वैज्ञानिक सोच से बदलेगी सेहत की तस्वीर

आज विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विशेष

विश्व समुदाय को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने और वैश्विक स्वास्थ्य मानकों को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य के साथ प्रतिवर्ष 7 अप्रैल को ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ मनाया जाता है। यह दिवस मानव सभ्यता के उस मूल दर्शन का प्रतीक है, जिसमें स्वास्थ्य को जीवन की सर्वोच्च प्राथमिकता माना गया है। स्वास्थ्य का अर्थ केवल रोगों की अनुपस्थिति नहीं बल्कि शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से पूर्णत: स्वस्थ जीवन जीने की वह स्थिति है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमताओं का सर्वोत्तम उपयोग कर सके। यही कारण है कि स्वास्थ्य को आज एक मौलिक मानवाधिकार के रूप में स्वीकार किया जा चुका है। इस वर्ष ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ का विषय ‘स्वास्थ्य के लिए एकजुट। 
विज्ञान के साथ खड़े रहें’ निर्धारित किया गया है, जो न केवल वैश्विक एकजुटता का आह्वान करता है बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि आने वाले समय में स्वास्थ्य सुरक्षा का सबसे सशक्त आधार विज्ञान और साक्ष्य-आधारित नीतियां ही होंगी। यह विषय ऐसे समय में निर्धारित किया गया है, जब दुनिया भ्रामक सूचनाओं, छद्म विज्ञान और अविश्वास के संकट से जूझ रही है। ऐसे में वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित नीतियों, अनुसंधान और वैश्विक सहयोग को सुदृढ़ करना न केवल आवश्यक है बल्कि अनिवार्य भी हो गया है।
इतिहास के परिप्रेक्ष्य में देखें तो 7 अप्रैल 1948 को विश्व स्वास्थ्य संगठन का संविधान अपनाया गया था और 1950 से इसी दिवस को औपचारिक रूप से मनाया जाने लगा। हालांकि साढ़े सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बावजूद आज भी स्वास्थ्य सेवाओं की समान व सार्वभौमिक उपलब्धता एक अधूरा लक्ष्य बनी हुई है। वैश्विक स्तर पर स्थिति यह है कि दुनिया के लगभग 140 देश अपने संविधान में स्वास्थ्य को अधिकार के रूप में मान्यता देते हैं लेकिन व्यावहारिक स्तर पर इसे सुनिश्चित करने वाले ठोस कानूनों और प्रभावी क्रियान्वयन की कमी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। आज का वैश्विक परिदृश्य तो विरोधाभासों से भरा हुआ है। एक ओर चिकित्सा विज्ञान ने जीनोमिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, टेलीमेडिसिन और रोबोटिक सर्जरी जैसी तकनीकों के माध्यम से अभूतपूर्व प्रगति की है, वहीं दूसरी ओर विश्व की आधी से अधिक आबादी अब भी बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित है। यह असमानता केवल आर्थिक नहीं बल्कि संरचनात्मक और नीतिगत भी है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार करोड़ों लोग आज भी ऐसी स्थिति में जी रहे हैं, जहां बीमारी केवल स्वास्थ्य संकट नहीं बल्कि आर्थिक विनाश का कारण बन जाती है। जब कोई परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा इलाज पर खर्च करने को मजबूर होता है तो वह शिक्षा, पोषण और जीवन की अन्य आवश्यकताओं से समझौता करता है और यही चक्र पीढ़ी दर पीढ़ी गरीबी को जन्म देता है। कोविड-19 महामारी ने इस असमानता को और अधिक उजागर कर दिया। यह महामारी केवल एक स्वास्थ्य संकट नहीं थी बल्कि एक सामाजिक और आर्थिक आपदा भी थी, जिसने यह साबित कर दिया कि दुनिया का सबसे विकसित स्वास्थ्य ढांचा भी तब कमजोर पड़ जाता है, जब विज्ञान, नीति व समाज के बीच तालमेल नहीं होता। वैक्सीन के विकास से लेकर उनके वितरण तक, हर स्तर पर यह स्पष्ट हुआ कि वैज्ञानिक उपलब्धियां तभी प्रभावी हैं, जब वे समान रूप से सुलभ हों। इस अनुभव ने यह भी सिखाया कि स्वास्थ्य सुरक्षा केवल राष्ट्रीय मुद्दा नहीं बल्कि वैश्विक सहयोग का विषय है।
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश के लिए यह चुनौती और भी जटिल हो जाती है। यहां एक ओर विश्वस्तरीय अस्पताल व अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाएं हैं तो दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की कमी, डॉक्टरों का अभाव और बुनियादी संसाधनों की अनुपलब्धता एक कठोर सच्चाई है। हालांकि, केवल सरकारों और वैज्ञानिकों की भूमिका पर्याप्त नहीं है। समाज के प्रत्येक व्यक्ति को भी इस प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार बनना होगा। स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता, स्वच्छता का पालन, संतुलित आहार व नियमित व्यायाम जैसी आदतें न केवल व्यक्तिगत स्तर पर लाभकारी हैं बल्कि सामूहिक स्वास्थ्य सुरक्षा को भी मजबूत करती हैं। स्वास्थ्य का भविष्य केवल तकनीकी प्रगति पर निर्भर नहीं, इस बात पर भी निर्भर है कि हम उस प्रगति को कितनी समानता और संवेदनशीलता के साथ समाज के हर वर्ग तक पहुंचाते हैं।

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