नकली दवाओं का बढ़ता कारोबार
देश में नकली दवाओं के निर्माण और कारोबार ने एकबारगी न केवल समाज के प्राय: सभी वर्गों के लोगों में बड़ी चिन्ता पैदा की है, अपितु विदेशों में देश की छवि को भी बड़ा आघात पहुंचाया है। इस संबंध में दो बड़ी खबरें सामने आई हैं जिन्होंने सनसनी जैसा वातावरण पैदा किया है। पहली खबर बिहार से है जहां राजधानी पटना में प्रशासन की नाक तले नकली दवाओं और नशीले पदार्थों का निर्माण और इनका अन्य प्रदेशों में व्यापार बड़े स्तर पर किया जा रहा था। इस अभियान के दौरान पुलिस दल द्वारा 9 लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है। इस मामले का एक गम्भीर और आपराधिक पक्ष यह भी है कि विगत कुछ ही दिनों में इस अपराध के अन्तर्गत यह तीसरी कार्रवाई है। इससे पूर्व इसी घटना से सम्बद्ध दो अन्य छापों के दौरान भी बड़े स्तर पर नकली औषधियों का किया गया भण्डारण बरामद किया गया था। इन दोनों पूर्व छापों के दौरान भी कुछ लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इन तीनों फैक्टरियों को सीलबंद करके इनके भीतर बड़े स्तर पर निर्मित सामान को प्रमाण के तौर पर सुरक्षित कर लिया गया है।
अधिकारियों के अनुसार इन फैक्टरियों के संचालन हेतु कोई लाईसैंस भी नहीं लिया गया था, किन्तु इनके भीतर अवैध और नशीला सामान भी बनाया जा रहा था। फैक्टरियों के भीतर से बड़ी मात्रा में नकली क़फ-सिरप भी बरामद किया गया। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष देश के कुछ भागों में नकली सिरप से बड़ी संख्या में बच्चों के मरने की ़खबरें भी सुर्खियों में आई थीं।
इस संदर्भ में दूसरी खबर पंजाब समेत देश के कुछ अन्य राज्यों में निर्मित लगभग 215 औषधियों के नमूने फेल हो जाने से संबंधित है। जिन अन्य राज्यों में निर्मित दवाओं के नमूने फेल घोषित किए गये हैं, उनमें से हिमाचल में बनी सर्वाधिक 71 बड़ी और आवश्यक औषधियां शामिल हैं जिनमें से अनेक मानव जीवनोपयोगी दवाइयां भी शुमार बताई जाती हैं। इसके बाद उत्तराखंड की 28 दवाओं के नमूने कसौटी पर नितांत खरे नहीं उतर सके। गुजरात की 23, मध्य प्रदेश की 15, महाराष्ट्र की 13, तमिलनाडु की 11, राजस्थान की दस, हरियाणा की नौ, तेलंगाना की छह तथा पंजाब, उत्तर प्रदेश और पुडुचेरी प्रत्येक प्रदेश की पांच-पांच दवाओं के नमूने परीक्षण कसौटी पर विफल रहे हैं। सिक्किम, बिहार, बंगाल, उड़ीसा, कर्नाटक, केरल और दिल्ली प्रदेश में निर्मित दवाओं के एक से तीन-तीन नमूने कसौटी पर खरे नहीं उतर सके हैं। अभी एक ही दिन पूर्व हिमाचल की दवा फैक्टरियों में निर्मित 174 अन्य दवाएं भी मानकों पर खरा नहीं उतरी थीं। इनमें सात ऐसी भी थीं, जो कसौटी पर नकली पाई गईं। इसका अभिप्राय यह भी सामने आता है कि इस समय पूरे देश में निर्मित हो रही, और वर्तमान में बाज़ारों में उपलब्ध दवाएं नकली अथवा कसौटी पर पूरा न उतरने वाली हैं। नि:संदेह इन दवाओं में अधिकतर ऐसी हैं जो मनुष्य के प्राण बचाने के लिए उपयुक्त होनी चाहिएं, किन्तु नकली और अनुपयुक्त होने के कारण ये दवाएं रोगी के प्राण बचाने की बजाय उसके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकर सिद्ध हो सकती हैं। बिहार में जिन तीन स्थानों पर अवैध दवा-फैक्टरियां बरामद की गई हैं, उनमें बड़े स्तर पर नशीली औषधियां और अन्य नशीले पदार्थ भी बरामद किये गये हैं। बहुत ज़रूरी है कि ये अवैध मादक दवायें देश में नशे और नशीले पदार्थों के प्रसार एवं प्रचार में सहायक सिद्ध होती होंगी। देश की सरकारें नशे के खात्मे के विरुद्ध अपने अभियानों में प्रत्येक वर्ष करोड़ों रुपये खर्च कर रही हैं, किन्तु देश भर में ऐसी फैक्टरियां उनके इस अभियान को आघात पहुंचाने का काम कर रही हैं।
हम समझते हैं कि इस मामले में देश की सरकारों खासकर केन्द्र सरकार को सक्रियता एवं सतर्कता बढ़ाने की बड़ी आवश्यकता है। सरकार को न केवल दवा-फैक्टरियों की स्थापना और इनमें निर्मित माल की गुणवत्ता प्राथमिक स्तर पर जांचने के प्रक्रिया-नियमों को कठोर बनाना होगा, अपितु इस हेतु स्थापित मशीनरी को भी निरन्तर एवं सतत् सक्रिय रखना होगा। इस हेतु एक संस्थागत और समर्थ निगरानी मशीनरी का गठन करना भी ज़रूरी होगा। निरीक्षण और दंडित करने की व्यवस्था भी बदलना होगी। हम समझते हैं कि जन-साधारण के जीवन से खिलवाड़ करने वाले ऐसे तत्वों के विरुद्ध नि:संदेह कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए। केन्द्र और सम्बद्ध राज्यों की सरकारों को इस संबंध में जहां पुराने कानूनों और नियमों को सख्ती के साथ लागू करना होगा, वहीं आवश्यकता पड़े तो नये नियम-कानून बनाने से भी कदापि संकोच नहीं करना चाहिए, किन्तु मनुष्य मात्र के जीवन का क्षरण करने वाली ऐसी औषधियों का निर्माण करने वाले तत्वों को कानून के शिकंजे में अवश्य लाना होगा।



