केरल—चुनाव गतिविधि

आगामी दिनों में देश के 4 राज्यों और एक केन्द्र शासित प्रदेश में चुनाव होने जा रहे हैं। पिछले समय में पश्चिम बंगाल में हो रहे इन चुनावों की व्यापक चर्चा होती रही है। अब तक इस चुनावी दंगल में ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ही मुख्य मुकाबले में दिखाई दे रही हैं। कांग्रेस और वामपंथी इस बार पीछे चल रहे हैं। असम में चाहे भाजपा सत्तारूढ़ है परन्तु कांग्रेस के मुकाबले में वहां भाजपा का प्रभाव ही बना दिखाई दे रहा है। केरल चुनाव भी कई पक्षों से बड़े दिलचस्प बने दिखाई दे रहे हैं। यहां मार्क्सवादी पार्टी (माकपा) का गठबंधन पिछले 10 वर्ष से सत्ता में है। इससे पहले 1982 से कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन और कम्युनिस्ट बारी-बारी शासन करते रहे हैं। वर्ष 2021 में पिनाराई विजयन के नेतृत्व में एल.डी.एफ. ने लगातार दूसरी बार चुनाव जीता था, परन्तु इस बार कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यू.डी.एम.) का पलड़ा भारी प्रतीत होता है। इससे पहले हुए निकाय चुनावों में भी मार्क्सवादी पार्टी को ज्यादातर स्थानों से निराशा ही हाथ लगी थी।
इस राज्य में 27 प्रतिशत मुसलमान और 18 प्रतिशत ईसाई समुदाय के लोग रहते हैं। इन दोनों ने ही पिछले समय में मार्क्सवादी पार्टी की सहायता की थी। इस बार तीसरी पार्टी के रूप में भाजपा भी अपना गठबंधन बना कर चुनाव मैदान में उतरी है। वह भी राज्य के कई ज़िलों में अपना दावा पेश कर रही है। भाजपा के नेतृत्व वाला एन.डी.ए. गठबंधन यह दावा पेश कर रहा है कि इस बार वह दोहरा आंकड़ा अभिप्राय: 15 से 20 क्षेत्रों में जीत प्राप्त करेगा। नि:संदेह 10 वर्ष तक शासन चलाने के बाद सरकार के विरुद्ध भावनाएं प्रबल हुई हैं। राज्य बुरी तरह ऋण के जाल में भी फंस चुका है। यह ऋण 5 लाख करोड़ तक पहुंच चुका है। सरकार पर भाजपा के प्रति नरम रवैया धारण करने के आरोप भी लगते रहे हैं, जिस कारण इस बार मुस्लिम मतदाताओं का झुकाव ज्यादा कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटिड डैमोक्रेटिक फ्रंट की ओर दिखाई देता है। चाहे सभी पार्टियां मतदाताओं को लुभाने के लिए अपनी-अपनी घोषणाएं ज़रूर कर रही हैं परन्तु इसके साथ ही प्रदेश के मूलभूत ढांचे की मज़बूती, बेरोज़गारी और सुरक्षा की बातें विशेष रूप से उभर कर सामने आई हैं। इस समय मुकाबला मार्क्सवादी पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन और कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन में ही दिखाई देता है। राज्य में कांग्रेस के लिए पार्टी की फूट भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। पार्टी मुख्यमंत्री के चेहरे का फैसला करने में भी अब तक असमर्थ रही है। कांग्रेस को किसी समय के. करुणाकरन, ए.के. एंथनी और ओमान चंदी जैसे बड़े आधार वाले रहे नेताओं की कमी महसूस होती दिखाई दे रही है। 
देश भर में मलयालम लोगों की शिक्षा दर सबसे अधिक है। यहां के ज्यादातर लोगों के विदेश में बसे होने ने भी इस राज्य को आर्थिक संबल दिया है परन्तु इसके बावजूद सरकार बड़ी सीमा तक लोगों की उम्मीदों को पूरा करने में विफल रही है। भाजपा इस राज्य में भी अपना साम्प्रदायिक पत्ता फैंकने का यत्न कर रही है। इसका कितना मूल्य पड़ता है, इसका पता तो चुनावों में ही चलेगा, परन्तु भाजपा के लिए यह राजनीतिक खेल जीतना अभी दूर की बात प्रतीत होती है, क्योंकि केरल में सामाजिक ढांचे के अनुसार भी लोग क्रियात्मक रूप से प्रदेश के विकास को आगे ले जाने वाली और सामाजिक तौर पर समुदायों में एकस्वर पैदा करने वाली पार्टियों को ही अभी तक भारी समर्थन देते दिखाई दे रहे हैं।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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