हिन्दी साहित्य के महान कवि गोपालदास नीरज
फिल्म ‘कन्यादान’ (1968) के गीत लिखने के लिए हसरत जयपुरी के साथ ही गोपालदास सक्सेना ‘नीरज’ को भी ज़िम्मेदारी दी गई थी। उन्होंने एक गीत लिखा जो फिल्म के निर्माता राजेंद्र भाटिया को तो बहुत पसंद आया, लेकिन फिल्म के संगीत निर्देशकों शंकर-जयकिशन को बिल्कुल पसंद नहीं आया, उन्होंने उसको संगीतबद्ध करने से साफ इंकार कर दिया। इस पर हुए विवाद के चलते नीरज ने वह गीत फाड़ दिया और कभी यह नहीं बताया कि उस गीत के बोल क्या थे। बहरहाल, नीरज से नया गीत लिखने के लिए कहा गया, लेकिन वह इतने गुस्से में थे कि उन्होंने राजेंद्र भाटिया के समक्ष शर्त रखते हुए कहा कि वह ऐसा गीत लिखेंगे जो अगर सबको पसंद आ गया तो उन्हें मुंह मांगा ईनाम देना होगा। राजेंद्र भाटिया ने स्वीकृति में अपना सिर हिला दिया। रात भर की कोशिश के बाद नीरज अगली सुबह एक गीत लेकर गये, जिसके बोल सुनते ही राजेंद्र भाटिया व शंकर-जयकिशन के होश उड़ गये, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। यह गीत था- ‘लिखे जो खत तुझे, वो तेरी याद में...’ जिसे जब मुहम्मद रफी ने अपनी मखमली आवाज़ में गाया तो वह हमेशा के लिए युवा प्रेमियों का लव एंथम (प्रेम गीत) बन गया। अब नीरज के ईनाम की बारी थी। नीरज ने ईनाम में राजेंद्र भाटिया की नई कार मांग ली, जिसे उन्होंने कुछ दिन पहले ही खरीदा था। राजेंद्र भाटिया ने बिना संकोच के फौरन ही कार की चाबी नीरज को दे दी।
नीरज 1950 व 1960 के दशकों में कवि सम्मेलनों व मुशायरों में अपने गीतों व ़गज़लों से धूम मचाये हुए थे, विशेषकर इस वजह से कि उनका काव्य न सिर्फ आम बोलचाल की भाषा में होने के साथ ही हिंदी-उर्दू का अच्छा मिश्रण लिए हुए था बल्कि उसमें विचारों की गहराई भी थी, जो सभी को आसानी से समझ में आती थी। उन दिनों उनका एक गीत, ‘कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे..’ बहुत चर्चित हुआ था, जिसे उन्होंने सबसे पहले 1951 में लखनऊ रेडियो पर अपने विशिष्ट अंदाज़ में प्रस्तुत किया था। यह गीत निर्माता निर्देशक आर चन्द्रा को इतना पसंद आया कि उन्होंने इसे न सिर्फ अपनी फिल्म ‘नई उम्र की नई फसल’ में इसका इस्तेमाल किया बल्कि इस फिल्म के अन्य गाने भी नीरज से लिखवाये। यह फिल्म तो फ्लॉप हो गई, लेकिन रोशन के संगीत व मुहम्मद रफी की आवाज़ में ‘कारवां गुज़र गया’ कालजयी हो गया और नीरज का मुंबई की फिल्म नगरी में प्रवेश हो गया।
नीरज का बॉलीवुड में प्रवेश तो आसानी से हो गया, लेकिन फिल्मोद्योग में पैर जमाना न तब आसान था और न अब आसान है। कड़ा संघर्ष करना होता है और किस्मत के नक्षत्र भी आपके पक्ष में होने चाहिए। इत्तेफ़ाक से मुंबई के एक मुशायरे में नीरज को देवानंद ने सुना और वह उनकी कविता में शब्द-चयन से बहुत प्रभावित हुए। देवानंद ने नीरज से कहा, ‘मुझे आपका कलाम पसंद आया, किसी दिन हम साथ मिलकर काम करेंगे, ये वायदा रहा।’ बात आयी-गयी हो गई। नीरज को मालूम हुआ कि देवानंद ‘प्रेम पुजारी’ फिल्म बना रहे हैं। उन्होंने देवानंद के पास जाकर उन्हें उनका वायदा याद दिलाया, तो देवानंद ने उन्हें 1,000 रूपये दिये और उन्हें फिल्म के संगीतकार एसडी बर्मन के पास लेकर गये। बर्मन ने नीरज से कहा कि उन्हें एक ऐसा गीत चाहिए जो ‘रंगीला’ शब्द से शुरू होता हो। इस तरह ‘रंगीला रे तेरे रंग में’ गीत ने जन्म लिया और फिर नीरज व बर्मन की जोड़ी ने अनेक यादगार फिल्में दीं, जिनमें विशेषरूप से ‘शर्मीली’, ‘गैम्बलर’ व ‘तेरे मेरे सपने’ शामिल हैं। नीरज की कलम से अनेक सदाबहार गीत निकले, जैसे, ‘दिल आज शायर है’, ‘खिलते हैं गुल यहां’, चूड़ी नहीं ये मेरा दिल है’, ‘जैसे राधा ने माला जपी श्याम की’, आदि।
नीरज का जन्म 4 जनवरी 1925 को उत्तर प्रदेश के एटा ज़िले के गांव पुरावली में हुआ था। वह जब मात्र 6 साल के थे तो उनके पिता का निधन हो गया था और उनकी फूफी-फूफा ने उनकी व उनके बड़े भाई की शिक्षा की ज़िम्मेदारी ली। ज़िम्मेदारी उठाने की सीख नीरज को स्कूल के दिनों में ही मिल गई थी। एक विषय में वह एक नंबर से फेल हो गये थे, उन्होंने टीचर से एक अंक बढ़ाने का आग्रह किया। टीचर ने इंकार करते हुए कहा, ‘आज अगर मैं तुम्हें एक अंक दे दूंगा, तो तुम्हें मांगने की आदत पड़ जायेगी। तुम एक गरीब के बच्चे हो, तुम्हें तो अपने पैरों पर खड़े होने के लिए अपने पूरे जीवन में फर्स्ट क्लास लानी चाहिए।’ टीचर के इन शब्दों का नीरज पर गहरा असर पड़ा और उन्होंने न सिर्फ पढ़ाई में बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ होने की ठानी और वह कामयाब भी हुए। स्कूल के दिनों से ही नीरज की दिलचस्पी संगीत व शायरी में थी। बहरहाल, जब उनका ब्याह हुआ तो उनके फूफा ने उन्हें आर्थिक सहयोग देना बंद कर दिया कि ‘अब अपने पैरों पर खड़े हो’।
जल्द ही नीरज की नौकरी दिल्ली में सरकार के पब्लिसिटी विभाग में लग गई, जहां वह विख्यात शायर हफीज़ जालंधरी (‘अभी तो मैं जवान हूं’ वाले) के सहायक बने, जिससे उन्हें अपनी शायरी को निखारने का बेहतरीन अवसर मिला। नीरज को एक कवि सम्मेलन में ‘परदेसी अपने घर जाओ’ पढ़ने के लिए ईनाम में पांच रूपये मिले थे, जिसे वह अपने पदम् भूषण पुरस्कार से भी बढ़कर समझते थे। साल 1943 में नीरज ने कलकत्ता के एक आयोजन में ‘मैं विद्रोही हूं’ कविता पढ़ी, जो बंगाल के अकाल से संबंधित थी और उसमें ब्रिटिश सरकार की आलोचना थी। नतीजतन उन्हें अपनी नौकरी छोड़कर, गिरफ्तारी के डर की वजह से, दो साल तक कानपुर में छुपकर रहना पड़ा। देश आज़ाद हुआ तो नीरज की नौकरी अलीगढ़ के धर्म समाज कॉलेज में हिंदी के अध्यापक के रूप में लग गई। बाद में, जैसा कि ऊपर बताया गया, नीरज मुंबई चले गये, लेकिन जब एसडी बर्मन ने अपने खराब स्वास्थ के कारण फिल्मों में काम करना बंद कर दिया और जयकिशन का निधन हो गया तो वह 1973 में वापस अलीगढ़ आ गये। 19 जुलाई 2018 को उनका निधन हुआ और उनके पार्थिव शरीर को, उनकी इच्छानुसार मैडीकल में दान कर दिया गया, क्योंकि वह किसी धर्म में विश्वास नहीं करते थे। -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



