आज हाथ दुख रहा है।’
‘आज मालिक गुस्से में था।’
‘आज मांगने पर पानी पिलाने वाले ने उसे पानी नहीं दिया।’
ये बातें वह अपनी भाषा में खुद के लिए ही खुद दोहराता था।
क्योंकि उसी में दुख को सहने की ताकत थी, लेकिन भाषाओं का बहाव एकतरफा कभी जीवित नहीं रहता। धीरे-धीरे वह मां बोली में खुद से बात करना भी कम करने लगा। क्योंकि कमरे में साथ रहने वाले दूसरे मज़दूर हंसते और उसकी आवाज़ की नकल उतारते थे। कभी-कभी जानबूझकर उसी की तरह भाव-भंगिमाएं बनाकर और गलत शब्द बोलकर ठहाके लगाते। इससे उसे बुरा लगता था। क्योंकि वह अपनी भाषा का मज़ाक बनाया जाना भी नहीं सह पाता था।
ऐसे में धीरे-धीरे उसने अपनी मां बोली कोकम बोलना शुरू कर दिया। जैसे कोई आदमी दर्द की दवा धीरे-धीरे छोड़ देता है- यह सोचकर कि शायद अब ज़रूरत नहीं या फिर इसलिए कि वह उनसे लड़ नहीं पाता था। किसी से चढ़कर लड़ने के लिए भी तो आखिर अपनी भाषा ही चाहिए होती है, विशेषकर अपनी मां बोली।
साल बीतते गए। गांव से खत आना बंद हो गया। किसे पता था, कौन ज़िंदा है, कौन नहीं? मां की आवाज़ अब सिर्फ सपनों में आती थी। और सपनों में भी वह डरने लगा-कहीं वह शब्द भूल न जाए जिसमें मां उसे पुकारती थी। एक दिन उसने महसूस किया कि वह सचमुच कुछ शब्द भूल चुका है। उसने डर के मारे उन्हें दोहराने की कोशिश की। लेकिन जीभ लड़खड़ा गई। वह घबरा गया। जिस भाषा में उसने चलना सीखा था, जिसमें उसने पहला डर, पहली हंसी, पहला प्रेम जाना था- वही भाषा अब उससे दूर हो रही थी। यहीं से उसका पतन शुरू हुआ। रात को नींद नहीं आती थी। आंखें बंद करता... तो शब्द तैरने लगते- अधूरे, टूटे हुए। वह उठकर बुदबुदाने लगता। पहले कमरे में, फिर गलियों में। लोगों ने उसे पागल कहना शुरू कर दिया।
वह पागल नहीं था, मगर भाषाहीन होता जा रहा था। भाषा जब भीतर दम घोंटने लगे, तो आदमी बाहर से अजीब दिखने लगता है। दशकों से शहर में रहने के कारण वह तो शहर के लोगों की जुबान समझता था- इसलिए उसे लोगों के तंज, मज़ाक, गालियां आदि सब समझ में आते थे और वह परेशान किये जाने पर लोगों को गुस्से से जवाब भी देता था, लेकिन ये जवाब वह अपनी ही भाषा में देता था। यही सबसे बड़ा विरोधाभास था।
लोग समझते, ‘इसे कुछ समझ नहीं आता।’
जबकि वह अपनी भाषा में उनसे कहता, ‘मुझे सब समझ आ रहा है, पर तुम मुझे सुन नहीं सकते।’
लोग कहते, ‘पागल कहीं का।’
वह बुदबुदाता-
‘अगर मैं पागल हूं, तो तुम कौन हो’
धीरे-धीरे उसकी बड़बड़ाहट तेज़ होती गयी। अब वह खुद से नहीं, किसी अदृश्य दुनिया से बातें करने लगा था। कभी मां से, कभी गांव के पेड़ों से, कभी उस बच्चे से जो वह कभी था। और अंत में फिर वह दिन भी आया। जब कुछ लड़के उस पर पत्थर फेंककर हंस रहे थे। इस पर वह अपनी भाषा में कुछ कह रहा था- शायद डर, शायद गुस्सा। तभी भीड़ में एक आदमी ठिठका। उसने ध्यान से सुना। फिर उसने उसी भाषा में एक वाक्य कहा। और वह पागल जैसे बिजली से झटका खा गया हो। उसने सिर उठाया। आंखें फैल गईं। पूरे चालीस साल बाद किसी ने उसकी मां की भाषा में उससे बात की थी। वह उठ खड़ा हुआ, लड़खड़ाया और उस आदमी से लिपट गया। रोते हुए, हंसते हुए, कांपते हुए। लेकिन भीड़ ने यही देखा-दो पागल लेकिन उस पल उस आदमी को लग रहा था, मानो जो कुछ खो गया था, सब कुछ वापस मिल गया हो। उसकी मां, उसका गांव, उसका अस्तित्व। उसके बाद क्या हुआ। यह कोई नहीं जानता। शायद वह आदमी कुछ समय और जिया। शायद जल्दी चला गया, लेकिन उस गली में आज भी लोग कहते हैं-
‘यहां एक आदमी रहता था
जो अजीब भाषा में बोलता था।’
शायद वे अब भी नहीं जानते
कि वह भाषा उसकी ज़िंदगी थी।
उसकी अपनी मां बोली जिसके न सुन पाने की वजह से वह चालीस साल चुप रहा। क्योंकि मातृभाषा सिर्फ संवाद का जरिया नहीं होती। वह हमारा मन, हमारी स्मृति, हमारी मानसिक सेहत और हमारे जीने की वजह होती है और जब कोई अपनी मां बोली खो देता है-
तो वह धीरे-धीरे खुद को खो देता है। (समाप्त)
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर

