आस्था, पुनर्जन्म और बहुलता का उत्सव है ईस्टर संडे
आज ईस्टर संडे पर विशेष
आगामी 5 अप्रैल 2026 को पूरी दुनिया में ईस्टर संडे मनाया जायेगा। आज की तारीख में भारत जैसे देश में यह सिर्फ ईसाईयों का धार्मिक पर्व नहीं है बल्कि भारत की बहुलतावादी संस्कृति के कारण लाखों-करोड़ों हिंदू, जैन, बौद्ध और दूसरे भारतीय धर्मों के अनुयायी भी इस दिन के प्रति अपनी-अपनी तरह की आस्था रखते हैं। क्योंकि यह दिन सिर्फ एक धार्मिक क्रियाकलाप का दिनभर नहीं है बल्कि आस्था, पुनर्जन्म और मानवीय एकता का भी प्रतीक है। दरअसल इस दिन ईसा मसीह सूली पर चढ़ाये जाने के बाद फिर से जीवित हुए थे, इसलिए इसे तीसरा पवित्र दिन कहते हैं। शुक्रवार को उन्हें सूली पर चढ़ाया गया था और इतवार के दिन वह पुनर्जीवित हो गये थे। ईसाई मान्यता के मुताबिक इस दिन को मृत्यु पर जीवन की विजय के रूप में देखा जाता है। आज के दौर में जब हर जगह जंग का माहौल है, आर्थिक अस्थिरता का वातावरण है और हर तरफ सामाजिक विभाजन मौजूद है, तब ईस्टर का संदेश अंधकार में प्रकाश की तरह पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक हो गया है।
ईस्टर: एक मानवीय उत्सव
दुनियाभर में ईस्टर संडे एक धार्मिक अनुष्ठान और सांस्कृतिक उत्सव के रूप में अपनी पहचान बना चुका है। यूरोप में यह पारिवारिक पुनर्मिलन और कौटुंबकीय भोज का दिन होता है यानी इस दिन तमाम लोग अपने परिवार के बड़े-बूढ़ों के साथ बैठकर भोजन करते हैं। अमरीका में यह दिन ‘ईस्टर बन्नी’ के रूप में भी मनाया जाता है, क्याेंकि इस दिन बच्चों को लुभाने वाली खाने की चीजों को कृत्रिम अंडों के भीतर भरकर उन्हें छुपा दिया जाता है, जो छोटे बच्चों के लिए उपहार होते हैं।
छोटे बच्चे इसे ‘एग हंट’ यानी अंडों की खोज के साथ मनाते हैं। परिवार के लोग इस दिन घर के बच्चों के लिए उपहार से भरे अंडे घर में छुपा देते हैं, जिन्हें बच्चे खोजते हैं और वे इस दिन को अपने लिए इन्हीं मजेदार अंडे की खोज में खुशी-खुशी मनाते हैं। दक्षिण यानी लैटिन अमरीका में इस दिन धार्मिक जुलूस और जगह-जगह नाटकीय प्रस्तुतियां लोगों का मनोरंजन करती हैं। मगर इन विविध परंपराओं के बावजूद हर जगह इस दिन को एक नये आरंभ की सकारात्मकता के उत्सव के रूप में मनाते हैं। इस तरह ईस्टर का वैश्विक स्वरूप इस बात का उदाहरण है कि कैसे कोई धार्मिक पर्व मानवता की साझी सांस्कृतिक विरासत में बदलता है।
भारत का बहुलतावादी उत्सव
दुनिया के अनेक देशों की तरह भारत में भी ईस्टर का उत्सव मनाया जाता है। विशेषकर गोवा, केरल, नागालैंड और मिजोरम में तो लोग महीनों से इस उत्सव का इंतजार करते हैं। यहां यह उत्सव सिर्फ ईसाई समुदाय तक सीमित नहीं रहता, बहुत बड़ी तादाद में स्थानीय लोग भी इस उत्सव में शिरकत करते हैं यानी ईसाईयाें के साथ भारत के अन्य धर्मों के लोग भी ईस्टर उत्सव मनाते हैं। क्योंकि यह धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक है और भारत की हमेशा से सोच ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की रही है। इसलिए इस दिन जब चर्च में विशेष प्रार्थनाएं होती हैं, तो ईसाईयों के इतर वहां दूसरे समुदायों के लोग भी मौजूद होते हैं। इस दिन सामुदायिक भोज और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। गोवा और केरल जैसे राज्यों में तो ईस्टर पर्यटन भी विशेष मायने रखता है। ईस्टर पर्यटन में हस्तशिल्प और स्थानीय बाजारों में खास रौनक रहती है। युवा लोग इस दिन को विशेष पॉजिटीविटी और सेल्फ रिन्यूवल के प्रतीक के रूप में देखते हैं जैसे लोग साल के पहले दिन को नये संकल्प लेने वाले दिन के तौरपर देखते हैं।
साल 2026 में क्यों है ये खास
यूं तो हर साल ईस्टर का पर्व शांति, भाईचारा और मानवतावादी संदेश देता है, लेकिन साल 2026 में यह बाकी सालों से अलग महत्व रखता है। क्योंकि इस साल जब ईस्टर का पर्व मनाया जायेगा, तब पूरी दुनिया युद्ध के वैश्विक तनाव से गुजर रही होगी। दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में भू-राजनीतिक तनाव अपने चरम पर होगा। वहीं दूसरी ओर समाज में मानसिक, स्वास्थ्य और संतुलन की चुनौतियां भी कम नहीं होंगी। ऐसे में ईस्टर का संदेश कई स्तरों पर महत्वपूर्ण हो जाता है। जैसे- वैश्विक स्तर पर यह शांति और पुनर्निर्माण का प्रतीक बन जाता है, सामाजिक स्तर पर यह बहुलतावादी आस्था का प्रतीक बन जाता है और निजी स्तर पर यह निराशा से बाहर आने की प्रेरणा का स्रोत हो जाता है। ईस्टर हमें याद दिलाता है कि हर संकट के बाद पुनर्निर्माण संभव है। चाहे वह व्यक्तिगत जीवन में संदर्भ में हो या वैश्विक व्यवस्था के संबंध में। ईस्टर संडे भारत जैसे बहुलतावादी देश में विविधता तथा बहु-विश्वासों का उत्सव भी है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर





