शांति और करुणा का संदेश है महावीर जयंती

 31 मार्च महावीर जयंती पर विशेष

जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर के जन्मोत्सव को हम लोग महावीर जयंती के रूप में मनाते हैं। भारत जैसे बहुधर्मी और बहुआस्था वाले देश में यह सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक तिथियाें में से एक है। जैन समुदाय के लिए तो महावीर जयंती बहुत पवित्र और महत्वपूर्ण त्योहार है ही, अन्य मतावलंबियों के लिए यह शांति और करुणा का शाश्वत संदेश है। कहने का मतलब महावीर जयंती किसी जन्मदिन का उत्सव नहीं बल्कि आध्यात्मिक जागरण और आत्मशुद्धि का पर्व है। भगवान महावीर का सबसे बड़ा संदेश था- ‘अहिंसा परमो धर्म:’। उन्होंने न केवल मनुष्य बल्कि सभी जीवाें के प्रति दया और करुणा की शिक्षा दी। आज के हिंसा और तनाव से भरे समय में यह संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। क्योंकि भगवान महावीर ने सिखाया था, सत्य जीवन का आधार होना चाहिए और मनुष्य को अपनी आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह नहीं करना चाहिए। यह विचार आज के उपभोक्तावादी समाज में संतुलन बनाने का रास्ता दिखाता है। 
भगवान महावीर ने कठोर तप और संयम के माध्यम से यह बताया था कि मन और इंद्रियों पर नियंत्रण ही सच्ची मुक्ति का मार्ग है। भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश में महावीर जयंती का महत्व केवल जैन समुदाय तक सीमित नहीं है बल्कि यह समाज के हर वर्ग और तबके के लिए विशेष है। उनकी सहिष्णुता और सहअस्तित्व की अवधारणा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत में विभिन्न धर्मों के लोग एक साथ रहते हैं और अहिंसा, सहिष्णुता और शांति के उनके संदेश सभी लोगों को प्रभावित करते हैं। महावीर जयंती के दिन आमतौर पर सार्वजनिक उत्सव के रूप में रथ यात्रा निकलती है। मंदिरों में विशेष पूजा होती है। गरीबों को भोजन और वस्त्र दान दिए जाते हैं तथा समाज में सेवा और सहयोग की भावना को मजबूत करने की कोशिश की जाती है। जैसा कि हम जानते हैं कि भगवान महावीर का दर्शन केवल मानव समुदाय तक सीमित नहीं था। उन्होंने हर जीव और प्रकृति के प्रति करुणा रखने को कहा। इसलिए आज जब पर्यावरण का संकट मानव अस्तित्व का संकट बन गया है, तब हमें महावीर जयंती प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीने की प्रेरणा देती है।
भारतीय संस्कृति में नैतिक मूल्याें की पुनर्स्मृति की याद महावीर जयंती हमें बार-बार दिलाती है। इस दिन की विशेष प्रेरणा और सीख के रूप में हम सादगी, संयम और नैतिकता का पाठ दोहराते हैं, यह जानते हुए कि ये बातें केवल धार्मिक नहीं बल्कि जीवनमूल्य और जीवन जीने की कला हैं। जहां तक महावीर जयंती कैसे मनायी जाती है, का सवाल है, तो इस दिन जैन समाज कई तरह की धार्मिक और सामाजिक गतिविधियाें में हिस्सेदारी करता है। इस दिन जैन मंदिरों में खास तौरपर अभिषेक और पूजन कार्यक्रम सम्पन्न होते हैं। भगवान महावीर की मूर्तियों का विशेष जलाभिषेक होता है। प्रवचन और ध्यान की सामूहिक गतिविधियां सम्पन्न होती हैं। दान-पुण्य किया जाता है, खासकर अन्न, वस्त्र और दवाईयों का दान दिया जाता है तथा रथ यात्रा और शोभा यात्राएं निकलती हैं। 
इन गतिविधियों का उद्देश्य केवल उत्सव मनाना नहीं बल्कि भगवान महावीर के सिद्धांतों को खुद अपने जीवन में अपनाते हुए, दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करना होता है। आज के रोजमर्रा की जिंदगी में भगवान महावीर की जयंती पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक हो गई है। क्योंकि आज की दुनिया पहले से कहीं ज्यादा हिंसा, तनाव, पर्यावरण संकट और उपभोक्तावाद से दोचार है। इस सबके बीच भगवान महावीर के विचार हमें संतुलित और शांतिपूर्ण जीवन जीने का समाधान सुझाते हैं। इसलिए भगवान महावीर की जयंती जितनी आध्यात्मिक है, उससे कहीं नैतिक आत्म प्रतिज्ञा का पर्व है।
महावीर जयंती का वैश्विक संदेश
भगवान महावीर का जन्म 599 ईसा पूर्व बिहार के वैशाली क्षेत्र के कुंडाग्राम गांव में हुआ था। उन्होंने राजसी जीवन का त्याग करके कठोर तपस्या और ध्यान माध्यम से ज्ञान प्राप्त किया था। उनके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण शिक्षाओं में यह है कि सच्ची शांति, बाहरी सुकून में नहीं बल्कि भीतर की साधना में है। इसलिए उन्होंने जीवन को महत्वपूर्ण बनाने के लिए पांच प्रमुख व्रत बताये थे। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह यानी भगवान महावीर की सीखों में ज़रूरत से ज्यादा संग्रह करना, तनाव को बढ़ाना है। इंसान के साथ प्रकृति को भी उतना महत्वपूर्ण समझना है। कटु शब्दों को भी हिंसा के रूप में लेना है और इच्छाओं पर नियंत्रण की सच्ची स्वतंत्रता हासिल करनी है। इसके साथ ही दूसरों की मदद को सबसे बड़ा पुण्य समझना है।                  -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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