युद्ध में मर्चेंट जहाज़ों पर हमला नहीं होना चाहिए
यह संभवत: बहुत बड़ी राहत है कि ईरान ने भारत को स्ट्रेट आफ होर्मुज से निकलने की अनुमति दी है, जिससे न सिर्फ रुके हुए भारतीय झंडे वाले 20 कार्गो जहाज़ उसे पार कर लेंगे बल्कि यह उम्मीद भी बंधी है कि अन्य 18 एलपीजी टैंकर जंग-प्रभावित 52 कि.मी. स्ट्रेट से कार्गो लोड करने के लिए जा सकेंगे। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने भारत को ‘दोस्त राष्ट्रों’ की सूची में शामिल करते हुए, दोस्तों को स्ट्रेट का प्रयोग करने की इजाज़त दी है। हालांकि यह सभी 20 कार्गो जहाज़ भारत नहीं आयेंगे, क्योंकि कुछ को अन्य बंदरगाहों पर जाना है, लेकिन जितने भी आयेंगे, उनसे भारत में एलपीजी, एलएनजी व क्रूड की उपलब्धता में सुधार आयेगा। अगर 18 एलपीजी टैंकर भी भर कर आ जाते हैं, जिसकी संभावना प्रबल है, तो कुकिंग गैस की एक सप्ताह की पूर्ति हो जायेगी, क्योंकि उनमें लगभग 8 लाख टन गैस आती है।
यह सही है कि तनाव के दौरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जहाज़ों को निकालना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है, लेकिन इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि अमरीका, यूक्रेन, ईरान आदि ने मर्चेंट जहाज़ों को निशाना बना रहे हैं, जोकि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक है। अमरीका व अन्य शक्तिशाली देशों की वजह से नियम-आधारित विश्व व्यवस्था का तो कोई अर्थ रह नहीं गया है, जिसकी लाठी उसकी भैंस का असभ्य दौर लौट आया है। जैसा कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति को अगवा करना, क्यूबा की घेराबंदी करना, ईरान पर बेमतलब युद्ध थोपना, यूक्रेन पर युद्ध लादना, ताइवान पर कब्ज़ा करने की धमकी, आदि से स्पष्ट है। साथ ही वीटो के अधिकार ने संयुक्त राष्ट्र को अप्रभावी बना दिया है, जिसके पास दांत न खाने के लिए हैं और न दिखाने के लिए। आज संयुक्त राष्ट्र में ऐसे लोगों का जमावड़ा होता है, जो अकेले कुछ नहीं कर सकते और मिलकर तय करते हैं कि कुछ नहीं किया जा सकता। गाज़ा का नरसंहार सबके सामने है। संयुक्त राष्ट्र तो पीड़ितों को खाने-पीने की रसद भी न पहुंचा सका। इसके बावजूद मानवीय दृष्टि से ऐसी विश्व व्यवस्था की उम्मीद तो की ही जा सकती है, जिसमें युद्ध के पागलपन के दौरान भी मर्चेंट जहाज़ों को बख्श दिया जाये ताकि जिनका जंग से कुछ लेना देना नहीं, उनकी अर्थव्यवस्था सुरक्षित रहे और उनके लोग चैन की सांस ले सकें।
गौरतलब है कि ईरान पर अमरीका व इज़रायल द्वारा थोपी गई अवैध जंग के पहले दो सप्ताह के दौरान 16 कार्गो जहाज़ों को निशाना बनाया गया, जिनमें तेल टैंकर भी शामिल थे। इससे डरकर सैंकड़ों जहाज़ों ने खाड़ी में लंगर डाल दिये क्योंकि वह वेसल्स, कार्गो व जीवन को खतरे में नहीं डालना चाहते थे। वह जहाज़ वहीं अटके हुए हैं। इस बीच तेल, गैस, खाद, एल्यूमिनियम, सल्फर, हीलियम और ऐसी ही अन्य चीज़ों की दुनियाभर में कमी पड़ गई है। जानकारी के अनुमान के अनुसार उत्तर में यूक्रेन ने रूस के 40 प्रतिशत तेल निर्यात उपकरण को निष्क्रिय कर दिया है। बंदरगाहों व पाइपलाइनों पर यूक्रेन ने जो हमले किये हैं, उससे रूस के तेल फ्लो में 2 मिलियन बैरल प्रति दिन की कमी आयी है, भारत के दैनिक उपभोग के एक-तिहाई से अधिक। यूरोप ने जो रूस के ‘शैडो फ्लीट’ टैंकरों को ज़ब्त किया है, उससे भी फ्लो में कमी आयी है। उधर अमरीका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति को अगवा करने से पहले जो भी तेल टैंकर कराकास से निकलता था, उसे अपनी मिसाइलों का निशाना बनाया। अब अमरीका क्यूबा की घेरेबंदी किये हुए है और किसी भी कार्गो जहाज़ को आने जाने नहीं दे रहा है, जिससे क्यूबा में अंधेरा है और आवश्यक वस्तुओं की भारी कमी हो रही है। इन सभी हरकतों को बहस की क्षमता से तार्किक ठहराया जा सकता है, लेकिन दुनिया पर जो इनका प्रभाव पड़ रहा है, उसे उचित ठहराना कठिन है, बल्कि वह उचित है ही नहीं।
यह बात तो सबकी समझ में आनी ही चाहिए कि अगर मर्चेंट जहाज़ सैन्य ऑपरेशन में शामिल नहीं हैं तो उन पर हमला नहीं किया जाना चाहिए। ऐसा इसलिए कि पानी के जहाज़ ही तो आधुनिक संसार को जीवित रखे हुए हैं। वैश्विक जीडीपी का लगभग 60 प्रतिशत व्यापार से बनता है, जहाज़ गुड्स व्यापार का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा संभालते हैं। कुछ ही जहाज़ों पर हमला करने का अर्थ होता है कि जल के सारे मार्गों पर ताले पड़ जाते हैं। इस समय हम यह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में देख रहे हैं, लेकिन ज़्यादा पुरानी बात नहीं है जब हमने यह लाल सागर में देखा था। हूती ने टैंकर मरलिन लुआंडा पर हमला किया था और कार कैरियर गैलेक्सी लीजेंड पर कब्ज़ा कर लिया था, जिसकी वजह से शिपिंग कम्पनियों को अपने मार्ग बदलने पड़े। दो साल गुज़र गये हैं, लेकिन लाल सागर में यातायात सामान्य नहीं हुआ है। इस बीच लम्बे मार्ग के कारण भाड़ा खर्च बहुत बढ़ गया है, फलस्वरूप महंगाई। अमरीका व इज़रायल ने सोचा था कि वह बम बरसाकर हूती के जल मार्ग को नियंत्रित करने की क्षमता पर विराम लगा देंगे। लेकिन हुआ कुछ नहीं और अमरीका को हूती से समझौता करना पड़ा। यही गलती अमरीका व इज़रायल खाड़ी में दोहरा रहे हैं और नतीजा यह निकल रहा है कि ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से जहाज़ों को सुरक्षित निकलने देने के लिए फीस लेने लगा है, जबकि उस पर युद्ध थोपे जाने से पहले वह ऐसा नहीं करता था।
दरअसल, युद्ध के दौरान मर्चेंट जहाज़ों को निशाना बनाने के जो खराब परिणाम निकलते हैं वह दुनिया भूल गई है, कम से कम प्रतीत तो ऐसा ही होता है। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन ने 2,426 मर्चेंट जहाज़ गंवाये थे, अमरीका ने 1,768। जापान, जिसने युद्ध से पहले यात्री व कार्गो शिप्स की तीसरी सबसे बड़ी फ्लीट निर्मित की थी, ने 2,346 मर्चेंट जहाज़ खोये। युद्ध के अंत होने पर उसके पास एक भी जहाज़ ऐसा नहीं बचा था, जिसकी क्षमता 1,000 टन से अधिक की हो। उस समय सिर्फ सेना के पास ही बड़े जहाज़ों को डूबोने की ताकत थी। आज तो यह काम बहुत आसान हो गया है। इसलिए समुद्री व्यापार की सुरक्षा के लिए नई वैश्विक सहमति का गठन करना आवश्यक है। जब आवश्यक चीज़ों की कमी पड़ जाती है, तो विकासशील देशों को उसका व महंगाई का सबसे अधिक खमियाज़ा भुगतना पड़ता है, इसलिए उन्हें ही मर्चेंट व कमर्शियल जहाज़ों की आज़ादी के संदर्भ में पहल करनी चाहिए। ज़रूरत गुटनिरपेक्ष आंदोलन को बहाल करने की है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



