तमिलनाडु में एमजीआर के नाम पर लगी है चुनाव जीतने की होड़

इस बात का कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि अन्ना-द्रमुक के आइकॉन एमजी रामचंद्रन का नाम लेने से राजनीतिक पार्टियों को वोट हासिल होते हैं। इसके बावजूद एमजीआर के निधन के 40 वर्ष बाद भी तमिलनाडु के राजनीतिक दलों को लगता है कि उनका नाम लेने से उन्हें चुनावी सफलता हासिल हो जायेगी। इसलिए एमजीआर की विरासत पर लगभग हर पार्टी अपना दावा इस बार के विधानसभा चुनाव में भी कर रही है, जिसकी 234 सीटों के लिए मतदान 23 अप्रैल 2026 को होगा और नतीजों की घोषणा 4 मई 2026 को होगी। मुख्य मुकाबला द्रमुक के नेतृत्व वाले गठबंधन, जिसमें कांग्रेस भी शामिल है और अन्ना-द्रमुक के नेतृत्व वाले गठबंधन में है, जिसका हिस्सा भाजपा भी है। फिलहाल द्रमुक गठबंधन सत्ता में है, लेकिन इस बार दोनों गठबंधनों में काफी फेरबदल हुआ है। 
चूंकि एमजीआर का ताल्लुक फिल्मों से भी था, इसलिए यह आश्चर्य नहीं है कि तमिल सिनेमा की एक अन्य बड़ी व प्रभावी हस्ती विजय, जो टीवीके के अध्यक्ष हैं, अपनी तुलना एमजीआर से करते हैं और हर चुनावी सभा में अपने भाषण के दौरान एमजीआर का नाम लेते हैं। विजय का तो यहां तक कहना है कि जिस किस्म की आलोचना 1972 में एमजीआर की अन्ना-द्रमुक गठित करने पर हुई थी, वैसी ही आलोचना का उन्हें भी सामना करना पड़ रहा है। गौरतलब है कि ऐसा करने/कहने वाले विजय पहले एक्टर-सियासतदां नहीं हैं। उनसे पहले भाग्यराज ने 1989 में हल्की सी कोशिश की थी; वह असफल रहे। फिल्मों में अपनी भूमिकाओं व व्यक्तिगत दान की वजह से विजयकांत को इतनी कामयाबी अवश्य मिली थी कि लोग उन्हें ‘करुप्पु एमजीआर’ कहने लगे। कमल हासन ने एमजीआर को अपना ‘वाथीयार’ बताया, यह दावा करते हुए कि उनकी ‘परवरिश एमजीआर की गोद में हुई’ और उन्होंने अपनी फरवरी 2018 की चुनावी यात्रा का नाम एमजीआर की फिल्म ‘नालाई नमाठे’ के नाम पर रखा। 
अन्ना-द्रमुक ने अपने संस्थापक एमजीआर की विरासत को 1988 के बाद से बराबर बरकरार रखने का प्रयास किया है। टूट-फूट व चुनावी पराजयों से कमज़ोर होने के बावजूद उसके नेता एमजीआर के नाम को अपने गले से लगाये हुए हैं। तमिलनाडु में चुनावों को मद्देनज़र रखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी एमजीआर का नाम जप रहे हैं। फरवरी में अपनी मलेशिया यात्रा के दौरान उन्होंने एक्स पर पोस्ट किया था, ‘मेरे दोस्त, मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने जो लंच का आयोजन किया था, उसमें एक गीत महान एमजीआर की फिल्म ‘नालाई नमाठे’ से भी था। अनवर इब्राहिम एमजीआर के वैसे ही बहुत बड़े फैन हैं जैसे कि हममें से अधिकतर भारतीय हैं।’ भाजपा भी एमजीआर की विरासत में गोते लगा रही है। एल. मुरुगन की वेल यात्रा 2020 के दौरान उसने एमजीआर की फिल्मों के गीत बजाये व उनके डायलॉग प्ले किये और उनकी तुलना मोदी से की। इरादा स्पष्ट था और उम्मीद थी कि अपील काम करेगी, लेकिन हुआ कुछ नहीं। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन अक्सर एमजीआर से अपने संबंधों के बारे में ज़िक्र करते हैं। 
वोट की राजनीति इन्सान से क्या कुछ करने को मज़बूर कर देती है। स्टालिन के पिता एम. करुणानिधि स्वयं तमिल आइकॉन हैं। वह न सिर्फ सफल राजनीतिज्ञ थे बल्कि बहुत कामयाब डायलॉग व पटकथा लेखक थे, तमिल फिल्मों के। द्रमुक उन्हीं के नाम से चलने वाली पार्टी है। यह सही है कि तमिलनाडु में एमजीआर के नाम के बिना कोई राजनीति नहीं करता है। एमजीआर के निधन के बाद उनके अधिकतर फैन उनके पुजारी बन गये। यह परम्परा जारी है; क्योंकि वह एमजीआर को अपना ‘कुला थेइवम’ (पारिवारिक देवता) समझते हैं, जिनकी विरासत हमेशा के लिए चमकती रहेगी। इस धारणा के बावजूद एमजीआर का नाम स्वत: ही वोट लाने वाला या दीर्घकालीन समर्थन में नहीं बदल जाता है। अगर ऐसा होता तो अन्ना-द्रमुक कभी भी चुनाव न हारती और न ही उसे किसी अन्य पार्टी से गठबंधन करना पड़ता। विस्तृत स्तर पर सभी राजनीतिक एक्टर खुद को द्रमुक के प्रमुख विकल्प के तौर पर पेश करने का प्रयास करते हैं। इसी भूमिका को एमजीआर ने मूलत: निभाने का प्रयास किया था, अन्ना-द्रमुक के ज़रिये। 
तमिलनाडु की राजनीति में ताज़ा ताज़ा प्रवेश करने वाले विजय अपनी सभाओं में एमजीआर के कटआउट्स लगवाते हैं, यह सुनिश्चित करने के लिए कि जो भी उन्हें अवसर मिले, उसमें वह एमजीआर के समानांतर खड़े दिखायी दें। वह यह भी याद दिलाते हैं कि एमजीआर को उस समय तक राजनीतिक नौसिखिया समझा जाता रहा, जब तक कि 1977 में उन्होंने करुणानिधि के नेतृत्व वाली द्रमुक को पराजित नहीं कर दिया, लेकिन विजय में एमजीआर जैसे गुण नहीं हैं। उनकी फिल्मों में सामाजिक संदेश या राजनीतिक दृष्टिकोण नहीं है, जैसा कि एमजीआर की फिल्मों में था। दोनों में एकमात्र समानता यह है कि अपने फिल्मी करियर के चरम पर उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया। समानता यहीं पर समाप्त हो जाती है। एमजीआर सभी जातियों, धर्मों व वर्गों से सफलतापूर्वक संपर्क स्थापित कर सके, जिससे उनकी मज़बूत बेस बनी। विजय अब तक यह काम नहीं कर सके हैं। एमजीआर ने अपनी इमेज बनाने के लिए दो दशक से भी अधिक तक मेहनत की थी और इसलिए 1977 में मुख्यमंत्री की शपथ लेने से पहले ही उनकी गुडविल बन चुकी थी। वैसे यह स्वाभाविक ही है कि जो एक्टर राजनीति में प्रवेश करेगा, उसकी कम से कम तमिलनाडु में तो एमजीआर से तुलना होगी ही। लेकिन एमजीआर ने अपनी मेहनत की कमाई से लोगों की मदद की और जब वह मुख्यमंत्री बन गये, तो उन्होंने कल्याणकारी योजनाएं लागू कीं। यह गुण दूसरों में दिखायी नहीं देता। यही वजह है कि जिन लोगों ने एमजीआर बनने की कोशिश की या उनके नाम पर पार्टी बनायी, वे सफल नहीं हो सके। 
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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